Swami Vivekananda Biography in Hindi | स्वामी विवेकानंद की जीवनी

Swami Vivekananda Biography in Hindi | स्वामी विवेकानंद की जीवनी और अनमोल विचार
Swami Vivekananda Biography in Hindi | स्वामी विवेकानंद की जीवनी

स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda ) एक भारतीय हिन्दू सन्यासी और रहस्यवादी रामकृष्ण परमहंस के अनुयायी थे | वो वेदांत और योग के भारतीय सिधान्तो को विदेश में प्रसार करने वाले मुख्य व्यक्ति थे | स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda ) ने विश्व में हिन्दू धर्म के उत्थान में महत्वपूर्ण किरदार निभाया और राष्ट्रीयता के सिद्धांत को भारत में फैलाया | स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda ) ने रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन की स्थापना की | स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda ) के शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन में हिन्दू धर्म पर दिए भाषण की वजह से चर्चाओ में आये | आइये उनके जीवन के बारे में विस्तार से पढ़ते है |

स्वामी विवेकानंद का जन्म एवं बचपन Birth and childhood of Swami Vivekananda

Swami Vivekananda as childस्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda ) का जन्म 12 जनवरी 1863 को मकर सक्रांति पर्व के दौरान कलकत्ता में उनके पैतृक परिवार में हुआ था जो उस समय ब्रिटिश साम्राज्य की राजधानी थी | Swami Vivekananda का बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्ता था जिसे संक्षेप में नरेंद्र कहते थे | नरेंद्र एक पारम्परिक बंगाली क्षत्रिय परिवार से ताल्लुक रखते थे और उनके नौ भाई बहनों में से एक थे |नरेंद्र के दादाजी दुर्गाचरण दत्ता संस्कृत और पारसी में विद्वान थे जिन्होंने 25 वर्ष की उम्र में सन्यासी बनने के लिए घर त्याग दिया | उनके पिता विश्वनाथ दत्ता कलकत्ता उच्च न्यायालय में Attorney थे | नरेंद्र की माता भुवनेश्वरी देवी एक धार्मिक गृहिणी थी जो अक्सर पूजा पाठ में व्यस्त रहती थी | नरेंद्र के पिताजी का प्रगतिशील तर्कसंगत रवैया और माता के धार्मिक स्वभाव की वजह से उनकी सोच और व्यक्तित्व को आकार मिला |

नरेंद्र कम उम्र से ही आध्यात्म में रूचि रखते थे और देवी देवताओ जैसे शिव ,राम सीता और हनुमान की तस्वीरो के आगे बैठकर ध्यान किया करते थे | उनको भटकते हुए सन्यासियों और भिक्षुको ने बहुत प्रभावित किया | नरेंद्र बचपन से ही एक शरारती और बैचेन बच्चे थे और उनके माता पिता को उन्हें सँभालने में बहुत परेशानी होती थी | उनकी माता हमेशा कहा करती थी कि “मैंने भगवान शिव से एक पुत्र की कामना की थी और उन्होंने मुझे उनका भूत भेज दिया ” |

स्वामी विवेकानंद की शिक्षा Education of Swami Vivekananda

Swami Vivekanand Young Age Photos1871 में आठ वर्ष की उम्र में स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda ) को ईश्वर चन्द्र विद्यासागर स्कूल में दाखिला दिलाया गया और 1877 तक उस स्कूल में पढ़े | उसके बाद उनका परिवार रायपुर चला गया और उनको वो स्कूल छोड़ना पड़ा| 1879 में उनका परिवार फिर कलकत्ता लौटा और Presidency College की प्रवेश परीक्षा में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होने वाले वो एकमात्र छात्र थे | वो अलग अलग विषय जैसे दर्शनशास्त्र , धर्मशास्त्र , इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य पढने के बहुत शौक़ीन थे | इसके अलावा उनको हिन्दू शास्त्रों , वेदों , उपनिषदों , भगवतगीता, रामायण , महाभारत और पुराण पढने में भी रूचि थी |

नरेंद्र को भारतीय शास्त्रीय संगीत में भी प्रशिक्षित किया गया और नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम,खेलो और अन्य गतिविधियों में भाग लेते रहते थे | उन्होंने General Assembly’s Institution से पश्चिमी तर्कशास्त्र , पश्चिमी दर्शनशास्त्र और यूरोपीय इतिहास का भी अध्ययन किया | 1881  में स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda ) ने ललितकला की परीक्षा उत्तीर्ण की और 1884 में कला में स्नातक की डिग्री प्राप्त की | वो  Herbert Spencer के विकासवाद से बहुत प्रेरित हुए और Spencer की किताब को बंगाली में अनुवाद करने के लिए उनके साथ पत्र व्यवहार करने लगे |पश्चिमी दार्शनिको को पढ़ते समय Swami Vivekananda ने संस्कृत शास्त्रों और बंगाली साहित्य का भी अध्ययन किया |

ब्रम्हा समाज का प्रभाव और आध्यात्मिक शिक्षा Brahmo Samaj Impact and Spiritual on Swami Vivekananda

Swami Vivekanand Bramho Samaj Keshab Chandra Sen1880 में नरेंद्र रामकृष्ण परमहंस से मिलने के बाद केसब चन्द्र सेन नव विधान से जुड़ गये जिसे केशव चन्द्र सेन से स्थापित किया था जो इसाई धर्म को हिन्दू धर्म में पुनः परिवर्तित करने में लगी हुयी थी | नरेंद इसके बाद 1884 में केशव चन्द्र सेन और देवेन्द्रनाथ टैगोर द्वारा चलाये जा रहे एक नये गुट “साधारण ब्रह्म समाज” से जुड़ गया |  1881 से 1884 तक सेन की “आशा की किरण” से जुड़े जिसमे वो युवाओ को धूम्रपान ओर मदिरापान छोड़ने के लिए प्रेरित कर रहे थे | वो प्रारम्भ में ब्रह्म समाज के सिधान्तो से प्रेरित थे जो निराकार ईश्वर और मूर्ति पूजा के विरोधी थे |

ब्रह्म समाज के संस्थापक राममोहन राय एकेश्वरवाद में विश्वास करते थे और हिंदू धर्म के एक सर्वाक्षावादीय व्याख्या की ओर प्रयासरत थे | उनके विचारो को देवन्द्रनाथ टैगोर ने परिवर्तित किया जिनकी नये सिद्धांतो को बनाने में प्राकृतवादी दृष्टिकोण था और उन्होंने हिन्दू धर्म के मुख्य विश्वासों जैसे पुनर्जन्म , कर्म और वेदों को नकार दिया था | टैगोर ने पश्चिमी आध्यात्मिकता के साथ मिलकर नव-हिंदू धर्म की धारणा लाये थे जिसके विचारो को बाद में केशवचन्द्रसेन ने फैलाया |

इसी प्रकार के प्रत्यक्ष अंतर्ज्ञान और समझ की खोज  में स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) लगे हुए थे | दर्शनशास्त्र के सिद्धांतो से संतुस्ठ ना होकर नरेंद के मन में प्रश्न आया जिसने भगवान की बौधिक खोज करने में उनकी सही शुरुवात की |Swami Vivekananda ने कुछ कलकत्ता के कुछ प्रशिद्ध निवासियों से पूछा कि “क्या ईश्वर को आपने देखा है  “ लेकिन किसी ने भी संतोषजनक उत्तर नही दिया | उस समय नरेंद्र देबेन्द्रनाथ टैगोर से मिले और उनसे पूछा कि क्या उन्होंने ईश्वर को देखा है | उनके सवाल का उत्तर देने के बजाय टैगोर ने कहा “मेरे बच्चे तुम्हारी योगी की आँखे है “|

Ramakrishna रामकृष्ण परमहंस एकमात्र ऐसे इन्सान थे जिन्होंने नरेंद्र के प्रश्न का उत्तर दिया था और कहा ” हां , मैंने ईश्वर को देखा है जैसे मै तुम्हे देखता हु केवल असीम तीव्र बोध होना चाहिए  ” | फिर भी विवेकानंद रामकृष्ण की बजाय ब्रह्म समाज के सिद्धांतो और विचारो से बहुत प्रभावित थे | सेन के प्रभाव से ही वो पश्चिमी आध्यात्मिकता से जुड़े हुए थे और उन्होंने ही नरेंद्र को रामकृष्ण से मिलाया |

रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात और आध्यात्म का ज्ञान Swami Vivekananda Meeting With Ramakrishna

Ramkrishna Paramhansa and Swami Vivekanand1881 में नरेंद्र पहली बार रामकृष्ण परमहंस से मिले थे जो उनकी आध्यात्मिकता का केंद्र बने थे | नरेंद्र को रामकृष्ण का पहला परिचय  General Assembly’s Institution की साहित्य की क्लास में हुआ जब उनके प्रोफ़ेसर को कविताओ पर व्याख्यान देते वक़्त जब कविता में “समाधि ” शब्द आया तो प्रोफेसर ने छात्रों को समाधि शब्द का अर्थ समझने के लिए दक्षिणेश्वर में रामकृष्ण से मिलने को कहा | इस बात से प्रेरित होकर नरेंद्र सहित कुछ छात्रों को रामकृष्ण से मिलने की इच्छा हुयी |

व्यक्तिगत रूप से उनकी पहली मुलाकात नवम्बर 1881 में हुयी लेकिन नरेंद्र इसको अपनी पहली मुलाकात नही मानते थे |उस समय नरेंद्र रचनात्मक आकलन की परीक्षा की तैयारी कर रहे थे तब उनका मित्र उनको सुरेन्द्रनाथ मिश्रा के घर लेकर गया जहा रामकृष्ण को व्याख्यान देने के लिए बुलाया था | जब नरेंद्र की मुलाकात रामकृष्ण से हुयी तब उन्होंने नरेंद्र को गाने के लिए कहा | उनके गायन प्रतिभा से प्रेरित होकर उन्होंने नरेंद्र को दक्षिणेश्वर आने को कहा |

1882 की शुरवात में नरेंद्र अपने दो मित्रो के साथ रामकृष्ण से मिलने दक्षिणेश्वर गये | उनकी ये मुलाकात उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ था |हालांकि शुरू में नरेंद्र ने रामकृष्ण को अपना गुरु स्वीकार नही किया और उनके विचारो का विरोध किया  | नरेंद्र उनके व्यक्तित्व से प्रेरित होकर लगातार उनसे मिलने दक्षिणेश्वर जाने लगे | उन्होंने रामकृष्ण में परमानन्द और काल्पनिक स्वप्न देखा था | ब्रह्म समाज का सदस्य होने के नाते उन्होंने मूर्ति पूजा और अनेकवाद का विरोध करते हुए रामकृष्ण को माँ काली की पूजा करने से मना किया |नरेद्र ने रामकृष्ण को परखा जो उनके तर्को का बड़ी सहजता से सामना करते थे और रामकृष्ण जवाब देते  “सच्चाई को सभी मायनों में देखो “|

1884 में नरेंद्र के पिता अपने परिवार को दिवालिया छोडकर चल बसे | लेनदारो ने ऋण की किश्ते मांगना शुर कर दिया और रिश्तेदारों ने उनके परिवार को उनके पैतृक घर से निकाल देने की धमकी दी | नरेंद्र जो एक संपन्न परिवार का बेटा था अब कॉलेज के सबसे गरीब छात्रों में एक हो गया | वो काम ढूढने में भी असफल रहे और ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न उठाने लगे | रामकृष्ण उन्हें सांत्वना देते और उनका दक्षिणेश्वर जाना बढ़ किया |

एक दिन नरेंद्र ने रामकृष्ण से निवेदन किया कि वो माँ काली को उनके परिवार की आर्थिक सहायता के लिए प्रार्थना करे | रामकृष्ण ने स्वयं नरेंद्र को मन्दिर में जाकर प्रार्थना करने को कहा | रामकृष्ण के सुझाव को मानते हुए वो तीन बार मन्दिर में गये और सांसारिक आवश्यकताओं की प्रार्थना करने में असफल रहे | अंत में उन्होंने माँ काली से सच्चे ज्ञान और भक्ति की प्रार्थना करी | नरेंद की अब ईश्वर के साकार होने में आस्था बड़ी और सब कुछ त्यागकर रामकृष्ण को अपना गुरु मान लिया |

1885 को रामकृष्ण Ramakrishna को गले का कैंसर हो गया और उन्हें कलकत्ता ले जाया गया |  उसके बाद उनको काशीपुर के गार्डन हाउस में रखा गया |नरेंद्र और रामकृष्ण Ramakrishna के सिद्दांत उनके उनके अंतिम दिनों में उनका ध्यान रख रहे थे  और नरेंद्र की आध्यात्मिक शिक्षा जारी रही | काशीपुर में उनको निर्विकल्प समाधी का अनुभव हुआ | नरेंद्र और उनके दुसरे अनुयायीयो को रामकृष्ण ने  वैरगीय आदेश पर गेरुए वस्त्र धारण करने को कहा | उन्होंने सिखाया कि “इन्सान की सेवा करना ही ईश्वर की सेवा करना है ” | रामकृष्ण ने नरेंद्र को दुसरे मठ अनुयायियों का ध्यान रखने को कहा और उनकी अगुआई करने को कहा |Ramakrishna रामकृष्ण की 16 अगस्त 1886 की सुबह काशीपुर में मौत हो गयी |

प्रथम रामकृष्ण मठ की स्थापना Foundation of First Ramakrishna Math by Swami Vivekananda

Vivekananda With disciples at Baranagar mathरामकृष्ण की मृत्यु के बाद उनके भक्तो और प्रशंसकों ने उनके सिद्धांतो को मानना बंद कर दिया | काफी समय तक मठ का किराया नही चूका पाने पर नरेंद्र और उसके अनुयायियों को रहने के लिए नई जगह की तलाश थी | कई अनुयायी गृहस्थ जीवन बिताने के लिए अपने अपने घर लौट गये |नरेंद्र ने  बचे हुए अनुयायियो के साथ मिलकर बारानगर में एक टूटे फूटे घर को मठ में बदलने का निर्णय लिया | बरानगर मठ का किराया थोडा कम था जो वो मधुकारी [holy begging] से चूका देते थे |

यह मठ रामकृष्ण मठ की पहली इमारत थी | नरेंद्र और उसके अनुयायी प्रतिदिन घंटो तक ध्यान और योग में लगे रहते थे |  1887 में उन्होंने वैष्णव चरक के साथ मिलकर एक बंगाली गीत ” संगीत कल्पतरु ” संकलित किया | नरेंद्र ने अपने संकलन के लिए कई गाने एकत्रित किया लेकिन प्रतिकूल परिस्थितियों की वजह से वो अपनी किताब का काम पूरा नही कर सके |

दिसम्बर 1886 में एक दिन बाबुराम की माँ  ने नरेंद्र और उसके साथियो को अंतपुर गाँव में बुलाया | नरेंद्र ने न्योता स्वीकार करते हुए अंतपुर जाकर वहा पर कुछ दिन बिताये | अंतपुर में क्रिसमस की शाम को नरेंद्र और उसके आठ अनुयायीयो ने साधारण मठवासी प्रतिज्ञा की | उन्होंने अपने गुरुओ की तरह रहने का फैसला किया | नरेंद्रनाथ ने यही पर अपना नाम “स्वामी विवेकानंद ” रख दिया |

स्वामी विवेकानंद की भारत यात्राये [1888–93] Indian Tour of Swami Vivekananda

Swami Vivekananda india1888 में नरेंद्र ने मठ छोडकर परिवर्जका की तरह जीवन बिताने लगे जिसमे वो बिना किसी बंधन के कही भी सन्यासी की तरह घूम सकते है | उनके पास उस समय एकमात्र सम्पति एक कमंडल, लाठी और उनकी दो प्रिय पुस्तके भगवदगीता और “The Imitation of Christ” साथ थी | नरेंद्र पांच वर्षो तक देश के अलग अलग हिस्सों में घूमते रहे | उन्होंने गरीब बीमार लोगो के लिए सहानभूति उत्त्पन की और राष्ट्र के उत्थान का संकल्प लिया | भिक्षा पर अपना जीवन व्यतीत करते हुए वो पैदल चले और रेल में सफर किया | अपनी यात्रा के दौरान वो सभी धर्म के लोगो से मिले और उनके साथ रहे |  नरेंद्र 31 मई 1893 को “विवेकानंद” नाम के साथ बॉम्बे से शिकागो के लिए रवाना हो गये |

स्वामी विवेकानंद की प्रथम विदेश यात्रा और शिकागो में भाषण First Foreign Tour and Speech at Chicago by  Swami Vivekananda

Swami Vivekananda Chicago Speech

स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) ने पश्चिमी देशो में अपना सफर शुरू किया और जापान,चीन और कनाडा के रास्ते होते हुए अमेरिका के शिकागो शहर में पहुचे | जहा पर सितम्बर 1893 में  धर्म सभा होनी थी | वहा पर महासम्मेलन में  देश के सभी धर्मो के प्रतिनिधियों को इक्कठा होने का न्योता दिया था और | उस समय वहा पर 200 से भी अधिक सहायक समारोह आयोजित किये गये | स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) इन समारोहों में आयोजित होना चाहते थे लेकिन ये जानकर निराश हुए कि प्रतिनिधि के रूप जान पहचान के बिना उनकी प्रमाणिकता को कोई स्वीकार नही करेगा |स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda)ने उन प्रोफेसर से सम्पर्क किया जिन्होंने उन्हें हार्वर्ड में बोलने के लिए बुलाया था और धर्म सभा में सम्मिलित होने के लिए उनको पत्र लिखा | स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) को ब्रह्म समाज के प्रतिनिधि प्रतापचन्द्र ने सहायता की जिनको उन्होंने हिन्दू मठवासीयो के सबसे पुराने मठ के सन्यासी का प्रतिनिधित्व बनाकर अंदर घुसने की अनुमति दिलाई

विश्व धर्म सभा 11 सितम्बर 1893 को Art Institute of Chicago में खुली | इस दिन Swami Vivekananda  विवेकानंद ने भारत और हिंदुत्व पर संक्षिप्त भाषण दिया | वो शुरू में तो काफी बैचेन हुए लेकिन फिर सरस्वती माँ के सामने नमन किया और अपना भाषण “अमेरिका के मेरे भाइयो और बहनों “कहकर शुरु किया| उनके ये शब्द सुनते ही 7000 लोगो की जनता ने दो मिनट खड़े होकर स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) का स्वागत किया | जब फिर से माहौल शांत हुआ | उन्होंने देश की तरफ से सबसे कम उम्र का होने के नाते अभिवादन करते हुए अपना भाषण शुरु किया | Swami Vivekananda विवेकानंद ने “शिव महिमा स्त्रोतम ” से दो उदाहरण बताये  “अलग अलग जगहों से निकली अलग अलग नदिया समुद्र के पानी में एक हो जाती है , हे  भगवान , अलग अलग प्रवृत्तियों के इंसान अलग अलग रास्तो पर टेढ़े मेढ़े या सीधे चलते है , सब आपका नेतृत्व करेंगे  ” और “जो भी मेरे पास किसी भी रूप में आता है मै उसके पास जाता हु  सभी व्यक्ति जिस रास्ते के लिए संघर्ष कर रहे है वो रास्ता अंत में मेरे पास आता है “| ये केवल लगभग 20 मिनिट का एक छोटा भाषण था लेकिन इसने सभा के लोगो की आत्मा की आवाज उठा दी |

सभा के अध्यक्ष जॉन हेनरी ने कहा ” भारत जो सभी धर्मो की माँ है , उसे भगवाधारी Swami Vivekananda स्वामी विवेकानंद ने बहुत दर्शको पर बहुत गहरा प्रभाव किया  “| Swami Vivekananda विवेकानंद को समाचार पत्रों ने बड़े पैमाने पर ध्यान दिया जिन्होंने उनको “भारत का चक्रवाती सन्यासी “ कहकर पुकारा |इसके साथ ही अलग अलग समाचार पत्रों में उन्हें अलग अलग नाम दिया | इसके बाद उन्होंने हिन्दू धर्म और अन्य धर्मो के लिए कई बार भाषण दिया और 27 सितम्बर 1893 को सभा समाप्त हो गयी | Swami Vivekananda विवेकानंद के अधिकतर भाषणों में सार्वभौमिकता और धार्मिक सहिष्णुता के सामान्य विषय पर अधिक बल दिया गया था | उन्हें जल्द ही “handsome oriental” कहकर पुकारा जाने लगा और वक्ता के रूप में बहुत प्रभाव डाला |

 स्वामी विवेकानंद के इंग्लैंड और अमेरिका में व्याख्यान दौरे Lecture tours in the UK and US Swami Vivekananda

Swami Vivekananda England Tourधर्म सभा के बाद स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) को अमेरिका में के कई जगहों पर मेहमान के रूप में बुलाया गया |  उनकी प्रसिधी बहुत बढ़ गयी और उन्होंने अपने जीवन और धर्म के विचारो को हजारो व्यक्तियों तक पहुचाया | उन्होंने अमेरिका के कई जगहों पर लगभग 2 वर्ष बिताये |Swami Vivekananda ने 1894 में न्यूयार्क में “वेदांत समाज ” का निर्माण किया | 1895 में लगातार कार्यक्रमों की व्यस्तता के चलते बीमार हो गये |उन्होंने अपने लेक्चर दौरे बंद कर दिए और वेदांत व् योग की मुफ्त कक्षाए चलाने लगे | इसके बाद 2 महीनों तक न्यू यॉर्क के आइलैंड पार्क में  दर्जनों अनुयायियों को निजी कक्षाए देने लगे |

Swami Vivekananda के पश्चिमी देशो के दौरे में दो बार 1895 और 1896 में ब्रिटेन गये और वहा पर सफलतापूर्वक भाषण दिए | नवम्बर 1895 में वो आयरिश महीला मार्गरेट एलिज़ाबेथ से मिले जो बाद में सिस्टर निवेदिता के नाम से जानी जाने लगी | ब्रितेन के दुसरे दौरे में वो ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के जाने माने भारतविद मैक्स मुलर से मिले जिन्होंने पहली बार रामकृष्ण परमहंस की जीवनी लिखी थी | ब्रितेन से उन्होंने दुसरे यूरोपीय देशो में भ्रमण किया | जर्मनी में दुसरे भारतविद पॉल से मिले जिन्होंने स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) को दो अमेरिकी विश्वविद्यालयो में शैक्षणिक पद देने का न्योता दिया लेकिन उन्होंने दोनों के लिए मना कर दिया क्योंकि वो एक सन्यासी की तरह अपने कर्तव्य पूरा करना चाहते थे |

स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) की सफलता पश्चिमी देशो में वेदांत के निर्माण से देखी गयी | उन्होंने हिन्दू धार्मिकता पर राजयोग नाम से किताब लिखी जिससे पश्चिमी देशो में योग अत्यंत प्रभावशाली रहा और किताब काफी सफल रही | विवेकानन्द ने विदेशो में कई अनुयायि और प्रशंसक बनाये |उन्होंने वेदांत समाज में काम को जारी रखने के लिए एक फ्रेंच महिला मेरी लुइस स्वामी अभयानंद बन गयी और लियो लैंड्सबर्ग स्वामी कृपानंद बन गये | अमेरिका में उनके निवास के दौरान उनको वेदांत छात्रों के लिए कैलिफोर्निया की पहाडियों में जमीन भी दी जिसे शांति आश्रम कहते है |वेदांत समाज का उनके 12 मुख्य केन्द्रों में से सबसे बड़ा अमेरिकी केंद्र दक्षिणी कैलिफोर्निया के हॉलीवुड में है | वहा पर वेदांत प्रेस भी है जो वेदांत और हिन्दू शास्त्रों और ग्रंथों को अंग्रेजी में अनुवाद कर किताबे छापती है |

विदेश में रहते स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) ने अपने भारत के काम को पुनर्जीवित किया | वो अपने अनुयायीयो और सन्यासी भाइयो से सदैव सम्पर्क में रहते थे जो उन्हें वित्तीय सहायता देते थे |उन्होंने स्वामी अखंडानंदा को पत्र में लिखा “खेतड़ी के घर घर जाकर गरीबो और निम्न वर्ग के लोगो को धर्म का पाठ पढाओ और उन्हें भुगोल और अन्य विषयों पर मौखिक पाठ पढाओ , बैठे रहने से कुछ नही होगा जब तक कि तुम गरीबो के लिए कुछ अच्छा ना कर सको “| 1895 में Swami Vivekananda ने वेदांत पढ़ाने के लिए ब्रह्मवदिन की खोज की | विवेकानंद 16 दिसम्बर 1896 को भारत के लिए रवाना हो गये | रास्ते में फ्रांस , इटली  होते हुए भारत आ गये |  इसके बाद सिस्टर निवेदिता उनके पीछे आयी और Swami Vivekananda ने अपना बाकी जीवन भारतीय औरतो और देश की स्वतंत्रता में लगा दिया

स्वामी विवेकानंद की भारत वापसी [1897–99] Swami Vivekananda Back in India

Swami Vivekanand India Tour

यूरोप से उनका जहाज 15 जनवरी 1897 को कोलंबो पंहुचा और उनका वहा पर भव्य स्वागत हुआ | कोलोंबो में Swami Vivekananda ने अपना पहला भाषण अपनी मातृभूमि भारत पर दिया | इसके बाद विवेकानंद कोलंबो से पम्बन ,रामेश्वरम ,रामनाद ,मदुरै , कुम्ब्कोनम और मद्रास में अपने भाषण दिए | Swami Vivekananda की रेल यात्राओ के दौरान लोग अक्सर रेलों पर बैठकर रेल रुकवा देते ताकि वो उनका भाषण सुन सके |मद्रास से उन्होंने अपना सफर कलकत्ता और अल्मोड़ा तक जारी रखा |विदेशो में भाषण की तरह ही भारत में भी वो सामजिक मुद्दों पर भाषण देते |

1 मई 1897 में स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) ने सामाजिक सेवा के लिए रामकृष्ण मिशन की स्थापना की | इसके मिशन के विचार कर्म योग परप्रेरित थे और इसका प्रबंधन रामकृष्ण मठ के सरंक्षको को दिया | रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन दोनों का मुख्यालय बेलूर मठ था |उन्होंने हिमालय और मद्रास में दो ओर मठो की स्थापना की | दो पत्रिकाओ ,अंगरेजी में प्रभुद्ध भारत और बंगाली भाषा में उद्बोधन की स्थापना की |इसी वर्ष उन्होंने मुर्शिदाबाद में प्लेग पीड़ित लोगो की सेवा शुरू की |

Swami Vivekananda विवेकानंद ने जमशेदजी टाटा को भी अपने खोज और शिक्षा संस्थानों की स्थापना में सहायता की | टाटा ने उनको अपने विज्ञान खोज संसथान के प्रमुख का पद प्रस्ताव दिया लेकिन उन्होंने मना कर दिया | वो पंजाब गये जहा पर आर्य समाज और सनातन के बीच एक वैचारिक संघर्षो की मध्यस्थता की | इसके बाद लाहौर , दिल्ली और खेतड़ी की छोटी छोटी यात्राये करने के बाद जनवरी 1898 को कलकत्ता आ गये |उन्होंने कई महीनों तक वहा पर अपने अनुयायीयो को प्रशिक्षित किया | स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) ने रामकृष्ण को समर्पित एक प्रार्थना “खंडन भव खंडन ” की रचना की |

द्वितीय विदेश यात्रा और जीवन के अंतिम वर्ष [1899–1902] Second visit to the West and final years of Swami Vivekananda

Swami Vivekananda death

स्वास्थ्य में गिरावट के बावजूद जून 1899 स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) दुसरी बार सिस्टर निवेदिता और स्वामी तुरीयानन्द के साथ विदेश यात्रा के  लिए रवाना हो गये | कुछ समय इंग्लैंड में रुककर वो अमेरिका गये और सेन फ्रांसिस्को और न्यू यॉर्क में वेदान्त समाज की स्थापना की और कैलिफ़ोर्निया में शांति आश्रम की स्थापना की | 1900 में Swami Vivekananda धर्म महासम्मेलन के लिए पेरिस गये | पेरिस में उन्होंने लिंग पूजा और भगवदगीता के अस्तित्व पर भाषण दिया | इसके बाद ब्रिटेनी , विईना , इस्तांबुल , एथेंस और इजिप्ट की यात्राये की | 9 दिसम्बर 1900 को Swami Vivekananda फिर भारत लौट आये |

मायावती के अद्वैत आश्रम में चोटी यात्रा करने के बाद वो बेलूर मठ में बस गये जहा रामकृष्ण मिशन के कामो को देश विदेश में जारी रखा | उनको राजघराने और राजनेताओ सहित कई लोग मिलने आते |Swami Vivekananda विवेकानंद स्वास्थ्य ठीक नही होने के कारण 1901 में जापान में हुए धर्म महासम्मेलन में भाग नही ले सके | उन्होंने बोधगया और वाराणसी में तीर्थयात्राए की | खराब स्वास्थ्य की वजह से उन्होंने अपनी गतिविधियो पर अंकुश लगा दिया |

4 जुलाई 1902 को स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) जल्दी उठे और बेलूर मठ के पूजास्थल पर जाकर तीन घंटे तक ध्यान किया | उन्होंने शिष्यों को शुक्ल यजुर्वेद , संस्कृत व्याकरण और योग के सिधान्तो को सिखाया | शाम को 7 बजे विवेकानंद अपने कमरे में गये और किसी को परेशान करने से मना किया और रात 9 बजकर 10 मिनट पर योग करते हुए Swami Vivekananda ने प्राण त्याग दिए | 39  वर्ष के अपने संक्षिप्त जीवन में पुरे विश्व में हिंदुत्व का पाठ पढ़ाने वाले महान नायक का शरीर परमात्मा में विलीन हो गया | उनके अनुयायीयो के अनुसार उन्होंने महासमाधि ली थी जबकि उनके दिमाग में रक्त का थक्का जमना  उनकी मौत का कारण था | उनके अनुयायी इसे ब्रह्मरंध्र कहते थे | Swami Vivekananda विवेकानंद ने पहले ही भविष्यवाणी की थी कि वो 40 वर्ष से ज्यादा जीवित नही रहेंगे |उनका बेलूर में गंगा के तट पर चन्दन की लकडियो पर दाह संस्कार हुआ जहा पर 16 वर्ष पहले रामकृष्ण का दाह संस्कार हुआ था |

स्वामी विवेकानंद के अनमोल विचार | Swami Vivekananda Quotes in Hindi

  • उठो जागो और तब तक मत रुको जब तक कि तुम अपनी मंजिल को प्राप्त ना कर लो
  • आप धीरे धीरे आगे बढे और एक दिन आप संसार हिला सकते है तूफान मचा दो तूफान
  • एक अच्छे चरित्र का निर्माण हजारो बार ठोकर खाने के बाद ही होता है
  • सबसे बड़ा धर्म है अपने स्वाभाव के प्रति सच्चे होना , स्वयं पर विश्वास करो |
  • पहले हर अच्छी बात का मजाक बनता है , फिर विरोध होता है और फिर उसे स्वीकार कर लिया जाता है
  • संभव की सीमा जानने का केवल एक ही तरीका है ,असम्भव से भी आगे निकल जाना
  • जीवन में ज्यादा रिश्ते होना जरुरी नही है , पर जो रिश्ते है उनमे जीवन होना जरुरी है 
  • इन्सान को जीवनपर्यंत सीखते रहना चाहिए , सीखने की कोई उम्र नही होती और अनुभव की आपका शिक्षक है
  • इन्सान को पवित्रता , दृढ़ता और संयम तीनो साथ रखने चहिये जो आपको उचाइयो तक पहुचायेगा
  • ज्ञान एक बर्तमान है इन्सान केवल उसकी खोज करता है
  • यदि तुम संसार पर उपकार करना चाहते हो तो जगत पर दोषारोपण करना छोड़ दो
  • लोग तुम्हारी प्रशंशा करे या निंदा , धन तुम्हारे पास हो या ना हो लेकिन न्याय के मार्ग से कभी नही भटकना चाहिए
  • जिस दिन आपके सामने कोई समस्या ना आये आप समझ लो कि आप गलत रास्ते पर चल रहे है
  • अपनी अंतरात्मा के अलावा किसी के समक्ष मत झुको क्योंकि जब तक तुम स्वयं में भगवान नही देखोगे तब तक मुक्त नही हो पाओगे |
  • सांसारिक मनुष्यों के लिए जीवन एक प्रेम है लेकिन सन्यासियों के लिए प्रेम एक मृत्यु है
  • जो इन्सान जन्म से मुक्ति चाहता है उसे एक जन्म में ही हजारो कार्य करने पड़ते है |
  • जिस समय जिस काम के लिए प्रतिज्ञा करो ,ठीक उसी समय पर उसे करना चाहिए नही तो लोगो का विश्वास टूट जाता है

युवाओ की प्रेरणा बनने वाले इस महान राष्ट्रभक्त के जन्म को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है | अगर युवाओ को हमारा लेख पसंद आया हो तो स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) की इस जीवनी पर अपने विचार जरुर बताये |

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  1. इस संसार में बहुत कम ही ऐसे महापुरुष हुवे हैं जिन्होंने जो जो कहा वो कर दिखाया और अपनी मन मंदिर से ऐसे ऐसे विचार इस समाज को दिए जिसे युगो युगो तक सहराया जाएगा. स्वामी विवेकानद की बाते हर मुश्किल घडी में मुझे सहारा देती हैं. ऐसे महान पुरुष को मेरा शत शत नमन!

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