भारत के सुप्रसिद्ध भैरव मन्दिर | Famous Bhairav Temples History in Hindi

कालो में काल महाकाल अर्थात महाकालेश्वर भगवान शिव महादेव है | वह लिंग रूप में निराकार ब्रह्म के द्योतक है और सर्वत्र विराजमान है | भुतभावन भगवान भैरव को शिव का अवतार माना गया है अत: वह शिव स्वरूप ही है और उनके साकार रूप है | भैरव सम्पूर्णत: परात्पर शंकर ही है | भैरव की महत्ता अस्न्धिग्ध है वह आपति-विपत्ति विनाशक एवं मनोकामना पूर्ति के देव है | वैसे तो संसार में भैरव कई रूप से सुख्यात है परन्तु उनमे दो रूप अत्यंत प्रसिद्ध है | पहली काल भैरव और दुसरे बटुक भैरव-आनन्द भैरव

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काल के समान भीषण होने के कारण इन्हें कालभैरव कहा गया ,वस्तुत: ये कालो के काल है और सभी प्रकार से संकट करने में सक्षम है | आदि शंकराचार्य द्वारा रचित काल भैरवाष्टक का पाठ अत्यंत लाभकारी होता है | मथुरा का पाताल भैरव मन्दिर एवं नागपुर (विदर्भ) का पाताल भैरव मन्दिर तथा काकधाम देवघर का पाताल भैरव मन्दिर भी सुख्यात है | भारत के दक्षिण-पश्चिम में प्रमुखत: मालवा एवं राजस्थान के हर गाँव में देवी स्थल में देवी की पिंडियो के साथ एक पिंडी भैरव की होती है | अब आइये आपको भारत के प्रसिद्ध भैरव मन्दिरों के बारे में बताते है

काल भैरव मन्दिर काशी | Kaal Bhairav Mandir Kashi

भगवान विश्वनाथ शिव की नगरी काशी ,वाराणसी के कोतवाल का नाम है काल भैरव | विश्वनाथ मन्दिर से लगभग डेढ़-दो किमी की दूरी पर अति प्राचीन भैरव मन्दिर स्थित है जिसकी स्थापत्य कला ही इसकी प्राचीनता सिद्ध करती है | गर्भगृह के भीतर कालभैरव की प्रतिमा विराजमान है जिसे हमेशा वस्त्र से ढंक कर रखा जाता है | प्रतिमा के मूल रूप का पूर्ण दर्शन किन्ही किन्ही को ही हो पाता है परन्तु मुखारविन्द के दर्शन सब करते है |

काशी के काल भैरव की महत्ता इतनी अधिक है कि जो यहा गंगा स्नान एवं विश्वनाथ दर्शन के पश्चात इनके दर्शन नही करता उन्हें भगवान विश्वनाथ के दर्शन का सुफल नही प्राप्त होता | गर्भगृह से पहले आंगन है जिसमे दाहिनी ओर कुछ तांत्रिक भैरवपंथी अपने अपने आसन पर विराजमान रहते है | दर्शनार्थियों के हाथो में ये रक्षार्थ कालभैरव की ओर से काला डोरा बांधते है और विशेष प्रकार के झाड़ू से आपादमस्तक झाड़ते है | बाहर कुत्तो का जमावड़ा रहता है जिन्हें कुछ खिलाना भैरव भक्त आवश्यक समझते है | ये वास्तव में भैरव के वाहन माने जाते है | यहा कोई कुत्तो को प्रताड़ित नही करता है |

बटुक भैरव मन्दिर नई दिल्ली

पांड्वो द्वारा निर्मित महाभारतकालीन उक्त मन्दिर नई दिल्ली के विनय मार्ग पर नेहरु पार्क में स्थित है | यह अत्यंत प्रसिद्ध है | यहा बटुक भैरव की प्रतिमा को विशेष प्रकार से कुए के उपर विराजित किया गया है |पता नही किस समय से एक छिद्र के माध्यम से पूजा-पाठ एवं भैरव स्नान का सारा जल कुए में जाता रहता है परन्तु कुआं अब तक नही भरा |

दिल्ली के पांडव किले की रक्षा हेतु भीमसेन इस प्रतिमा को काशी से लाये थे | भैरव बाबा नही कहा था कि मेरे विग्रह को भूमि पर कही मत रखना क्योकि जहा रखोगे वही मै विराजमान हो जाऊँगा और फिर नही उठूँगा ,वही मन्दिर बनाकर स्थापना क्रिया पूर्ण करना | भीमसेन यहा पहुचते पहुचते थक गये और प्रतिमा भूमि पर रख दी |

नीलम की आँखों वाली इस प्रतिमा के पार्श्व में त्रिशूल और मस्तक पर छत्र सुशोभित है | यह बहुत ही भारी है साधारण शक्ति वाला व्यक्ति इसे उठा नही सकता | यह सर्वकामनापूरक एवं सर्व आपदानाशक है | रविवार के दिन भैरव का दिन माना जाता है इस दिन यहा अपार भीड़ रहती है | मन्दिर के सामने की लम्बी सड़क पर कारो की लम्बी  पंक्तिया लग जाती है | ऐसी भीड़ भारत के किसी भैरव मन्दिर में नही लगती होगी | यह प्राचीन प्रतिमा इस तरह उर्जावान है कि भक्तो की यहा हर सम्भव इच्छा पूर्ण होती है |

बटुक भैरव मन्दिर पांडव किला (दिल्ली)

यहा के भैरव भी बहुत प्रसिद्ध है | वास्तव में पांडव भीमसेन द्वारा लाये गये भैरव दिल्ली से बाहर ही विराज गये तो पांडव बड़े चिंतित हुए | उनकी चिंता देखकर बटुक भैरव ने उन्हें अपनी दो जटाए दे दी और उसे नीचे रखकर दुसरी भैरव मूर्ति उस पर स्थापित करने का निर्देश दिया | तब पांडव किले से मन्दिर मानकर जटा के उपर प्रतिमा बैठाई गयी जो अब तक पूजित है |

घोडाखाड़ (नैनीताल ) बटुक भैरव मन्दिर

यह भी अत्यंत सुख्यात है यहा इनकी प्रसिद्धि गोलू देवता के नाम से है |पहाडी पर स्थित एक विस्तृत प्रांगण में एक मन्दिर में विराजित इस श्वेत गोल प्रतिमा के लिए प्रतिदिन श्रुधालू भक्त पहुचते है | यहा महाकाली का मन्दिर भी है | भक्तगण यहा पीतल के छोटे-बड़े घंटे एवं घंटिया लगात रहते है जिनकी गणना करना कठिन है सीढियों सहित मन्दिर प्रांगण घंटे-घंटी से पड़े है | मन्दिर के नीचे एक सीढियों के बगल में पूजा पाठ की सामग्रियों सहित घंटी घंटा की दुकाने भी है | बटुक भैरव की ताम्बे की अश्वारोही छोटी बड़ी मुर्तिया भी बेची जाती है जिन्हें ले जाकर भक्तगण अपने अपने घरो में पूजन करते है |

काल भैरव मन्दिर उज्जैन

शिप्रा नदी तट पर महाकाल की नगरी उज्जैन को प्राचीनकाल में अवंती ,अवन्तिका एवं उज्जैय्नी भी कहा गया है | यहा का काल भईर्व मन्दिर भी जगत प्रसिद्ध है

आनन्द भैरव मन्दिर हरिद्वार

मायापुरी को हरिद्वार ,हरद्वार एवं गंगाद्वार कहा जाता है | मायापुरी की अधिष्टात्री देवी भगवती माया मन्दिर के निकट आनन्द भैरव का सुप्रसिद्ध मन्दिर है |भैरव जयंती पर यहा बहुत बड़ा उत्सव होता है |

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