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मातृ-पितृ पूजन दिवस पर निबन्ध | Parents Worship Day Essay in Hindi

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मातृ-पितृ पूजन दिवस पर निबन्ध | Parents Worship Day Essay in Hindi
मातृ-पितृ पूजन दिवस पर निबन्ध | Parents Worship Day Essay in Hindi

जिन माता-पिता के कारण हम लोगो ने इस संसार में जन्म धारण किया है और संसार के सभी प्राणियों में श्रेष्ठ समझे जाते है उन माता पिता की पूजा करने का कोई विशेष दिन तो नही होता है लेकिन मातृ-पितृ पूजन दिवस के जरिये उन पुत्रो तक यह संदेश पहुचाया जाता है कि माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्यो को कभी ना भूले | माता-पिता के प्रति हमारे कौन कौन कर्तव्य है उनका प्रतिपालन करना पुत्र का प्रथम कर्तव्य है |

माता-पिता के कार्य

हमारे कल्याण तथा आराम के निमित्त माता-पिता ने जितना कष्ट उठाया है उसका चतुर्थांश भेई संसार में अन्य किसी व्यक्ति से होना असम्भव है | माता भोजनादि में अनके प्रकार का संयम करती हुयी जैसे नौ मास तक सन्तान को गर्भ में रखती है उसका अनुभव सहृदय व्यक्ति ही कर सकते है | उस समय माता पीड़ा से बैचैन होती हुयी भी अपने आराम के निमीत किसी ऐसी वस्तु का सेवन नही करती जिससे गर्भ स्थित सन्तान को कष्ट हो |

संतानोत्पत्ति होने पर अपने सुख-दुःख की तनिक भी परवाह नही करती | शरीर तथा कपड़े पर मल-मूत्र त्याग करते रहने पर भी माता , वह दुखी न हो अत: आनन्दपूर्वक उसके लालन-पालन में लगी रहती है | संतानोत्पत्ति के लिए अपने सुख-विलास का परित्याग कर देती है | दिनभर बच्चे को गोद में लिए खाना-पीना भी भूल जाती है और रात को निश्चिंत सोना स्वप्न हो जाता है |

ऐसे ही पिता भी सन्तान के कल्याणार्थ अनके कष्ट उठाकर द्रव्योपार्जन करता है | किसी उत्तम पद को पाकर माता-पिता सन्तान के लिए धन रख देते है | पुत्र को योग्य एवं शिक्षित बनाने के लिए अपना सम्पूर्ण धन लगा देने में भी आनन्द समझते है | पुत्र के कल्याणार्थ द्वार द्वार पर जाकर भिक्षा जैसे नीच काम करने में भी लज्जित नही होते है | प्रयत्क्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सदा सन्तान की मंगलकामना में व्यस्त रहते है |

यदि सन्तान को किसी प्रकार की बीमारी हो जाए तो रात-दिन खाना-पीना एवं सोना छोडकर उसकी सेवा में लगे रहते है | यदि अपना प्राण दें देने पर भी कोई पुत्र के अच्छे हो जाने का उपाय बताये तो सहर्ष उसे करने के लिए तैयार हो जाते है | बाबर ने अपने हुमायु की बीमारी में ईश्वर से ऐसे ही प्रार्थना की थी | पुत्र के बड़े हो जाने पर भी माता-पिता का प्रेम-भाव वैसा ही बना रहता है |

माता और पिता इन शब्दों के उच्चारण द्वारा भी दुःख की मात्रा को कम करके आनन्द प्रपात करते है | यदि माता-पिता हम लोगो के निमित इतने कष्ट न उठाते तो हम लोगो का जीना ही कठिन था | यदि वे हमारी शिक्षा इत्यादि का प्रबंध न करते तो कदाचित पशुओ और हममे कुछ भी अंतर नही होता |

माता-पिता के प्रति हमारा कर्तव्य

जिन माता-पिता ने हमारे लिए इतना किया है उनसे हम लोग किसी प्रकार से उऋण नही हो सकते | तथापि हम लोगो को उचित है कि सर्वदा यही प्रयत्न करे जिससे वे हमसे प्रसन्न रहे | उनकी आज्ञाओं का सदा पालन करना ही हमारा कर्तव्य है | तुलसीदास जी ने कहा है |

मात पिता अरु गुरु की बानी , बिनही विचार करिये शुभ जानी |

राम ने अयोध्या के वृहद राज्य को परित्याग कर पितृ भक्ति का सच्चा आदर्श दिखाया } भीष्म पितामह ने अपने पिता की इच्छापूर्ति के निमीत आजीवन अविवाहित रहने की भीषण प्रतिज्ञा का पालन कर अपनी कीर्ति को अजर-अमर कर दिया | माता कुंती की आज्ञा पर भीम को राक्षस के मुख में जाते हुए भी संकोच न हुआ |

माता-पिता का दर्जा संसार में सबसे बड़ा हुआ है | इनकी सेवा से परमेश्वर तथा सब देवता प्रसन्न होते है | वृद्धावस्था में उन्हें देवतुल्य मानकर इनकी सेवा तथा पालन-पोषण करना हम लोगो का परम धर्म है | घर में वृद्ध पिता को छोडकर कठिन तपस्या करने से भी कुछ फल नही मिलता | यदि लोग ईश्वर को प्रसन्न तथा अपनी कीर्ति को संसार में स्थापित करने की अभिलाषा रखते है तो साक्षात् देवी-देवस्वरूप माता-पिता की नित्य पूजा करे |

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