Kullu Tour Guide in Hindi | कुल्लू के प्रमुख पर्यटन स्थल

Kullu Tour Guide in Hindi
Kullu Tour Guide in Hindi

प्राकृतिक सुन्दरता से भरपूर , सेब के बागो और अपने ढंग के निराले दशहरा उत्सव के लिए मशहूर हिमाचल प्रदेश का कुल्लू , जिसे देवताओं की घाटी कहा जाता है समुद्रतल से 1219 मीटर की ऊँचाई पर , व्यास नदी के दोनों ओर 80 किमी में विस्तृत भारत का अत्यंत मनोरम पर्यटन स्थल है | रामायण और महाभारत में भी कुल्लू का उल्लेख है | उस युग में इसे कुलूत कहा जाता था | यहाँ का मौसम हमेशा खुशगवार रहता है |

कुल्लू के दो भाग है एक ओर ढालपुर और दुसरी ओर सुल्तानपुर | ढालपुर के विशाल मैदान में दशहरे के अवसर पर कुल्लू दशहरा देखने के लिए दूर दूर से लोग आते है | इस स्थान को देवताओं का मिलन स्थल कहा जाता है | सुल्तानपुर रघुनाथ मन्दिर के लिए विख्यात है | रघुनाथ जी की सवारी जब ढालपुर के मैदान में पहुचती है तभी दशहरा उत्सव मनाया जाता है | यह दशहरा विजयादशमी से शुरू होकर एक सप्ताह तक मनाया जाता है |

कुल्लू की हरी-भरी , छोटी छोटी वादियों में घुमने का आनन्द ही कुछ ओर है | हरे भरे चारागाह एवं कलकल करते झरने केवल आँखों को ही सुख नही देते , मन-प्राणों को भी ताजगी और आनन्द दे भर देते है | फलो के बाग़ के पास से गुजरते हुए सेब , खुबानी , आलूबुखारा , नाशपाती आदि फ्लोकी सुगंध से आपकी थकावट दूर हो जायेगी और आप फिर से तरोताजा हो जायेंगे | कुल्लू में बहुत कुछ आकर्षक और दर्शनीय है सेब के बाग़ , लकड़ी के पुराने मन्दिर , सांस्कृतिक मेले , लोक-नृत्य , लोक-संगीत आदि |

दर्शनीय स्थल

रघुनाथ जी का मन्दिर – 16वी शताब्दी में कुल्लू के राजा जगतसिंह द्वारा निर्मित इस मन्दिर की जनसमुदाय में बड़ी मान्यता है | कुल्लू का विश्वविख्यात दशहरा तब तक शुरू नही होता , जब तक रघुनाथजी का रथ ढालपुर मैदान में नही पहुच जाता | यह एतेहासिक मन्दिर है जो काष्टकला की दृष्टि से भी दर्शनीय है | रघुनाथजी कुल्लू के सर्वाधिक पूज्य देवता है |

देवी जगन्नाथ का मन्दिर – यह भाखली मन्दिर के नाम से भी जाना जाता है | ढालपुर के करीब 3 किमी की दूरी पर स्थित इस मन्दिर से दशहरा उत्सव का नजारा बहुत भव्य और आकर्षक प्रतीत होता है |

ब्शेश्वर महादेव मन्दिर – कुल्लू से 15 किमी दूर बजौरा में पिरामिडनुमा यह मन्दिर शिल्पकला की दृष्टि से दर्शनीय है | इसका निर्माण अठारवी शताब्दी में हुआ था |

मणिकर्ण – पार्वती नदी के तट पर मणिकर्ण नामक इस बस्ती में एक मन्दिर और गुरुद्वारा है | मन्दिर और गुरुद्वारा के बीच खौलते हुए पानी के कुंड है | इन कुंड में चावल डालने पर चावल उबलने लगते है |

नग्गर – यह 1400 वर्षो तक कुल्लू के शासको की राजधानी रह चूका है | कार या जीप से यहाँ के प्रसिद्ध महल तक जाया  जा सकता है | इसके आस-पास कई मन्दिर है जिसमे विष्णु, त्रिपुर सुन्दरी और कृष्ण मन्दिर प्रमुख है | यहाँ निकोलाई रोरिक की कला जिविथिका देखने योग्य है |

बिजली महादेव मन्दिर– कुल्लू से 11 किमी दूर 2435 मीटर की उंचाई पर स्थित भगवान शंकर का एक चमत्कारिक मन्दिर है | मन्दिर के सामने 20 मीटर ऊँचे लकड़ी एक एक खम्भे को यहाँ की स्थानीय भाषा में धौज कहा जाता है | हर तीसरे वर्ष इस पर और शिवलिंग पर बिजली गिरती है जिससे शिवलिंग टूटकर टुकडो में बिखर जाता है | मन्दिर का पुजारी इन टुकडो को मक्खन से जोड़ देता है और दुसरे ही दिन शिवलिंग पूर्ववत रूप धारण कर लेता है |

वैष्णो गुफा – कुल्लू से 4 किमी दूर इस छोटी से गुफा को वैष्णो देवी का मन्दिर माना जाता है |

कसोल – कुल्लू से 42 किमी दूर पार्वती नदी के तट पर एक मन्दिर है | यह स्थान बहुत ही मनोरम और प्राकृतिक सुषमा से मंडित है | लोग यहाँ छुट्टिया मनाने आते है |

बंजार – कुल्लू से 58 किमी दूर 1534 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह स्थान प्राकृतिक सौन्दर्य की दृष्टि से तो दर्शनीय है ही , ट्राउट नामक मछलियों के शिकार के लिए भी मशहूर है | शिकार करने के लिए कटराई के मत्स्य पदाधिकारी से अनुमति लेनी होती है |

रायसन – कुल्लू से 16 किमी दूर 1453 मीटर उंचाई पर स्थित यहाँ लोग छुट्टिया बिताने और कैम्पिंग के लिए आते है | इसके आस-पास सेब खुबानी और प्लम के सुंदर बाग़ है | मार्च में यह घाटी विकसित फूलो से भर जाती है | व्यास नदी के तट पर ठहरने के लिए आकर्षक झोपडिया बनाई गयी है |

कटराई – कुल्लू से 20 किमी दूर 1463 मीटर की उंचाई पर स्थित इस जगह सेब के बाग़ , ट्राउट मछलियों का प्रजनन केंद्र तथा मधुमक्खी फ़ार्म पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है |

बथाड – कुल्लू से 67 किमी दूर स्थित इस स्थान के मनोरम प्राकृतिक दृश्य तथा वन्य जीव पर्यटकों को बरबस अपनी ओर आकर्षित कर लेते है |

केश्वार – कुल्लू से 15 किमी दूर यहाँ के हरे भरे चारागाह बहुत ही लुभावने लगते है | इन्हें देखकर मन में ताजगी आ जाती है |

देव टिब्बा – यह स्थान प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध है | मनोरम प्राकृतिक दृश्य पर्यटकों को रुकने के लिए विवश कर देते है |

लारजी – कुल्लू से 37 किमी दूर 957 मीटर की उंचाई पर स्थित यह स्थान कस्तुरी मृगो और बड़े सींगोवाले हिरनों के लिए विख्यात है | यहाँ जंगली सूअर और चीते भी देखे जा सकते है | समीप ही व्यास नदी और उसकी सहायक नदियों का संगम है |

मलाणा – यह चन्द्रखानी घाटी के पास प्राकृतिक सुन्दरता से भरपूर एक गाँव है | घाटी की चोटी पर मलाणा ग्लेशियर सबका मन मोह लेता है | यहाँ का कलात्मक जमलू मन्दिर भी देखने योग्य है |

मंडी – व्यास नदी के तट पर हिमाचल प्रदेश के केंद्र में स्थित मंडी का शानदार राजमहल देखने योग्य है | पहले यह मंडी रियासत की राजधानी थी | यहाँ कई प्राचीन मन्दिर है जिनकी दीवारों पर देवी-देवताओं की मुर्तिया उत्कीर्ण है | पहाडी की चोटी पर एक बहुत ही सुंदर उद्यान है |

मनोरम घाटियाँ – कुल्लू मनोरम घाटियों के लिए विख्यात है | मुख्य घाटी के आस-पास प्राकृतिक सुन्दरता से भरपूर हरी भरी घाटियाँ है | पार्वती घाटी में चीड़ के वन , मणिकर्ण में उष्ण झरने , शिलांग घाटी की मखमल से बिछी हरी घास , चारगाह , झरने प्रपात , चन्दरवाणी घाटी की हरियाली और रंग-बिरंगे फुल ये सब मन को मोह लेते है | कुल्लू से आगे लाहौल एवं स्पीती की घाटियों की विशाल शिला और हिमशिखरों की भव्यता एक अनिवर्चनीय रोमांचकारी आनन्द का संचार करती है |

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