साम्सो द्वीप , जहा का हर घर है पॉवरहाउस | Samso Island Facts in Hindi

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Samso Island Facts in Hindi
Samso Island Facts in Hindi

आज जब पुरी दुनिया में तेल , कोयले जैसे संसाधन पुरी तरह समाप्त हो रहे है तब सभी देशो का ध्यान अक्षय उर्जा की तरफ गया है | आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जहा कुछ देश सभी अक्षय उर्जा की ओर कदम ही बढ़ा रहे है वही कुछ द्वीप अक्षय उर्जा के प्रयोग से उर्जा के मामले में आत्मनिर्भर हो चुके है | डेनमार्क का साम्सो भी ऐसा ही एक द्वीप है | आइये इस देश के बारे में हम आपको विस्तार से बताते है

अभिशाप को बनाया वरदान

साम्सो में ठंड के मौसम में उत्तरी सागर की तरफ से आनेवाली तेज ठंडी हवा वहा के जनजीवन को काफ़ी मुश्किल बनाती है लेकिन इसी हवा के सहारे वहां के निवासियों ने अपने लिए बिजली की समस्या का सम्पूर्ण समाधान निकाल लिया है | लगभग 4000 की आबादी वाले इस गाँव में 21 टरबाइन लगाये गये है | जमीन पर लगे ये टरबाइन 50 मीटर तक की उंचाई के है | एक ब्लेड की लम्बाई 27 मीटर तक है | इसके मुकाबले समुद्र में लगे टरबाइन 63 मीटर तक की उंचाई के है |

इस तरह के टरबाइन से औसतन एक साल में 20 करोड़ रूपये प्रति टरबाइन के खर्च पर प्रति घंटे 10 लाख किलोवाट तक की बिजली की उत्पति होती है | समुद्री टरबाइन में इससे आधे से भी कम खर्च आता है | एक वक्त था जब यह द्वीप कोयले से चलनेवाले बिजलघरो द्वारा बिजली उत्पादित करता था इससे एक तो इसकी सारी आवश्कताए पुरी नही हो पाती थी साथ ही यहा का वातावरण भी काफी प्रदूषित हो चूका था |

पवन उर्जा के विकास के बाद यहा के पर्यावरण में भी जबरदस्त तरीके से सुधार हुआ | वर्तमान में साम्सो एक वेकेशन आइलैंड के रूप में भी विकसित हो चूका है | हर साल लगभग 50 हजार यूरोपियन और डेनिश पर्यटक यहाँ गर्मियों की छुट्टिया बिताने के लिए आते है | 22 गाँव वाले इस छोटे से आइलैंड साम्सो में , जहा पवन उर्जा द्वारा शत प्रतिशत वही सम्पूर्ण डेनमार्क में 20 प्रतिशत उर्जा आवश्कताए पवन उर्जा से पुरी की जाती है |

संसाधनों का सदुपयोग

कभी कभी हवा न चलने की स्थिति में या फिर टर्बाइन की मरम्मत के दौरान बिजली की कमी न हो इसके लिए द्वीप पर एक दूसरा विकल्प भी मौजूद रहता है | आमतौर पर खेतो से निकलने वाले गेंहू , जौ ,धान आदि की बालियाँ , जिसे चारे के रूप में प्रयोग में लाया जाता है लेकिन यहाँ उन बालियों को जलाकर उनसे ऊष्मा तैयार की जाती है | इसका इस्तेमाल पानी गर्म करने में किया जाता है जिसे पाइपो द्वारा लगभग 260 घरो में भेजा जाता है | इन सभी प्रयासों का नतीजा यह है कि आज साम्सो में कोयला चालित बिजलीघर की आवश्यकता न के बराबर रह गयी है यहा अब कोयले से चलने वाला सिर्फ एक ही बिजलीघर है इसके द्वारा भी कार्बन उत्सर्जन की दर अत्यंत कम है |

एयरो द्वीप भी है एक मिसाल

डेनमार्क के दक्षिणी हिस्से में स्थित एयरो भी सस्टेनेबल एनर्जी आइलैंड के रूप में जाना जाता है लेकिन यह सिर्फ पवन उर्जा पर निर्भर न रहकर पवन और सौर दोनों ही उर्जा के प्रयोग को बढ़ावा दे रहा है | इसका कारण यह है कि डेनमार्क के अन्य सभी हिस्सों की तुलना में इस आइलैंड में सूर्य प्रकाश अधिक समय तक और अधिक मात्रा में मौजूद रहता है | इस कारण इस आइलैंड पर सौर उर्जा का भी प्रयोग सम्भव हो पाया है |यहा के अधिकतर घरो में फोटोवोल्टिक सेल्स और हीट पम्पस लगे हुए है |

यहा की स्थानीय सरकार द्वरा यहा के प्रत्येक घर की छत पर फोटोवोल्टिक सेल्स के साथ ही अन्य रिन्यूएबल एनर्जी सिस्टम्स भी लगाये गये है | साथ ही यहा इलेक्ट्रिक कारो के प्रयोग को भी बढ़ावा दिया जा रहा है | वर्तमान में इस द्वीप की उर्जा आवश्यकताओ का 55 प्रतिशत सौर उर्जा , पवन उर्जा और बायोमास से पूरा किया जाता है इसके लिए लोगो को इससे जुडी सामान्य शिक्षा देने के साथ ही सम्बन्धित उपकरण भी उपलब्ध कराए जाते है | यह एक ऐसा आइलैंड है जहा लगभग हर घर में बिजली का उत्पादन होता है |

हमारे देश भी हो रहे है प्रयास

भारत में भी Renewable Energy की दिशा में कदम बढाते हुए कई शहरों में इसकी शुरुवात कर दी है | कोच्चि हवाई अड्डे को पुरी तरह सौर उर्जा चालित बनाने के बाद इस कड़ी में नया नाम सुरत का भी जुड़ गया है | सुरत नगरपालिका शहर की इमारतो की छत पर और अपने अधिकार क्षेत्रवाली जमीनों पर सोलर पैनल लगाकर सौर उर्जा पैदा करने की योजना बना रही है | इस योजना के तहत लोगो के घरो , शैक्षणिक संस्थानों , व्यावसायिक प्रतिष्टानो की छतो और कई अन्य जगहों पर सोलर पैनल लगाये जायेंगे | इसमें नेट मीटरिंग सिस्टम लगा होगा | इससे लोग सौर उर्जा से अपने लिए खुद बिजली पैदा कर पाने में सक्षम होंगे | बची हुयी बिजली को ग्रिड भेज दिया जाएगा और उसके बदले उपभोक्ताओ को पैसे का भुगतान किया जाएगा | इससे बिजली बिल काफी कम होने के साथ ही अक्षय उर्जा के स्त्रोतों को भारत में बढ़ावा भी मिलेगा |

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