Home धर्म महाशिवरात्रि व्रत कथा | Maha Shivaratri Vrat Katha in Hindi

महाशिवरात्रि व्रत कथा | Maha Shivaratri Vrat Katha in Hindi

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महाशिवरात्रि व्रत कथा | Maha Shivaratri Vrat Katha in Hindi
महाशिवरात्रि व्रत कथा | Maha Shivaratri Vrat Katha in Hindi

महाशिवरात्रि का व्रत फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को किया जाता है | चतुर्दशी के स्वामी भगवान शिव है अत: उनकी रात्रि में किया जाने वाला यह व्रत शिवरात्रि कहलाता है | यह रात्रि शिव-पार्वती के मंगल की रात है | इसी दिन शिव-पार्वती का विवाह हुआ था | शिव पुराण में लिखा है कि भगवान शिव समुद्र मन्थन से निकला विष पीकर मूर्छित हो गये थे | उनकी कुशल कामना करते हुए सारे देवताओं ने उपवास एवं रात्रि जागरण किया था | उसी स्मृति में यह उपवास किया जाता है |

ज्योतिष-शास्त्र के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में चन्द्रमा , सूर्य के निकट होता है अत: वही समय जीवनरुपया चन्द्रमा का शिवरूपी सूर्य के साथ योग-मिलन होता है | इसलिए इस चतुर्दशी को शिव पूजा करने से जीव के अभीष्टतम पदार्थ की प्राप्ति होती है | महाशिवरात्रि का पर्व शिव के दिव्य अवतरण का मंगलसूचक है | महाशिवरात्रि के सन्दर्भ में एक कथा है जो इस प्रकार है |

एक समय पार्वती जी शिवजी के साथ कैलाश पर्वत पर बैठी हुयी थी | उसी समय उन्होंने शिवजी से प्रश्न किया “इस तरह का कोई व्रत बताइए , जिसके करने से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति हो जाए” शिवजी ने जवाब में पार्वती जी को एक कथा सुनाई |

किसी नगर में एक शिकारी रहता था जो शिकार करके अपने परिवार को पालता था | उसने किसी सेठ से ऋण भी ले रखा था | समय पर ऋण न चूका पाने के कारण सेठ ने उसे शिव मठ में बंद कर दिया | संयोग से उस दिन फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि थी इसलिए वहां व्रत संबधी कथा हो रही थी | शिकारी ने भी वह कथा सूनी |

अगले दिन शिकारी को ऋण चूका देने की शर्त पर सेठ ने छोड़ दिया | उस दिन शिकारी जब शिकार के लिए गया तो कोई शिकार नही मिला | भूख-प्यास से बैचैन उसने एक जलाशय के किनारे रात बिताने का निश्चय किया | जलाशय के किनारे एवं बील वृक्ष और उसी के नीच गिरने वाले पत्तो से शिवलिंग आच्छादित हो गया | शिकारी रात-दिन भूखा रहने के कारण अनजाने ही शिवरात्रि का व्रत कर चूका था और शिवलिंग पर बीलपत्र पर भी अर्पित कर चूका था |

एक पहर बीत जाने पर एक गर्भवती हिरणी पानी पीने हेतु जलाशय के किनारे आयी | शिकारी ने उस पर बाण चलाना चाहा तो हिरणी ने विनती की कि मै गर्भवती हु मुझे अभी मत मारो | मै प्रसव पश्चात स्वयं तुम्हारे पास आ जाउंगी ,यदि न आऊ तो जो पाप कृतघ्न को लगता है वह मुझे लग जाए |

रात्रि के दुसरे पहर में एक अन्य हिरणी वहां आयी | शिकारी ने एक बार फिर बाण लगाना चाह | हिरणी ने विनती की कि “मुझे अभी अपने पति से मिलने जाना है उनसे मिलकर मै स्वयं तुम्हारे पास आ जाउंगी ” शिकारी ने उसे भी जाने दिया |

रात्रि के तृतीय पहर में एक अन्य हिरणी अपने बच्चे के साथ पानी पीने आयी | शिकारी ने देखते ही धनुष चढाया | हिरणी ने भी विनती कि “इस बच्चे को हिरण के संरक्षण में छोडकर मै तुम्हारे पास वापस आ जाउंगी” शिकारी ने उस हिरणी को भी जाने दिया | रात्रि के तीसरे पहर में शिकारी ने बीलपत्र तोडकर नीचे डाले जो शिवजी के शीश पर चढ़ गये | शिव का नाप जपते हुए अन्य जीव के आने की प्रतीक्षा करने लगा |

प्रात:काल से पूर्व एक हिरण उस जलाशय पर पाया | शिकारी ने उस पर निशाना साधा तब हिरण ने कहा “हे व्याधराज ! यदि आपने पूर्व में आयी तीन हिरणीयो को मारा है तो मुझे भी मार दीजिये”| शिकारी ने उसे रात्रि की सारी घटना सूना दी | तब हिरण पुन: बोला वे तीनो मेरी भार्या थी जो मुझे खोज रही थी | यदि आप मुझे मार डालेंगे तो वे जिस उद्देश्य से आपसे प्रतिज्ञा करके गयी है वह विफल हो जायेगी “यह सुनकर शिकारी ने उसे भी जाने दिया |

उसके बाद शिकारी ने कुछ बील पत्र तोडकर नीचे डाले जो शिवलिंग पर चढ़ गये | ससुबह होने पर शिकारी बील वृक्ष से नीचे उतरा | शिवरात्रि व्रत के प्रभाव से शिकारी का हृदय परिवर्तित हो गया | वह अपने पापो का प्रायश्चित करने लगा | उसने निश्चय किया कि हिरनियो के लौटने पर भी वह उन्हें नही मारेगा | वह अहिंसा का पुजारी बन गया | शिवजी उससे प्रसन्न हुए उन्होंने दो पुष्पक विमान भेजकर शिकारी तथा हिरण के परिवार को शिवलोक का अधिकारी बनाया | स्कन्द पुराण के अनुसार शिवजी के पूजन ,जागरण एवं उपवास करने वाले मनुष्य का पुनर्जन्म नही होता है |

शिव का अर्थ है कल्याणकारी और लिंग का अर्थ है मूर्ति | शिवलिंग का अर्थ कल्याणकारी ईश्वर की मूर्ति से लगाया जा सकता है | शिवलिंग को ज्योतिर्लिंग भी कहा जाता है क्योंकि ईश्वर का स्वरूप ज्योति-बिंदु के समान ही है | भारत में शिवजी के बाढ़ ज्योतिर्लिग है | शिव अर्धनारीश्वर होकर भी काम विजेता है | गृहस्थ होते हुए भी परम विरक्त है | नीलकंठ होकर भी विष में अलिप्त है | ऋषि-सिद्धियो के स्वामी होकर भी उनसे विलग है | उग्र होते हुए भी मौन है अकिंचन होते भी सर्वेश्वर है

महाशिवरात्रि में शिव की पूजा होती है | शिव एक ही परम तत्व की त्रिमूर्ति में एक है | शिव संहार के देवता है | महाशिवरात्रि के अवसर पर उपवास के महात्म्य की अधिकता है |

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