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कश्मीर समस्या पर निबन्ध | Kashmir Conflict Essay in Hindi

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कश्मीर समस्या पर निबन्ध | Kashmir Conflict Essay in Hindi
कश्मीर समस्या पर निबन्ध | Kashmir Conflict Essay in Hindi

धरती का स्वर्ग कहलाने वाले कश्मीर को बाहर से आने वाले पर्यटक भले ही स्वर्ग मानते हो लेकिन वहां की धरती पर होने वाली समस्याओ के कारण आज के समय कश्मीर में रहना नर्क के समान हो गया है | कश्मीर एक ऐसा प्रदेश है जिसको हर देश हथियाना चाहता है जबकि यह भारत का अभिन्न अंग है | इसकी सीमाए पाकिस्तान , चीन और तिब्बत को छूती है | सुंदर और महत्वपूर्ण वस्तु को प्रत्येक हथियाना चाहता है अधिकारी भी और अनाधिकारी भी | वह किसकी ओर जाए यही कश्मीर की मूल समस्या है ?

कश्मीर समस्या का इतिवृत 

यह समस्या तब उत्पन्न हुयी जब सन 1947 में भारत और पाकिस्तान स्वतंत्र हुए | कश्मीर तब एक देशी रियासत थी अत: उसे पूर्ण अधिकार दिया गया कि दोनों देशो में यह जिसके साथ चाहे अपना सम्बन्ध जोड़ सकता है | अब कश्मीर की प्रजा और वहा के महाराजा हरिसिंह इसके विषय में विचार कर ही रहे थे कि पाकिस्तान ने बलपूर्वक उसे अपनी ओर मिलाने के विचार से आक्रमण कर दिया | यह बात कश्मीर को सहन नही हुयी और उसने तुरंत भारत के साथ विनिमय के विषय पर में अपना निश्चय किया | दो घंटे के भीतर ही संधि पर हस्ताक्षर हो गये और भारत ने कश्मीर की रक्षा का पूरा भार अपने उपर ले लिया |

भारत की सेनाये पाकिस्तानियो को कश्मीर से बाहर निकालने के लिए कश्मीर पहुची | उस समय पाकिस्तान के अनियमित सेनाये कश्मीर को रौंदती हुयी श्रीनगर की ओर बढ़ रही थी | उनके साथ असभ्य कबालियो के जत्थे भी थे | ये लोग निरपराध स्त्रियों , बच्चो और बुढो को निर्दयता से मारते हुए उनका अपमान करते हुए चल सम्पति को लुटते हुए और घर-बार फूंकते हुए आगे बढ़ रहे थे | वे श्रीनगर के द्वार रक पहुच चुके थे और राजधानी में घुसना ही चाहते थे कि भारतीय सेना कश्मीर में घुस गयी |

भारतीय सेना बड़ी वीरता से लड़ी और उसने पाकिस्तानी लुटेरो को बहुत पीछे खदेड़ दिया | दोनों ओर कई मास तक लहू की नदियाँ बहती रही | यह परिस्थिति भारत को उचित प्रतीत न हुयी | उसने शांतिपूर्ण समझौते के लिए संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद से बीच बचाव करने को कहा | सुरक्षा परिषद ने मध्यस्थ क्या बनना था कश्मीर की महत्वपूर्ण स्थिति को देखकर उसके मुह में भी पानी भर आया |

भारत ने प्रत्यक्ष न्याय की प्रार्थना की तो 1948 में राष्ट्र संघ ने श्री ओवन डिक्सन को मध्यस्थ बनाकर कश्मीर भेजा | सारी परिस्थिति जाँच लेने पर श्री डिक्सन ने पाकिस्तान को आक्रमणकारी घोषित किया और निर्णय किया कि उसे अपनी सेनाये कश्मीर से वापस बुला लेनी चाहिए | दुर्भाग्यवश राष्ट्रसंघ के नेता यह नही चाहते थे कि कश्मीर भारत का अंग बनकर रहे | विशेषकर अमेरिका और ब्रिटेन तो उसे युद्ध में रूस के विरुद्ध अड्डा बनाने के स्वप्न देख रहे थे | उनकी इस कुनीति को देखकर भारत पछताता कि उसने सुरक्षा परिषद से न्याय की भिक्षा क्यों मांग्री | वह राष्ट्रसंघ जैसी विश्व संस्था को ठेस पहचाना नही चाहता था अत: उसने कोई शीघ्रताजनक कदम न उठाया |

उन्ही दिनों पहली जनवरी 1949 को सुरक्षा परिषद कश्मीर से युद्ध विराम संधि करवाने में सफल हो गयी | सुरक्षा परिषद में यह निर्णय किया कि कश्मीरी जनता की राय ली जाए | भारत के इस निश्चय को इस शर्त पर मानना स्वीकार किया कि पाकिस्तानी आक्रमणकारीयो को कश्मीर से निकाल दिया जाए ताकि जनता स्वतंत्र रूप से अपनी इच्छा प्रकट कर सके | राष्ट्र संघ ने आक्रमणकारियों को वापस भेजने की व्यवस्था की ताकि कश्मीर में मतदान किया जा सके | अब तक यह प्रश्न खटाई में पड़ा हुआ है | कश्मीर की मुख्य घाटी पर भारत का अधिकार है किन्तु उसके शेष भाग पर अब भी पाकिस्तानी सेना ने अधिकार किया हुआ है |

कश्मीर का आधुनिक रूप 

1953 तक भारत संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से नियुक्त अमेरिका के प्रेक्षकों को कश्मीर में संधि चर्चा के लिए सहर्ष रहने दिया किन्तु 1954 के आरम्भ में ही अमेरिका ने पाकिस्तान को सैनिक सहायता देने का निस्चय कर लिया | भारत के विरुद्ध पाकिस्तान को सैनिक सहायता देने के कारण अमेरिका के प्रेक्षक निष्पक्ष नही माने जा सकते | अत: भारत न उन्हें वापस बुलाने के लिए राष्ट्रसंघ से प्रार्थना की |

अमेरिका का राष्ट्रसंघ में विशेष हाथ है | जब वही  भारत का हितचिन्तक नही रहा तो उसके प्रेक्षक सच्चा निर्णय कैसे कर सकते है ? उधर से निराश होकर कश्मीर की जनता ने अपनी विधानसभा के द्वारा स्वयं यह निश्चय कर लिया है कि वे भारत के साथ संबध हो गये है | इस प्रकार वैज्ञानिक दृष्टि से कश्मीर भारत का अंग बन चूका है फिर भी एक भाग पर पाकिस्तान अपना अधिकार जमाए बैठा है | यही कश्मीर की आधुनिक समस्या है |

उपसंहार 

यदि तृतीय महायुद्ध हुआ तो अमेरिका कश्मीर को रूस के विरुद्ध अड्डा बनाएगा | इससे भारत की सुरक्षा भी संकट में है और विश्व शान्ति भी | भारत की इस समस्या को शान्ति से सुलझाना चाहता है किन्तु उसके शीघ सुलझने के कोई लक्षण दिखाई नही देते |

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