आइये राजस्थान के स्वर्ग माउंट आबू की सैर करे | Mount Abu Travel Guide in Hindi

Loading...
आइये राजस्थान के स्वर्ग माउंट आबू की सैर करे | Mount Abu Travel Guide in Hindi
आइये राजस्थान के स्वर्ग माउंट आबू की सैर करे | Mount Abu Travel Guide in Hindi

पश्चिमी भारत के राज्य राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित माउंट आबू एक ऐसा Hill Station है जो अरावली वन रेंज में गुजरात बॉर्डर के साथ लगा हुआ है | 22 किमी लम्बाई और 9 किमी चौड़ाई के इस क्षेत्र का गुरु शिखर पर्वतीय चोटी समुद्र तल से 5650 फुट की ऊँचाई पर स्तिथ है | यह स्थान नदियों ,झीलों ,झरनों एवं पर्वतीय क्षेत्र की जंगली हरियाली के कारण सहज ही पर्यटकों का मन मोह लेता है |अर्बुदा पर्वत की पहाडियों जिन्हें आबू पर्वत या फिर माउंट आबू कहते है का इतिहास छठी शताब्दी से जुड़ा है | यह क्षेत्र गुर्जरों के कारण जाना जाता रहा है | मुगलकाल से ही इस क्षेत्र को Land of Gurjar यानि गुर्जर भूमि के रूप में पहचान मिली है | राजस्थान और गुजरात के इसी आबू पर्वत क्षेत्र में सर्वाधिक हरियाली और अच्छा मौसम है | इसी कारण यहाँ बसे गुर्जर अपने मवेशियों के साथ यहा खुश रहते है |

सन 1331 तक राव लुम्बा देवर चौहान और परमार वंश का प्रतिनिधित्व माउंट आबू की भूमि पर करते रहे | बाद में उन्होंने अपनी राजधानी यहा से मैदानी क्षेत्र चन्द्रावती के अस्तित्व खोने पर राव शासमल ने सिरोही को अपना मुख्यालय बना लिया था | इसके बाद ब्रिटिश शाषन में सिरोही के महाराजा के आवास के रूप में इस मुख्यालय का उपयोग किया गया जिसे राजपुताना यानि राजस्थान कहते है |माउंट आबू को अर्बुदाचल भी कहते है जो ऋषि वशिष्ठ की धरती भी रही है | माउंट आबू का वशिष्ठ आश्रम भी ख्यातिप्राप्त है जिसे देखने के लिए दूर दूर से पर्यटक यहा आते है | एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार अर्बुदा क्षेत्र को भगवान शिव के नन्दी की जीवन रक्षा करने वाला क्षेत्र भी माना गया है | इस क्षेत्र को अर्बुदारन्य भी कहा जाता है |

माउंट आबू में सूर्यास्त का दृश्य देखने का बहुत क्रेज है | इसे हिन्दुओ के मन्दिरों का घर भी कहा गया है | यहा अधर देवी का मन्दिर जिसे अर्बुजा देवी मन्दिर भी कहा जाता है के साथ साथ रघुनाथ जी मन्दिर ,भगवान दत्तात्रेय मन्दिर ,जैन मन्दिरों की श्रुंखला जिनमे दिलवाड़ा जैन मन्दिर भी शामिल है यहा के खास आकर्षण है | साथ ही 13वी शताब्दी का विमल वसाही मन्दिर  , जैन  तीर्थंकर ,अचलेश्वर महादेव एवं कान्तिनाथ मन्दिर भी दर्शनीय है | यहा के दुर्ग मन्दिर एवं अम्बिका माता मन्दिर जाना भी पर्यटक नही भूलते |

आबू पर्वत और सुहावना मौसम

माउंट आबू का मौसम बहुत ही सुहावना है | सामान्यत: सर्दियों में यहा का औसत तापमान 16 डिग्री सेल्सियस से 22 डिग्री सेल्सियस तक रहता है लेकिन रात के समय यह तापमान घटकर 4 से 12 डिग्री सेल्सियस तक रह जाता है | कभी कभी माउंट आबू का तापमान भारी सर्दियों में शून्य से 3 डिग्री नीचे तक पहुच जाता है | हालांकि गर्मियों में कितनी भी गर्मी क्यों न हो , यहा का तापमान 36 डिग्री सेल्सियस के पार नही पहुचता जबकि बरसात में भी कई बार तापमान कम हो जाने से लोग ठंड का आभास करने लगते है

यही कारण है कि तो गर्मी के मौसम में जब पूरा राजस्थान और गुजरात तपता है तो माउंट आबू ही ऐसी जगह है जहा सुहावने मौसम एवं हरे भरे वातावरण के कारण इसे धरती का स्वर्ग भी कहा जाता है | साथ ही ब्रह्मा कुमारियो का मुख्यालय होने से एवं परमात्मा से साक्षात अनुभूति होने से स्वर्ग सा सुखद आनन्द प्राप्त होता है जिस यहा आने वाले कभी नही भूल पाते है |

दिलवाड़ा का जैन मन्दिर

राजस्थान का स्वर्ग माउंट आबू यु तो अपनी प्राकृतिक घटा और अद्वितीय सौन्दर्य के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है लेकिन यह सतना प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के साथ साथ दिलवाडा के अनुपम जैन मन्दिरों के लिए भी विश्व प्रसिद्ध है | सफेद संगमर मर से शिल्पकला के बेजोड़ नमूने के रूप में विश्व प्रसिद्ध 5 जैन मन्दिरों के इस समूह को देखने के लिए माउंट आबू से करीब 3 किमी दूर दिलवाड़ा जाते है | इस मन्दिर में कैमरा एवं मोबाइल ले जाना पुरी तरह प्रतिबंधित है | इन मन्दिरों का निर्माण सन 1231 में तत्कालीन राज्यमंत्री रहे दो भाइयो ने कराया था |

संगमर मर के पत्थर पर बारीक नक्काशी और भगवान महावीर स्वामी की बेशकीमती प्रतिमाओं से सुसज्जित मन्दिरों को देखकर लगता है जैसे उस काल में पहुच गये हो जिस काल में मन्दिरों का निर्माण हुआ था | इन मन्दिरों में छत की भी नक्काशी की गयी है | छत पर लटकता झूमर ,नृत्य करती नृत्यांगनाओ की प्रतिमाओ ,फुल पत्तो से सजी बेल ,संगमरमर के पत्थर पर इस प्रकार तराशी गयी है कि पत्थर खुद बोलने को आतुर लगे रहते है | यही अचलगढ़ के जैन तीर्थ में 1444 मन की पंचधातु से बनी प्रतिमा देखकर पर्यटक सम्मोहित हो जाते है |

अचलेश्वर महादेव मन्दिर

जैन मन्दिरों की श्रुखला देखने के बाद अचलगढ़ के उस मन्दाकिनी कुंड में जाते है जहा तीन पाड़ा यानि भैसा रुपया राक्षसों की प्रतिमाये लगी है | बताया जाता है कि ये राक्षस इस क्षेत्र में तपस्या कर रहे ऋषियों ,महात्माओ और संतो को बहुत प्रेषण करते थे | ऋषि महात्मा पूजा पाठ एवं यज्ञ इत्यादि के लिए जो घी अपनी कुटिया में रखते थे राक्षस वह घी जबरन पी जाते थे | राक्षसो की इस हरकत से परेशान ऋषियों ने आबू के राजा आदिपाल से शिकायत की तो बताते है कि उन्होंने तीर से तीनो पाड़ा रूपी राक्षसो का संहार कर दिया था|

इस घटना की याद में मन्दाकिनी कुंड बना हुआ है | यह कुंड 900 फुट लम्बा एवं 240 फुट चौड़ा है जिसके किनारे पर इन तीनो पाडो (भैसों) की विशालकाय प्रतिमाये स्थापित है जिसे देखने के लिए देश विदेश से पर्यटक यहा आते है | इस कुंड से थोड़ी ही दूर पर स्थित है अचलेश्वर महादेव मन्दिर | करीब 2500 साल पुराने इस मन्दिर में भगवान शिव की शिवलिंग पिंडी प्रतिष्टित नही बल्कि शिवलिंग का स्थान पूर्णत: खाली है उअर यहाँ शिवलिंग के स्थान पर भगवान शिव के पैर के अंगूठे की ही पूजा होती है |

नक्काशी एवं वास्तुकला के बेजोड़ नमूने के लिए प्रसिद्ध इस मन्दिर के द्वार पर दोनों और विशालकाय प्रतिमाये लगी है तो विराट स्वरूप में पांच धातुओ के मिश्रण से बनी नन्दी प्रतिमा पर मन्दिर का विशेष आकर्षण है | कहा जाता है इस मन्दिर में माँगी गयी मुराद भगवान भगवान शिव सहजता के साथ पुरी कर देते है | इस मन्दिर के खजाने को लुटने के लिए अहमदाबाद के बादशाह मोहम्मद बेगडा ने मन्दिर पर आक्रमण किया था | बादशाह के द्वारा मन्दिर पर कराए गये प्रहारों के चिन्ह आज भी यहा नजर आते है |

सन 19 79 में सिरोही रियासत के युवराज ने इस मन्दिर का जीर्णोद्धार किया और संगमरमर से मन्दिर के बाहरी आवरण की साज सज्जा की | इस मन्दिर की परिक्रमा क्र श्रुधालू स्वयं को धन्य समझते है |

माउंट आबू की शान नक्की झील

अपने अद्वितीय सौन्दर्य एवं प्राकृतिक छटा से सबका मन मोह लेने वाली माउंट आबू की प्रसिद्ध नक्की झील देखे बिना माउंट आबू की यात्रा अधूरी मानी जाती है | चारो ओर से हरे भरे वृक्षों की कतारों और ऊँची पहाडियों से घिरी नयनाभिराम यह नक्की झील अपने अंदर का एक अनूठा इतिहास समेटे हुए है | कहा जाता है कि बालम रसिया नामक एक सिद्ध पुरुष ने अपने हाथ के नाखुनो से धरती खोदकर यह झील बनाई थी | नाखुनो से खुदाई कर बनी इस झील का नामकरण इसी कारण नक्की झील के रूप में हुआ |

इस झील में नौका विहार का अपना ही आनन्द है | पर्यटकों को लुभाने के लिए इस झील में नौकाये कतारबद्ध होकर वहा खडी रहती है और तय किया हुआ किराया लेकर नाविक इस झील की सैर कराते है | लगता है स्वर्गलोक पर नौका विहार का रसानन्द मिल रहा हो | इस झील के दक्षिण पश्चिम में के ऊँची पहाड़ी पर मेंढक के आकार में झांकती एक शिला प्राकृतिक रूप में एक करिश्मा नजर आती है जिसे रॉक रोड कहा जाता है |

 

Loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *