Home हिंदी कहानिया लोककथा – पंडित जी चतुर निकले

लोककथा – पंडित जी चतुर निकले

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एक था जाट | उसकी दोस्ती एक पंडित से थी | पंडित महाराज का जब जी चाहता , वह उसके यहाँ आकर भोजन प्राप्त करते |

जाट अपने दोस्त को इनकार नही कर पाता था | पंडित जी पुरे पेटू थे | कई लोगो का भोजन एक बार में ही चट कर जाते थे | एक दिन तंग आकर जाट की पत्नी ने जाट से कहा “तुम भी एक बार पंडित जी के घर जाओ , देखे तुम्हारा वहां कैसा सत्कार होता है ?”

पत्नी के कहने पर जाट चला तो गया पर जाकर पछताया | पंडितानी ने तीन दिन पुराने केले सामने लाकर रख दिए | वह न तो खाते बनते न ही रखते | बेचारा जाट वहां से सर पर पाँव रखकर भागा |

जाट की पत्नी ने जब यह सुना तो नाराज होकर बोली “अब मै देखती हु कि आज के बाद पंडित जी कैसे जीमते है ?”

कुछ दिन बाद जाटनी ने खीर बनाई | वह उसमे गुड मिलाने ही वाली थी कि दूर से पंडित जी को आते देखा | जाट तुंरत भीतर की ओर आया और बोला “तू बच्चो के साथ पडोस में चली जा | मै बैल लेकर खेतो की ओर चला जाता हु | जब पंडित चला जाएगा तो मजे से खीर खायेगे ”

इतनी देर में पंडित जी आ गये | जाट ने कहा “पंडित जी मै तो अपने खेतो पर जा रहा हु | ” वह राम राम करके खेतो की ओर चला गया | जाटनी बोली “पंडित जी , आप आराम कीजिये | मै बच्चो के साथ पडोस में जा रही हु”

पंडित जी भी कम घाघ नही थे | उनके नाक में खीर की खुशबु पहुच चुकी थी |

जाट-जाटनी के घर से जाते ही उन्होंने खीर में गुड मिलाया और छककर खाया | खीर खाकर वे जान-बुझकर चारपाई के नीचे छिप गये | शाम को जाट खेत से लौटा तो पंडित को वहां ना पाकर खुशी से बोला

मै मरद बड़ा हुश्यार
तजरबेदार बड़ा कड़के का
ले बल्द ने खेत गया
मै तडके का

जाटनी भी पडोस से आकर बोली

मै नार बड़ी हुश्यार ,
तजरबेकार बड़ी कड़के की ,
ले बच्च्या ने गयी पडोस माँ
तडके की

जब वे दोनों अपनी अपनी बड़ाइयाँ करके डींगे हांक रहे थे तो उनका मेहमान चारपाई के नीचे से बोला

मै मेहमान बड़ा हुश्यार ,
तजरबेकार  बड़ा कड़के का
खा के खीर और गुड
मंजी के नीचे पड्या तडके का |

उस समय जाट और जाटनी की सुरत देखने लायक थी |

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