Jayaprakash Narayan Biography in Hindi | लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जीवनी

Jayaprakash Narayan Biography in Hindi
Jayaprakash Narayan Biography in Hindi

भारत के समाजवादी विचारको में जयप्रकाश नारायण का विशिष्ट स्थान है | वे एक समाजवादी थे गांधीवादी थे और सर्वोदयवादी थे लेकिन इनमे से किसी के साथ वे जीवन भर बंधकर न रह सके | वस्तुत: उनके जीवन और चिन्तन का एक ही लक्ष्य था और वह था आर्थिक-सामाजिक न्याय और नैतिकता पर आधारित व्वयस्था की स्थापना करना | इस दृष्टि से उन्होंने सम्रग क्रान्ति की बात कही | इस दिशा में वे एक कदम आगे बढ़े लेकिन एक ही कदम बढ़ पाए और लोकनायक का सम्रग क्रान्ति का विचार एक स्वप्न ही रहा |

जयप्रकाश नारायण का जन्म बिहार के सितावदियारा गाँव में (वर्तमान में उत्तर प्रदेश में) 11 अक्टूबर 1902 को हुआ था | उनकी प्रारम्भिक शिक्षा पटना में हुयी | बाल्यकाल से ही नैतिक तत्वों के प्रति उनका आकर्षण रहा और भगवद्गीताने उन्हें प्रेरणा दी | जयप्रकाश जब कॉलेज में थे तभी 1921 में गांधीजी के नेतृत्व में चल रहे असहयोग आन्दोलन में कूद पड़े | सन 1922 में उनका विवाह प्रभा देवी के साथ हुआ | 1922 में ही वे अध्ययन के लिए अमरीका गये और उन्होंने वहां आठ वर्ष तक अध्ययन किया | वे बर्कले के कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय में प्रविष्ट हुए |

अमेरिका में उन्हें अपने अध्ययन को सुचारू रूप से चलाने के लिए अर्थोपार्जन करना था अत: बूट पोलिश और घरेलू सफाई आदि कार्य करते हुए उन्होंने श्रमिक जीवन के अनुभव प्राप्त किये | अमेरिका में ही मार्क्सवाद के प्रभाव में आये और यही उन्होंने एम.एन.रॉय की रचनाओं का भी अध्ययन किया | भारत आने पर वे महात्मा गांधी के प्रभाव और जवाहरलाल नेहरु के सम्पर्क में आये | समाजवाद की ओर उनका झुकाव युवावस्था से ही था | 1934 ई. में उन्होंने आचार्य नरेंद्र देव और अन्य साथियो के सहयोग से कांग्रेस के अंदर ही कांग्रेस समाजवादी पार्टी की स्थापना की |

भारत के स्वाधीनता संग्राम के वे प्रमुख सेनानी थे | 1942 में जब गांधी ने “करो या मरो” का अहिंसक आह्वान किया , उस समय जयप्रकाश नारायण हजारीबाग जेल में नजरबंद थे | वे भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लेने के लिए नवम्बर 1942 में हजारीबाग की केन्द्रीय जेल से भाग निकले और उन्होंने भूमिगत रहते हुए लगभग 10 महीने स्वाधीनता आन्दोलन का संघठन और संचालन किया किन्तु 18 सितम्बर 1943 को लाहौर रेलवे स्टेशन पर उन्हें पुन: गिरफ्तार कर लिया गया | अप्रैल 1946 में उन्हें मुक्त कर दिया गया |

1946 में गांधीजी ने उनका नाम कांग्रेस की अध्यक्षता के लिए प्रस्तावित किया किन्तु कांग्रेस की कार्यकारिणी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नही किया | 1946 में उन्होंने कैबिनेट मिशन योजना का विरोध किया और यह विचार रखा कि भारत की संविधान सभा के सदस्य जनता के प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होने चाहिए | उन्होंने अपने लिए संविधान सभा की सदस्यता का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया | देश की स्वतंत्रता के पश्चात उन्होंने सरकार के किसी पद पर रहना स्वीकार नही किया |

1948 ई. में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस छोडकर भारतीय समाजवादी पार्टी बनाई | बाद में इस पार्टी ने प्रजा समाजवादी पार्टी का रूप ले लिया | 1953 में जवाहरलाल नेहरु तथा जयप्रकाश नारायण के बीच इस समस्या पर बातचीत हुयी कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण तथा विकास के लिए कांग्रेस तथा प्रजा समाजवादी दल के बीच सहयोग किस प्रकार स्थापित किया जाए किन्तु बैतूल के सम्मेलन में समाजवादी नेताओं ने आपसी सहयोग के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया |

वस्तुत: 1952 से ही जयप्रकाश विनोबा भावे के नेतृत्व में चलाए जा रहे भूदान और सर्वोदय आन्दोलन की ओर आकर्षित हो रहे थे | दलगत और सत्ता की राजनीती से उन्हें निराशा हो रही थी | अत: 1954 में उन्होंने प्रजा समाजवादी दल की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से त्यागपत्र दे दिया और दलगत राजनीति से अपना संबध विच्छेद कर लिया | अप्रैल 1954 में उन्होंने सर्वोदय आन्दोलन के प्रति जीवनदान देने की प्रतिज्ञा की | जयप्रकाश का अब यह विचार हो गया था कि व्यवस्था में मुलभुत परिवर्तन लाने के लिए व्यक्तियों की मनोस्थिति उनके सोचने विचारने के ढंग में परिवर्तन लाना आवश्यक है और सर्वोदय आन्दोलन से यह सम्भव है | उन्होंने 1954 में शकोदर में एक आश्रम स्थापित किया और सर्वोदय आन्दोलन तथा ग्रामोत्थान के लिए नये कार्यक्रमों की शुरुवात की |

सर्वोदय आन्दोलन के प्रति जीवन दान की प्रतिज्ञा करते हुए भी उन्होंने अपने आपको दलगत राजनीति तथा सत्ता की राजनीति से ही अलग किया था सार्वजनिक जीवन के प्रति उनके मनोभाव में कोई अंतर नही आया था | 10 अगस्त 1970 को उन्हें “इंसानी बिरादरी” का अध्यक्ष बनाया गया और इस संघठन के माध्यम से उन्होंने राष्ट्रीय जीवन से साम्प्रदायिक सद्भाव की अभिवृद्धि के लिए प्रयत्न किये | 1970-72 के दो वर्षो में उन्होंने अपना अधिकाँश समय और शक्ति बिहार के मुज्ज्ज्फरपुर जिले के नक्सलवादी विद्रोह को समाप्त करने में लगाई | 1972 के प्रारम्भ में जयप्रकाश के आदर्शो से प्रेरित होकर चम्बल घाटी के 400 डाकुओ ने उनके समक्ष आत्म-समर्पण कर दिया |

1954 से 1973 के बीस वर्षो में जयप्रकाश सर्वोदय आन्दोलन के साथ जुड़े रहे लेकिन 1970 से ही सम्भवतया उन्हें यह महसूस होने लगा था कि सर्वोदय से भी व्यवस्था में परिवर्तन पाना सम्भव नही है | उन्हें यह देखकर कष्ट होता था कि भारत के सार्वजनिक जीवन में नैतिकता को भारी आघात पहुच रहा है और व्यवस्था भी भंग हो रही है | अत: अब वे राजनीतिक व्यवस्था और सम्पूर्ण व्यवस्था में परिवर्तन लाने की बात सोचने लगे | 1974 में गुजरात और उसके बाद बिहार राज्य में भारे असंतोष की स्थिति थी | इस स्थिति में उन्होंने मार्च 1974 में बिहार की छात्र संघर्ष समिति का नेतृत्व किया | उनका यह संघर्ष लगभग 15 महीने तक क चलता रहा |

इसी बीच 12 जून 1975 को इलाहबाद उच्च न्यायालय का निर्णय आया , जिसमे श्रीमती इंदिरा गांधी को अपने लोकसभा चुनाव में भ्रष्ट तरीके अपनाने का दोषी ठहराया गया था | इस स्थिति में भारतीय राजनीति में विपक्षी नेताओं सहित जयप्रकाश की मौजूदगी में दिल्ली में 23 जून 1975 को बैठक बुलाई गयी | बैठक में श्रीमती गांधी से त्यागपत्र मांगने के लिए विशाल आन्दोलन के कार्यक्रम का मसविदा तैयार किया गया | इंदिरा गांधी ने त्यागपत्र देने की बजाय 26 जून 1975 को देश में आंतरिक आपातकाल की घोषणा कर दी और जयप्रकाश तथा विपक्षी दल के प्रमुख नेताओं को नजरबंद कर दिया गया | गम्भीर रूप से बीमार पड़ जाने पर 12 नवम्बर 1975 को जयप्रकाश नारायण को जेल से रिहा कर दिया गया |

18 जनवरी 1977 को लोकसभा के लिए चुनावों की घोषणा की गयी | अब जयप्रकाश आगे आये , उन्होंने जनता पार्टी के गठन , चुनाव प्रचार और जनता पार्टी की सरकार के गठन में सक्रिय भूमिका निभायी | थोड़े समय बाद उन्होंने इस सरकार से भी निराशा अनुभव की और खुले रूप से स्वीकार किया कि “यह सरकार भी जन आकांशाओ पर खरी नही उतरी है ” जयप्रकाश का महत्व 1977 के सत्ता परिवर्तन में नही वरन इस बात में है कि उन्होंने जनता को अपनी शक्ति से परिचित कराया और शासक वर्ग को जनशक्ति से परिचित कराकर सदैव के लिए भविष्य के शासक वर्ग को भी चेतावनी देने का कार्य किया | उन्होंने समस्त व्यवस्था को लोक शक्ति से परिचित कराया था जनता के प्रेम और श्रुधा के साथ उन्हें लोकनायक का नाम दिया |

1975 में जेल में बंदी होने के दौरान ही उनके स्वास्थ्य में गिरावट आ गयी थी और नवम्बर 1975 से ही उनका उपचार चल रहा था लेकिन जयप्रकाश का स्वास्थ्य चिंता का विषय बना रहा और 8 अक्टूबर 1979 को उनके निधन के दुःखद समाचार से पूरा राष्ट्र स्तब्ध रह गया |

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