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विश्व शान्ति पर निबन्ध | World Peace Essay in Hindi

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विश्व शान्ति पर निबन्ध | World Peace Essay in Hindi
विश्व शान्ति पर निबन्ध | World Peace Essay in Hindi

आज विश्व के तन में भी अशांति है और मन में भी | तन में तोप , बंदूक , बम , अणुजन , उद्जनबम , नेत्रजन बम और युद्ध ने आतंक मचा रखा है और मन में साम्यवाद ,समाजवाद और पूंजीवाद ने उथल पुथल कर रखी है | इन दोनों के समुदित तूफान के कारण विश्व का कण कण अशांत है | जो शान्ति प्रकट में दिखाई भी देती है वह इतनी नाजुक है कि किसी भी समय उसमे प्रलयंकारी विस्फोट हो सकता है | इस प्रकार बरसों तक अशांत वातावरण में रहते हुए संसार शान्ति के लिए तरस उठा है | यही कारण है कि प्रत्येक देश शान्ति-शांति की दुहाई दे रहा है |

विश्व शान्ति का इतिहास

अशांति की कहानी ही मानो शान्ति का इतिहास है | पिछली आधी सदी में दो बार महायुद्ध छिड़ चुके है और वे भी एक से बढकर एक | अब तीसरे महायुद्ध की तैयारिया हो रही है | यद्यपि कोई भी देश युद्ध को नही चाहता तो भी ऐसा वातावरण उपस्थित हो जाता है जिसमे युद्ध के अतिरिक्त कोई उपाय नही रह जाता | युद्धोंतेजक साधनों में सबसे बड़ा हथियार साम्राज्यवाद का है |

प्रथम महायुद्ध में एक ओर तो अंग्रेज आधी दुनिया की मंडियों पर अधिकार जमाए और दुसरी ओर यूरोप के कई घने देशो में इतना भी स्थान नही था कि वहां के शहरी खुलकर साँस भी ले सके | इसी आधार पर जर्मनी ने 1914 में इंग्लैंड पर आक्रमण करके प्रथम महायुद्ध का श्रीगणेश किया | यह अशांति की पहली चिंगारी थी | अब तलवारों और तीरों का युग बीत चूका है जबकि युद्ध का प्रभाव गिने-चुने लोगो पर हुआ करता था |

अबत तो विज्ञान ने विश्व को इतनी प्रगति प्रदान की है वह एक महान इकाई बन रहा है | देश और देशान्तरो के छोटे छोटे टुकड़े अंतर्राष्ट्रीयता के निर्माण एम् समाये जा रहे है | अब देशो के आपसी संबध इतने बढ़ गये है कि एक के हित की आंच आते ही समूचे विश्व के हित टकराने लगते है | बस यही प्रथम महायुद्ध में हुआ | यूरोप की अशांति जंगल की आग के समान विश्व अशान्ति के रूप में भडक उठी |

वैज्ञानिक अविष्कारों ने घी का काम किया | रक्तपात , अग्निकाण्ड , महामारियो ने वह उत्पात मचाया कि संसार “त्राहि-त्राहि” बोल उठा | लोगो ने कानो में हाथ लगाये कि फिर कभी युद्ध न चाहेंगे | इस इच्छा की पूर्ति के लिए राष्ट्रसंघ की स्थापना की गयी | कुछ बरसों तक तो राष्ट्रसंघ संसार में शान्ति बनाये रखने का प्रयत्न करता रहा किन्तु वह भी पक्षपात कस शिकार होकर दब गया |

सन 1939 में जर्मनी ने फिर युद्ध आरम्भ किया | यह विश्व शान्ति की दुसरी चुनौती थी | इस युद्ध में कल्पनातीत नरसंहार हुआ और पहली बार अणुबम का प्रयोग हुआ | अब विश्व में युद्ध से उतना भय न रहा जितना अणुबमो के प्रयोग से | राष्ट्रों ने फिर मिलकर शांति स्थापना के विचार से संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की | जी निर्बलताओ के कारण राष्ट्रसंघ विश्व शान्ति बनाये रखने में असफल रहा था संयुक्त राष्ट्र संघ में उन सब निर्बलताओ को दूर करने के लिए विश्व सेना और विश्वकोश का प्रबंध किया |

अशांति के कारण

कई लोग अशांति का कारण विज्ञान को बताते है किन्तु यह बात सर्वथा निर्मूल है | विज्ञान तो एक साधन है | उसे भले काम में भी लगाया जा सकता है और बुरे काम में भी | जिस प्रकार बिजली भाप आदि वैज्ञानिक अविष्कारों ने विश्व को उन्नति की राह दिखाई है और जीवन को सुखी बनाया है क्या उसी प्रकार अणुशक्ति का सदुपयोग नही किया जा सकता ? इसके विपरीत बिजली और भाप को भी तो विनाशकारी शस्त्रों के रूप में बरता जा रहा है | इससे सिद्ध हुआ कि अशांति के मूल कारण विज्ञान नही अपितु उसका अज्ञान है |

जब वैज्ञानिक अविष्कार नही हुए थे क्या उस समय अशांति नही फैलती थी | इसके विपरीत वैज्ञानिक अविष्कार और वैज्ञानिक विचार तो शान्ति स्थापना के सहायक सिद्ध होने चाहिए | तभी तो भारत अहिंसा का उपदेश दे रहा है | कहते है कि जब 1939 में जर्मनी में युद्ध आरम्भ किया तो महात्मा गांधी ने हिटलर की अहिंसा का पक्ष लेने का परामर्श दिया था | अब भी हमारे प्रधानमंत्री विश्व के संघर्ष को दूर करने के लिए अहिंसात्मक निति की घोषणा कर रहे है |

उपसंहार

वस्तुतः शांति हाथो या पांवो में नही बसती अपितु मन में बसती है | किसी व्यक्ति के हाथ पाँव बाँध देने पर भी हव मन से बुराई सोच सकता है इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि विश्व के मन से अशांति का विचार हटाकर उसमे शान्ति की श्रुद्धा उत्पन्न की जाए | भगवान करे कि संयुक्तराष्ट्र संघ और हमारा भारत देश अपने विश्व शांति के उद्देश्यों में सफल हो |

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