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आरक्षण की समस्या पर निबन्ध | Essay on “Reservation Problem” in Hindi

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आरक्षण की समस्या पर निबन्ध | Essay on "Reservation Problem" in Hindi
आरक्षण की समस्या पर निबन्ध | Essay on “Reservation Problem” in Hindi

आरक्षण का अर्थ होता है चारो तरफ से रक्षा का प्रयास करना | आरक्षण के पीछे , स्वाधीनता के बाद , भारतीय नेताओ की मानसिकता यह रही थी कि समाज के दबे, कुचले , दलित ,पिछड़े लोगो को भी अवसर दिया जाए | उस समय यह भावना थी कि कुछ प्रतिशत लोग अयोग्य भी है तो योग्य का पद भी उन्हें दिया जाए | अगर ऐसा नही होगा तो वे सदा पिछड़े के पिछड़े ही रह जायेंगे और विकास के लाभ से सदा वंचित रह जायेंगे |

उस समय कुछ सिमित जातियों को इसकी सीमा के अंदर रखा गया था लेकिन तुम डाल-डाल , हम पात-पात की भावना से आज के राजनितिक दल के नेताओ ने आरक्षण की सीमा का विस्तार कर दिया और वे ताल ठोककर वे इस उपाय में लग गये है कि आरक्षण की नियमावली के तहत काम किया जाए | आरक्षण की सीमा को विस्तृत कर देने से अब यह तय हो गया कि अयोग्यो को अवसर दिया जाना है | चाहे आरक्षण के सौ फीसदी लागू हो जाने से सौ फीसदी अयोग्य ही सभी पदों पर काबिज क्यों न हो जाए |

अगर यह बात सच नही है तो केवल सिविल सर्विसेज में ही विशेष रूप से आरक्षण का पालन क्यों होता है | देश की सुरक्षा के तहत वैज्ञानिको आदि के पदों पर भी आरक्षण दे दिया जाना चाहिए | वस्तुत: आदर्श राष्ट्र का सिद्धांत यह होना चाहिए कि योग्य को आरक्षण दिया जाए | भारत में कितने ही योग्य और प्रतिभावान नौजवान धुल फांकते है और उसी समय अयोग्य आरक्षित होकर अयोग्यता के विस्तार में कार्यरत हो जाते है |

हमारे देश में आरक्षण शब्द का प्रयोग सबसे पहले लार्ड मिन्टो ने सन 1909 में किया था | इसका उद्देश्य था भारत का पृथक प्रतिनिधित्व देना | इसके तहत भारत के कुछ वर्गो को उचित प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था करनी थी | स्वाधीनता के बाद जब नये संविधान की रचना की गयी तब महात्मा गांधी और अन्य समाज सुधारको की प्रेरणा से इस बात पर विशेष ध्यान दिया गया कि भारतीय समाज में उपेक्षित और पीड़ित वर्ग और जातियों के लिए आरक्षण की व्वयस्था की जाए |

हमारे देश में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियो का विशाल वर्ग है जो शताब्दियों से पीड़ित और दमित रहे है | उनकी उन्नति और सुविधा के लिए संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की गयी | इसके लिए संविधान में अनेक प्रावधानो के समावेश किये गये | भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियो को राष्ट्रीय स्तर तक लाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 341 एवं 342 का प्रावधान किया गया है |

इनके अनुसार इन जातियों के सामजिक .राजनितिक ,शैक्षिणिक एवं आर्थिक क्षेत्र में अनेक सुविधाए दी गयी है | इन्ही सुविधाओं को आरक्षण कहा जाता है | आरक्षण का व्यावहारिक मतलब यह है कि अगर हम किसी पद के लिए योग्य न भी है और आरक्षण की सूची में हमारी जाति है | तो हम उस पद को लेंगे ही | भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 में यह प्रावधान है कि देश के प्रत्येक नागरिक को वर्ग , धर्म , लिंग और जन्म आदि के आधार पर कोई भेदभाव न किया जाए |

सरकार ने सन 1951 ई. में प्रथम संविधान संशोधन पारित कर यह प्रावधान किया कि सरकार सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग की उन्नति एवं उत्थान के लिए कानून बना सकती है | पिछड़े वर्गो के लिए आरक्षण की वर्तमान समस्या का जन्मदाता संविधान का यही प्रावधान है | संविधान के इसी प्रावधान को कार्यरूप देने के लिए राष्ट्रपति ने 29 जनवरी 1951 में काका कालेलकर की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया जिसका उद्देश्य पिछडो का उत्थान था और आयोग का नाम था “प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग” | इसमें 2399 जातियों को पिछड़े वर्ग की श्रेणी में तथा 837 जातियों को सबसे पिछड़ी जातियों में रखा गया | लेकिन तत्कालीन सरकार ने इस रिपोर्ट को स्वीकार नही किया और आरक्षण का मामला दब गया |

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