Home जीवन परिचय तात्या टोपे की जीवन परिचय | Tatya Tope Biography in Hindi

तात्या टोपे की जीवन परिचय | Tatya Tope Biography in Hindi

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तात्या टोपे की जीवन परिचय | Tatya Tope Biography in Hindi
तात्या टोपे की जीवन परिचय | Tatya Tope Biography in Hindi

भारत की स्वतन्त्रता के प्रथम युद्ध में जिन देशभक्तों ने अपनी आहुति प्रदान की थी उनमे तात्या टोपे (Tatya Tope) का अन्यतम स्थान है | उनकी शूरता और उनके त्याग की कहानी बड़ी प्रेरणादायक है | वे देश की सेवा के लिए ही धरती की गोद में आये थे और देश की सेवा करते हुए फाँसी के तख्ते पर चढ़ गये | उन्होंने अपने हाथो से फाँसी का फंदा अपने गले में डालते हुए कहा था “मै पुराने वस्त्र छोडकर नये वस्त्र धारण करने जा रहा हु | मै अम्र हु | मैंने जो कुछ किया है अपने देश और मातृभूमि के लिए किया है” |

तात्या टोपे (Tatya Tope) के शौर्य और चातुर्य की प्रशंसा स्वयं अंग्रेजो तक ने की है | तात्या टोपे का जन्म 1814 ई. में नासिक के पास जाबालि में एक ब्राह्मण वंश में हुआ था | उनके पिता का नाम पांडूरंगराव और माता का नाम रुक्मणबाई था | उनके पिता पूना में बाजीराव पेशवा के दरबार में रहते थे | बाजीराव जब पुन छोडकर बिठुर चले गये तो वे भी अपने कुटुंब को लेकर बिठुर में जाकर बस गये थे और बाजीराव की सेवा में रत रहते थे |

तात्या टोपे (Tatya Tope) की बाल्यावस्था बिठुर में ही व्यतीत हुयी | वे बाजीराव के दत्तक पुत्रो के साथ खेलते-कूदते तो थे ही , उनकी शिक्षा दीक्षा भी उनके साथ ही होती थी | वे आयु में नाना साहब से दस वर्ष बड़े थे | उन्होंने बाल्यावस्था में ही तीर-तलवार चलाने और घुड़सवारी की अच्छी शिक्षा प्राप्त कर ली थी | वे हिंदी , मराठी , गुजराती और उर्दू आदि भाषाओं के अच्छे ज्ञाता थे | अंग्रेजी में केवल हस्ताक्षर करने का ज्ञान था |

तात्या टोपे को पहले जाबलेकर कहते है | वे जाबलेकर से तात्या टोपे कैसे बने इसके संबध में एक कहानी कही जाती है | “तात” शब्द छोटो और प्रिय व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त होता है | बाजीराव जाबलेकर को तात कहा करते थे | एक बार उन्होंने जबलेकर के गुणों से मुग्ध होकर उन्हें रत्नजडित टोपी प्रदान की | मराठी में टोपी को टोपे कहते है | बस तात और टोपे के योग से तात्या टोपे बन गया | वास्तविक नाम जाबलेकर तो लुप्त हो गया , उसके स्थान पर तात्या टोपे (Tatya Tope) प्रसिद्ध हो गया |

1851 ई. में जब बाजीराव स्वर्गवासी हो गये तो उनके स्थान पर नाना साहब पेशवाई के राजसिंहासन पर बैठे | तात्या टोपे नाना साहब की सेवा में ही रत हो गये | नाना साहब उनका बड़ा सम्मान करते थे | वे उन्हें मित्र की भाँती अपने पास ही रखते थे और स्वयं भी उनकी आज्ञाओं पर अपने प्राण तक न्योछावर करने के लिए तैयार रहते थे | नाना साहब ने जब अंग्रेजो से युद्ध करने के लिए स्वतंत्रता सैनिको की सेना गठित की तो उन्होंने तात्या टोपे को ही उसका प्रधान सेनापति बनाया |

तात्या टोपे (Tatya Tope) ने प्रधान सेनापति के रूप में स्वतंत्रता के समर में जिस अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन किया था उसका चित्रण शब्दों में नही किया जा सकता | अंग्रेज लेखको ने उनके उस शौर्य पर मुग्ध होकर के ही उनकी उपमा नेपोलियन और गैरीबाल्डी से दी थी | तात्या टोपे कानपुर में अंग्रेजो के खजाने की रक्षा में असीम शौर्य का प्रदर्शन किया था | उन्ही के साहस और शौर्य से स्वतंत्रता सैनिक कानपुर से अंग्रेजो को बाहर निकालने में सफल भी हुए थे |

तात्या टोपे अंग्रेजो को देश से बाहर निकालना तो चाहते थे किन्तु निरपराध अंग्रेज स्त्रियों और बच्चो की हत्या नही करना चाहते थे | तात्या टोपे की अद्भुत वीरता की चित्र उस समय देखने को मिलते है जब अंग्रेजो ने पुन: कानपुर पर अधिकार कर लिया था और नाना साहब को कानपुर ही नही , बिठुर को भी छोड़ देना पड़ा था | तात्या टोपे ने कई हजार सैनिको के साथ अपने प्राणों की बाजी लगा दी | उन्होंने सिंह की भांति दहाड़ते हुए अंग्रेजी सेना पर आक्रमण कर दिया और अंग्रेजो की रणनिति को मिटटी में मिलाकर आधे कानपुर पर पुन: आधिपत्य स्थापित कर लिया |

नाना साहब का पुन: बिठुर में आगमन हो सका था | पर हवा का रुख अनुकूल न होने के कारण तात्या टोपे को पराजित होना पड़ा | उनकी पराजय के फलस्वरूप अंग्रेजो का पुन: कानपुर पर अधिकार हो गया और नाना साहब को पुन: बिठुर छोड़ देना पड़ा | कानपुर के मोर्चे पर पराजित होने के पश्चात तात्या टोपे ने कई मोर्चो पर अपने शौर्य के अद्भुत चित्र बनाये | कालपी , झांसी , ग्वालियर और चरखारी आदि के मोर्चो पर उनकी बार-बार विजय और पराजय हुई पर वे न थके और न हारे | बैसवाडा के जंगलो में जाकर छिप गये | गुप्त रूप से अंग्रेजो के विरुद्ध नया मोर्चा बनाने लगे और गोरिल्ला युद्ध करने लगे |

जंगलो से बाहर निकलकर पुन: तात्या टोपे (Tatya Tope) ने अंग्रेजी सेना के लिए महासंकट उत्पन्न कर दिया | अंग्रेजी सेना उन्हें बंदी बनाने के लिए धावे पर धावे मारती थी जाल बिछाती थी पर वे जाल के तन्तुओ को तोडकर निकल जाते थे अंग्रेजी सेना के हौसलों को मिटटी में मिला दिया करते थे | तात्या टोपे ने अंग्रेजी सेनाओ के चक्रव्यूह को तोड़ते हुए जयपुर टोंक , चरखारी और झालावाड़ आदि कई राज्यों पर आक्रमण किया | किसी से मित्रता स्थापित की और किसी से दंड में रूपये वसूले किये |

वे किसी स्थान पर जमकर नही रहे , क्योंकि अंग्रेजी सेना उनके पीछे पड़ी हुयी थी | वे एक के पश्चात एक स्थान छोडते हुए दक्षिण में जा पहुचे | पर अंग्रेज सेना ने तात्या टोपे को दक्षिण में भी शान्ति से रहने नही दिया | न साधन न सैनिक | विवश होकर उन्हें पुन: बैसवाडा के वनों में चला जाना पड़ा | पर भाग्य विपरीत था उनके एक मित्र के विश्वासघात के कारण वे बंदी हो गये | जिस दिन वे बंदी हुए वे 1859 ई. के अप्रैल के दिन थे |

तात्या टोपे ने अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध विद्रोह करने का अपराध लगाकर मुकदमा चलाया | दस दिनों के मुकदमे का नाटक हुआ | उन्होंने अपने को निरपराध बताते हुए कहा था मैंने किसी प्रकार का विद्रोह नही किया जय | मैंने केवल अपने कर्तव्य का पालन किया है | अपनी मातामही को दासता के बन्धनों से मुक्ति दिलाने के लिय प्रयत्न करना कोई अपराध नही है | पर भला ब्रिटिश सरकार तात्या टोपे के इस तर्क कोए कैसे स्वीकार कर सकती थी |

तात्या टोपे (Tatya Tope) को 18 अप्रैल 1859 को फाँसी की सजा दे दी गयी | वो हंसते हंसते फाँसी के फंदे पर झूल गये | उन्होंने अपने हाथो से ही फाँसी का फंदा अपने गले में डाल दिया था | तात्या टोपे का पंच भौतिक शरीर मिटटी में मिल गया पर उनकी शौर्य , उनकी देशभक्ति और उनका बलिदान आज भी हमारे लिये प्रेरणा का स्त्रोत बना हुआ है और इसी प्रकार युग-युगों तक प्रेरणा का स्त्रोत बना रहेगा , निश्चय बना रहेगा |

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