महाभारत कथा – लाक्षागृह और पांड्वो का बच निकलना Mahabharat-Lakshagraha and Escape of Pandavas

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Pandavas Escape From Lakshagruhपांड्वो के निरंतर बढ़ते बल कौशल को देखकर दुर्योधन चिंतित होने लगा और पांड्वो का विनाश करने की योजना बनाने लगा | दुर्योधन की हर योजना में मामा शकुनि और कर्ण उनके साथ रहते थे और पुत्र प्रेम के कारण धृतराष्ट्र भी उनका साथ देते थे | पांड्वो की लोकप्रियता के चलते जनता युधिष्ठिर को सिंहासन पर देखन चाहते थे | जनता के अनुसार धृतराष्ट्र के अंधे होने के कारण छोटे भाई पांडू ने राजपाट संभाला था और पांडू की मृत्यु ले पश्चात अब युधिष्ठिर सिंहासन का योग्य उत्तराधिकारी है| भीष्म पितामह भी जनता के फैसले से सहमत थे लेकिन आंतरिक कलहो के कारण चुप थे |

एक दिन दर्योधन ने धृतराष्ट्र से कहा कि “पिताश्री , आप जानते है कि आपके नेत्रहीन होने के कारण आप जयेष्ट होते हुए भी राज सिंहासन पर नही बैठ सके और आपके छोटे भाई पांडू को सारी सत्ता मिल गयी थी , अब यदि वापस युधिष्ठिर सिंहासन पर बैठ जाएगा तो सदैव के लिए हम राजसिंहासन से वंचित रह जायेंगे और हम इस अपमान को सहन नही कर सकते है ” | धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को समझाया कि युधिष्ठिर धर्म का पालन करता है और उसके पिता की तरह गुणवान है इसलिए जनता उनकी प्रिय है और उसके विरुद्ध कोई कदम लेना अनुचित होगा | लेकिन दुर्योधन मानने वाला कहा था और उसने पांड्वो का विनाश करने की योजना बनाई |

योजना के अनुसार दुर्योधन ने पांड्वो को बहला फुसलाकर वारणावत के मेले में भेजने की योजना बनाई | उसने पांड्वो को मेले की भव्यता और शोभा की गाथा सुनाकर वारणावत जाने के लिए उत्सुक किया | अंत मर पांड्वो ने खुद धृतराष्ट्र से मेले एम् जाने की अनुमति माँगी | अब सभी पांडव माता कुंती के साथ वारणावत के लिए प्रस्थान कर गये | उधर दुर्योधन पांड्वो को योजनानुसार वारणावत भेजकर प्रफुल्लित हो रहा था | अब आगे की योजना के लिए दुर्योधन ने अपने मंत्री और शिल्पकार पुरोचन को बुलाया और उसे गुप्त योजना की जानकारी दी | पुरोचन दुर्योधन की योजना के अनुसार काम सफलतापूर्वक समाप्त करने का वचन देकर वारणावत के लिए रवाना हो गया |

पुरोचन एक गुप्त मार्ग और शीघ्रगामी रथ से पांड्वो से पहले वारणावत पहुच गया और योजना में लग गया | योजना के अनुसार पुरोचन को एक लाख और ज्वलनशील पदार्थो से मिलकर एक महल बनवाना था जिसमे रात्री के समय पांड्वो के सो जाने के पश्चात आग लगा देने की योजना थी | दुर्योधन के आनुसार इस योजना से कौरवो पर संदेह बिना पांड्वो का नाश हो जाएगा |

उधर पांडव वारणावत पहुच चुके थे और लाक्षागृह का निर्माण पूरा ना होने से पहले उन्हें किसी अन्य महल में रखा गया था | विदुर जी को दर्योधन के षडयंत्र का पता चल गया था और इस योजना की जानकारी गुप्त रूप से उन्होंने युधिष्ठिर तक पंहुचा दी थी | युधिष्ठिर को सारी योजना की खबर होते हुए भी कौरवो के कथनानुसार चल रहे थे | वारणावत पह्चुने पर उनका ग्रामवासियों ने भव्य स्वागत किया और मेले का आनन्द लेने लगे | उधर पुरोचन एन अब लाक्षागृह तैयार करवा दिया था और पांड्वो को अब लाक्षागृह में ले जाया गया | भवन में प्रवेश करते ही युधिष्ठिर ने पुरे महल को ध्यान से देखा और विदुर की सुचना उनको सत्य लगी जिसके अनुसार ये महल ज्वलनशील पदार्थो से बना था जो शीग्र समाप्त होने वाला था |

युधिष्ठिर ने अपने सभी भाइयो की इसकी सुचना दी और उनको विचलित ना होने का आश्वासन दिया | युधिष्ठिर ने पांड्वो को समझाया कि “पुरोचन को तनिक भी ये पता नही लगना चहिये कि उसकी योजना का हमे पता लग गया है | हम यहा समय आने पर भाग निकलेंगे लेकिन हमे भी ऐसी योजना बनानी चाहिए जिससे पुरोचन को संदेह ना हो ” | अब विदुर जी ने एक सुरंग बनाने वाला कारीगर वारणावत भेजा जिसें गुप्त रूप से पांड्वो से भेट की | पांड्वो ने उस कारीगर को सांकेतिक भाषा में अपनी योजना बताई और जिसके अनुसार उसको महल के भीतर से बाहर की और एक गुप्त सुरंग का निर्माण करना था |

अब वो कारीगर अपने साथोयो के साथ पहरेदारो के वेश में अंदर आ गये और सुरंग निर्माण का कार्य प्रारभ कर दिया | कारीगरो ने दिन रात मेहनत कर कुछ दिनों में ही पांडव महल से जंगल तक एक सुरक्षित सुरंग का निर्माण कर दिया था | पांड्वो और कारीगरों ने इस कार्य को इतनी सावधानी से किया कि पुरोचन को इस बारे में भनक भी नही लगी | पुरोचन भी महल के द्वार पर रहने लग गया और पांड्वो पर नजर रखने लगा | एक दिन पुरोचन को योजना को पूरा करने के लिए सही अवसर मिल गया और युधिष्ठिर भी उसके हाव भाव से उसके इरादों को भांप गया था |

अब युधिष्ठिर के कहने पर माता कुंती ने एक मह्भोज का आयोजन किया जिसमे सभी ग्रामवासियों को भोजन कराया गया | भोजन का आनद लेकर पुरोचन सहित उसके सभी सैनिक गहरी नींद में सो  गये | अब युधिष्ठिर के कहने पर भीम ने पुरे लाक्षागृह में अलग अलग जगह पर जाकर पुरे महल में आग लगा दी और अंत में पांडव महल में आ गये | अब पांडव माता कुंती के साथ उस सुरंग से होते हुए लाक्षागृह से बाहर निकलकर वन में आ गये थे | उधर लाक्षागृह पुरी तरह जलकर ख़ाक हो गया और उस भवन में पुरोचन सहित कौरवो एक सभी सैनिक आग में जलकर भस्म हो गये | स्थानीय जनता पांड्वो के भवन में आग देखकर इसका दोषारोपण कौरवो पर थोपने लगे |

Pandav Escapeअब हस्तिनापुर तक लाक्षागृह की सुचना पहुच गयी थी कि पांड्वो के महल में भीषण आग से कोई भी पांडव शेष नही बचा | इस सुचना को सुनते ही दुर्योधन मन ही मन तो बहुत प्रसन्न हुए लेकिन जनता के समक्ष पांड्वो की मृत्यु का शौक मनाया | कौरवो ने कुंती और पांड्वो को जलांजलि दी और विलाप करते हुए महल में लौट गये | विदुर जी ने शोक को मन में दबा दिया था क्योंकि उन्को पूर्ण विश्वास था कि पांडव लाक्षागृह से सुरक्षित निकल गये होंगे | पितामह भीष्म भी शोक के सागर में डूब गये थे लेकिन विदुर ने केवल उनको पांड्वो के लाक्षागृह से बचाव की योजना बताकर चिंतामुक्त कर दिया था |

उधर पांडव और कुंती लाक्षागृह को जलता छोडकर जंगल में आ गये थे और इस सारे प्रयासों में काफी थक गये थे | केवल भीम ही एकमात्र शक्तिशाली इन्सान था जिसको थकन नही आती थी | उसने अपनी माता और भाइयो को अपने कंधो पर बिठाकर उन्मत हाथी की तरह चलते हुए जंगल में काफी दूर निकल गये जहा वो सुरक्षित रहे | अब वो गंगा तट पर पहुच गये जहा विदुर ने उनकी सहायता के लिए नाव भेज रखी थी | केवट उनको नाव में बिठाकर सुरक्षित स्थान तक पंहुचा दिया |

अब पांडव और कुंती उस जंगल में रात बिताई | अगले दिन उन्होंने सोचा कि अब पेट भरने के लिए कुछ तो प्रयास करना पड़ेगा तो कुंती ने सभी भाइयो ब्राह्मण का वेश धारण कर निकट के गाँव से भिक्षा मांग कर लाने को कहा | पांचो भाई भिक्षा में जो भोजन लाते उसका आधा हिसा भीम को और बचे आधे हिस्से के पांच भाग कर चारो भाइयो को देकर खुद भी खा लेती थी | भीम की भूख कभी खत्म ही नही होती थी और भोजन उसके लिए बहुत कम पड़ जाता था इसलिए भीम ने एक कुम्हार से मित्रता कर घड़े बनाने का कार्य शुरू कर दिया | इस तरह सभी पांडव और माता कुंती वन में जीवन व्यतीत करने लगे |

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  1. लाक्षागृह की कथा लिखने वाले यह क्यों भूल जाते हैं की युधिष्ठिर कि योजना में भीलनी सहित उनके पांच पुत्रों को भी जलाया गया था|

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