गोवर्धन पूजा विधि और कथा | Govardhan Puja Vidhi and Significance in Hindi

govardhan-puja-vidhi-and-significance-in-hindiदीपावली के दुसरे दिन गोवर्धन पूजा की जाती है | इसके लिए घर क्र मुख्य द्वार पर गौ के गोबर से गोवर्धन जी बनाये जाते है | गोवर्धन की पूजा भगवान श्रीकृष्ण के अवतार के बाद द्वार युग से प्रारम्भ हुई थी | इस दिन ठाकुर जी के अन्नकूट का भोग लगाते है | गोवर्धन जी की पूजा लक्ष्मी जी की पूजा में रखा जलता हुआ घी का दीपक एवं लक्ष्मी पूजन की थाली और कलश लेना चाहिए | गोवर्धन की पूजा लक्ष्मी पूजन की सामग्री से ही करनी चाहिए |

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पूजन विधि विधान | Govardhan Puja Vidhi in Hindi

यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिप्रदा को मनाया जाता है | इस दिन प्रात:काल शरीर पर तेल की मालिश के बाद स्नान करना चाहिये | फिर घर के द्वार पर गोबर से गोवर्धन बनाये | गोबर का अन्नकूट बनाकर उसके समीप विराजमान श्रीकृष्ण के सम्मुख गाय तथा ग्वाल बालो ,इंद्र , वरुण अग्नि और बलि का पूजन षोडशोपचार द्वारा करे | विभिन्न प्रकार के पकवानों एवं मिष्टानो का भोग लगाकर पहाड़ की आकृति तैयार करे और उनके मध्य श्रीकृष्ण की मूर्ति रखे | पूजन के पश्चात कथा सुने | प्रसाद के रूप में दही और चीनी का मिश्रण सबको बाँट दे | फिर पुरोहित को भोजन करवाकर दान दक्षिण देवे

पौराणिक कथा | Govardhan Puja Katha in Hindi

एक दिन भगवान कृष्ण ने देखा कि ब्रज नगरी में तरह तरह के पकवान बनाये जा रहे है | उन्हें पता चला कि यह तैयारी देवराज इंद्र की पूजा के लिए हो रही है | इंद्र की प्रसन्नता से ही वर्षा होगी | यह बात सुनकर भगवान कृष्ण ने इंद्र की निंदा करते हुए कहा कि “उस देवता की पूजा करनी चाहिए जो प्रत्यक्ष में आकर पूजन सामग्री स्वीकार करे | इंद्र में क्या शक्ति है जो पानी बरसा कर हमारी सहायता करेगा | उससे तो शक्तिशाली और सुंदर यह गोवर्धन जी का पर्वत है | यही वर्षा का मूल कारण है | तुम सभी को इसी की पूजा करनी चाहिए ”

ब्रजवासियो ने पूछा “गोवर्धन की पूजा से क्या लाभ होगा ?” | भगवान कृष्ण ने कहा “यही गोप गोपियों की आजीविका का एकमात्र सहारा होगा “| सभी ने भगवान कृष्ण के कहे अनुसार पकवान बनाये और पर्वत तराई में जाकर गोवर्धन जी को भोग लगाया | इस पूजन से गिरिराज प्रसन्न हुए और सभी को आशीर्वाद दिया | नारज जी ब्रज में घुमने आये | वहा उन्हें पता चला कि ब्रजवासी कृष्ण जी की आज्ञा से इस वर्ष इंद्र महोत्सव के स्थान पर गोवर्धन पूजा कर रहे है |

यह बात नारद जी ने इंद्र देवता से जाकर कही | इसे इंद्र ने अपना अपमान समझकर मेघो को आज्ञा दी कि वे गोकुल में जाकर प्रलयकारी मुसलाधार वर्षा से पुरे गाँव को नष्ट कर दे | बादल ब्रज नगरी पर जोर से बरसने लगे | सभी ब्रजवासी कृष्ण भगवान की शरण में जाकर बोले “हे भगवान ! इंद्र भगवान नाराज जो गये है और हमारी नगरी को डुबोना चाहते है “| तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि “तुम सभी लोग गोवर्धन की शरण में चलो वही तुम्हारी रक्षा करेंगे ”

सभी लोग कृष्ण जी के साथ गोवर्धन चले गये | भगवान ने एक अंगुली से गोवर्धन पर्वत को उठा लिया और सात दिन तक गोप गोपिकाओ की सुरक्षा की | इससे इंद्र को आश्चर्य हुआ | वह भगवान की महिमा को समझ गये और ब्रज आकर पश्चाताप किया | सातवे दिन भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को नीचे रखा | उसी दिन से प्रतिवर्ष गोवर्धन की पूजा की जाती है और ठाकुर जी को अन्नकूट का भोग लगाया जाता है |

गौधन का सम्मान

बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश सहित देश के कुछ हिस्सों में गायो को विशेष रूप से अलंकृत करके उनकी पूजा की जाती है | गौ माता के प्रति आभार प्रकट करते हुए उस दिन का दूध सिर्फ बछड़े के लिए छोड़ दिया जाता है | इस प्रकार गोवर्धन पूजन के उत्सव में हमारी कृषि प्रधान संस्कृति की झलक देखने को मिलती है जिसमे हमे पशुओ के प्रति दया भाव रखना सिखाया जाता है |

मिटेगी शनि पीड़ा

ज्योतिषियों के अनुसार गोवर्धन पूजन करने से जहा भगवान प्रसन्न होते है वही घर परिवार में सुख समृधि आती है तथा धन में वृधि होती है | शनिग्रह से पीड़ित व्यक्ति को तो गोवर्धन पूजन अवश्य करना चाहिए | उसे गोबर से बने गोवर्धन पर्वत के बाई ओर तेल के दीपक जलाने तथा शनि की पीड़ा दूर करने की प्रार्थना करने से लाभ मिलेगा |

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