Home जीवन परिचय दलाई लामा की जीवन परिचय | Dalai Lama Biography in Hindi

दलाई लामा की जीवन परिचय | Dalai Lama Biography in Hindi

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दलाई लामा की जीवनी Dalai Lama Biography in Hindi

दलाई लामा की जीवनी Dalai Lama Biography in Hindi14 वे दलाई लामा Dalai Lama  जिनका बचपन का नाम ल्हामो थोनडुप था , का जन्म 6 जुलाई 1935 को तिब्बत के आमदो इलाके में हुआ था जो उस समय राजनितिक रूप से चीन का एक प्रान्त था | उनका परिवार एक मामूली किसान परिवार था जो खेती करके अपना जीवन चलाता था | ल्हामो के पिता का नाम चोकयोंग और माँ का नाम डिकी सेरिंग था | चोकयोंग आलू , जौ और मैथी की खेती करते थे क्योंकि वहा की जलवायु ऐसी खेती के लिए उपयुक्त थी | खेती के अलावा उनका परिवार पशुपालन भी किया करता था | इनके पास जोको याक हुआ करते थे जो दूध ,मांस और खेतो की जुताई में काम आते थे | उनके गाँव के मौसम में केवल याक की एकमात्र ऐसा पशु था जो जीवित रह सकता था | जौ से सत्तू बनता था जो तिब्बती लोगो का मनपसन्द व्यंजन था |

चोकयोंग के पास अपने परिवार के लिए उपयोग होने वाले अनाज के अलावा बचे अनाज को वो बाजार में बेच दिया करते थे | अनाज के बदले वो दुसरी काम की चीज खरीद लिया करते थे | उस समय में पैसो की लेनदेन के बजाय वस्तुओं की लेनदेन का प्रचलन अधिक था | चोकयोंग के पास सौ तिब्बती नस्ल की भेड़ बकरिया और आधा दर्जन घोड़े भी थे |  ल्हामा के जन्म के समय कोई उत्सव नही मनाया गया था क्योंकि उससे पहले परिवार में 8 बच्चो का जन्म हुआ था जिसमें से चार बच्चो की बचपन में ही मौत हो गयी थी | शेष जीवित बच्चो में एक पुत्री और तीन पुत्र थे | इस प्रकार थोनडुप अपने परिवार की नौवी सन्तान और पांचवी जीवित सन्तान थी | उनके परिवार में सबसे बड़ी बहन 18 वर्ष की थी जिसका नाम त्सेरिंग डोलमा था|

थोनडुप के जन्म से पहले उनके पिता काफी बीमार चल रहे थे लेकिन थोनडुप के जन्म के बाद उनके स्वास्थ्य में सुधार होने लगा था | तब से उनके पिता मानते थे कि उनके यहा किसी दिव्य आत्मा ने जन्म लिया है | थोनडुप का पालन पोषण अब घर पर ही होने लगा जिसमे उनकी बड़ी बहन का बहुत बड़ा योगदान था जो उन्हें खाना खिलाती और नहलाती थी | थोनडुप के बाद भी उसके परिवार में 7 भाई बहनों का जन्म हुआ था लेकिन उनमे से केवल 2 बच्चे ही जीवित रहे थे | इस तरह उनके परिवार में केवल 7 जीवित सन्तान थी | उस समय कृषि और पशुपालन सम्भालने के लिए ज्यादा संताने होने को महत्ता दी जाती थी |

The Search of Dalai Lama दलाई लामा की खोज

Dalai Lama दलाई लामा किसी व्यक्ति विशेष का नाम नही बल्कि एक उपाधि है जो किसी विशेष व्यक्ति को दी जाती है  | यह उपाधि उस व्यक्ति को दी जाती है जो बौद्ध धर्म के गिलुग सम्प्रदाय का आध्यात्मिक नेता होता है | दलाई लामा के बारे में ऐसा माना जाता है कि यह तुल्कुओ की लम्बी परम्परा का वर्तमान अवतार है | बौद्ध धर्म के अनुसार तुल्कू वह आत्मा होती है जिसे बुद्धत्व की प्राप्ति हो जाती है और वो जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है लेकिन जन कल्याण के लिए पपृथ्वी पर जन्म लेता है | वैसे तो दलाई शब्द मंगोलिया भाषा का शब्द है जिसका अर्थ “समुद्र ” होता है और लामा का अर्थ गुरु होता है इस प्रकार “ज्ञान के समुद्र” को दलाई लामा कहा जाता है | दलाई लामा को जीवित बुद्ध की उपाधि भी दी जाती है |

वैश्विक स्तर उन्हें हिज हाईनेस दलाई लामा Dalai Lama कहा जाता है ल्हाओ से पूर्व 13 दलाई लामा हो चुके है | भारत में जिस प्रकार राम और श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है उसी प्रकार तिब्बत में दलाई लामा जी अवलोकितेश्वर भगवान बुद्ध का अवतार माना जाता है | प्रथम दलाई लामा का जन्म 1351 में हुआ था | उसके बाद से अब तक 14 दलाई लामा पृथ्वी पर जन्म ले चुके है | ऐसा माना जाता है कि  देववाणी से भावी दलाई लामा की खोज के संकेत मिलते है जो किसी दलाई लामा की मौत के बाद से ही शुरू होते है | पूर्व दलाई लामा ही नये अवतार को खोजने में मुख्य संकेत देते है | नये दलाई लामा की खोज प्रक्रिया को येंग्सी नाम से पुकारा जाता है |

वर्तमान दलाई लामा Dalai Lama की खोज की कहानी बड़ी रोचक है | सन 1933 में 57 वर्ष की उम्र में 13वे दलाई लामा युप्तेन ग्यात्सो का निधन हुआ था | कुछ समय तक उनके शव को सुरक्षित रखा गया था | एक दिन देखा गया कि शव का चेहरा दक्षिण दिशा से घूमकर उत्तर पूर्व दिशा में हो गया था | इस घटना के तुंरत बाद तिब्बत में दलाई लामा की खोज के संकेत मिले थे | तिब्बत में रीजेंट को एक सपना आया था जिनको सपने में लह्मोई ल्हत्सो झील दिखाई दी थी | रीजेंट अपने आप में एक पहुचे हुए लामा हुआ करते थे | इस झील के शांत पानी में तीन तिब्बती अक्षर उभर आ . क और म दिख रहे थे जिनके पीछे तीन मंजिला मठ दिखाए दे रहा था जिसकी छत सोने की बनी हुयी थी | इसी मठ से एक पगडंडी निकलकर एक पहाडी की ओर जाती है जिसके अंत में एक छोटा सा घर दीखता है जिसकी छत पर परनाला होता है | इसके बाद रीजेंट का सपना टूट जाता है  |

उठने के बाद उन्होंने विचार किया कि आ शब्द का अर्थ आद्बो प्रदेश से है जो उत्तर पूर्व दिशा में है जहा तेरहवे दलाई लामा का सर घुमा था | इसका अर्थ यह था कि नये दलाई लामा का जन्म उत्तर पूर्व दिशा में हो चूका है | तिब्बत सरकार ने नये दलाई लामा की खोज के लिए दल का गठन किया जिसका मुखिया उत्सांग रिन्पोचे को बनाया गया | अब खोजी दल रवाना हो गया और चलते चलते कुम्बुम मठ पहुच गये जहा उनको सपने में मठ दिखा था | ये मठ वही मठ जिसकी छत सोने की थी और मठ के आगे पहाडी पर एक पग डंडी जा रही थी | अब इस रस्ते से खोजी दल गाँवों में उस घर को ढूंढने लग गया जो रीजेंट के स्वप्न में परनाले के रूप में दिखाई दिया था |

अब खोजी दल घूमते घूमते तक्सेर गाँव पहुचा जिसमे उनको खपरैलवाला परनाला वाला घर दिखाई दिया | खोजी दल प्रस्सन हो गया और बिना किसी को कुछ बताये उस रात को उसी गाँव में ठहर गये | अब खोजी दल के मुखिया उस घर में मेहमान बनकर गये और सबसे छोटे बच्चे के व्यवहार को देखने के लिए उसके साथ खेलने लग गये |तेरहवे दलाई लामा की मृत्यु 1933 में हुयी थी और घर में जन्मे बच्चे का जन्म 1935 में हुयी थी | इसका अर्थ दलाई लामा बनने के नियम के अनुसार पूर्व दलाई लामा की मौत के दो साल बाद नये दलाई लामा के जन्म की बाते सच होती दिख रही थी | थोनपुंड की माँ ने मेहमानों का अच्छी तरह से स्वागत किया था |

थोनडुंग के घर में छ कमरे थे जिसमे एक कमरा मेहमानों के लिए , एक कमरा परिवार के मुखिया के लिए , एक भंडार गृह , एक प्राथना गृह ,एक रसोई घर था | जब खोजी दल वहा पहुचा तो थोनडुप ने तुंरत उसे पहचान लिया और तुतलाते हुए “सेरा लामा ” पुकारने लगे | रिन्पोचे के मठ का नाम सेरा ही था |अब रिन्पोचे को यकीन हो गया कि उनकी दलाई लामा की खोज खत्म हुयी और यही बच्चा अगला दलाई लामा बनेगा | खोजी दल उस समय तो वापस लौट गया लेकिन कुछ समय बाद प्राधिकृत सरकारी प्रतिनिधि मंडल के साथ वापस उस गाँव में लौटा और बहुत सारी चीजे साथ लेकर आया | जब उस बालक थोनडुप के समक्ष ये चीजे रखी तो उन्होंने कीसी में भी रूचि नही दिखाई जिससे प्रतिनिधि मंडल को यकीन हो गया कि थोनडुप ही दलाई लामा के अवतार है

जब परिवार के लोगो को पता चला कि उनका छोटा बच्चा दलाई लामा का अवतार है तो वो बहुत खुश हो जाए | उनके परिवार के लोगो को भी बचपन से ये एहसास हो रहा था कि उनके घर में कीसी दिव्य आत्मा ने जन्म लिया है | अब प्रतिनिधि मंडल ने अपनी रिपोर्ट ल्हासा स्तिथ रीजेंट भेजी और कुछ महीने बाद ही उस बच्चे को दलाई लामा मानाने की स्वीकृति मिल गयी | अब सबसे पहले बच्चे को सुरक्षा की दृस्थी से  थोनडुप को कुसुबुम मठ पहुचा दिया गया जिस समय उनकी आयु 3 वर्ष थी | कुछ दिनों तक उन्हें मठ में रखा गया और 1939 की गर्मियों वो ल्हासा के लिए रवाना हो गये | उनके साथ उनके माता-पिता, भाई लोबसांग और खोजी दल के सदस्यों के साथ कुछ तीर्थ यात्री थे | अब कुमबुम मठ से ल्हासा तक पालकी में उनकी यात्रा निकाली गयी जिसे दो खच्चर खीच रहे थे और दुसरे लोग पैदल या घोड़ो पर चल रहे थे | इस यात्रा में उनको तीन महीने का समय लगा |

Dalai Lama on Throne दलाई लामा की ताजपोशी

Child Dalai Lama on Throneल्हासा पहुचने के बाद थोनडुप का सरकारी अधिकारियो ने स्वागत किया और उन्हें एक बड़े मैदान में लाया गया | उस बड़े मैदान में एक सुंदर सिहांसन था जिस पर शिशु दलाई लामा को बिठाकर ल्हासा के अधकारियो ने उनका स्वागत किया | इसके बाद इसी मैदान में एक समारोह आयोजित किया गया जिसमे दलाई लामा को जनता का धर्मिक नेता घोषित किया गया | समारोह पूरा होने पर शिशु दलाई लामा को नोर्बुन्ग्लिका ले जाया गया जो दलाई लामा Dalai Lama  का ग्रीष्मकालीन निवास माना जाता है | दुसरी तरफ ल्हासा के पोटला महल में दलाई लामा के त्ख्तारोहन की तैयारिया चल रही थी |

1940 की सर्दियों में शिशु दलाई लामा को पोटला महल लाया गया और उनको धर्म गुरु के पद पर बिठाया गया | इस अवसर पर एक शोभायात्रा भी निकाली गयी जिसमे बड़ी संखया में लामाओं ने हिस्सा लिया | समारोह के बाद शिशु दलाई लामा को पोटला महल के बड़े सभागार में विशाल रतनजडित और नक्काशीदार लकड़ी के तख्त पर बिठाया गया | इस तख़्तपोशी के बाद शिशु दलाई लामा को ल्हासा के बीच स्तिथ जोरवांग मन्दिर में ले जाया गया | जहा शिशु दलाई लामा को भिक्षुत्व की शिक्षा देना आरम्भ किया गया | यहा पर ताफुय नामक एक अनुष्ठान में उनके बाल काटे गये |
अब शिशु दलाई लामा Dalai Lama को जीवन भर कटे बालो और गहरे लाल भूरे वस्त्रो में रहना निर्धारित कर दिया गया |  इस समारोह के बाद शिशु थोनडुप का नाम बदलकर जेटसन जामफेल ग्वांग लोबसेंग येशी तेनजिन ग्यात्सो रखा गया  जिसको आम जनता में संक्षेप में दलाई लामा ही कहा जाता था | इस समारोह के बाद दलाई लामा का बचपन पोटला महल और नोर्बुन्ग्लिंका में बीतने लगा | यह दोनों स्थान मौसम के अनुसार दलाई लामा के निवास के रूप में प्रयोग किये जाने लगे |

Education of Dalai Lama दलाई लामा की शिक्षा-दीक्षा

Education of Dalai Lamaअब दलाई लामा के शिक्षा दीक्षा की व्यवस्था की गयी | उनका परिवार भी महल के एक कोने में रहता था लेकिन उनको परिवार के साथ रहने की अनुमति नही थी | अब दलाई लामा को लामा के रूप में तो शिक्षा दे दी गयी थी लेकिन औपचारिक शिक्षा देनी शेष थी | उनके लिए रेटिंग रिन्पोचे नामक शिक्षक को नियुक्त किया गया जो आध्यात्मिक और दयालु लामा थे | दलाई लामा को समय समय पर अलग अलग शिक्षको से शिक्षा दी गयी | शिक्षा के रूप में केवल पढ़ाया जाता था और उनको अन्य बच्चो के साथ पढ़ाया जाता था | स्कूल में बच्चो को दंड देने के लिए चाबुक की भी व्यवस्था थी लेकिन दलाई लामा इतने होशियार और अनुशाषित थे कि उनको कभी चाबुक की नौबत नही आयी थी |

जब Dalai Lama दलाई लामा आठ वर्ष के हुए तब उनके भाई लोबसांग को प्राइवेट स्कूल में पढने भेज दिया जिसके कारण दलाई लामा अब अकेले हो गये थे | अब दलाई लामा को अपने परिवार की याद सताती थी जिसके लिए वो चुपके से  अपने परिवार से मिलने चले जाते थे | पोटला महल बहुत विशाल था जिसकी सातवी मंजिल पर दलाई लामा का निवास था | 13 वर्ष की उम्र में उन्हें लिखने की कला सिखाई गयी जिसमे उनको पांडूलिपियो को पढना और लिखना सिखाया गया था | अब बौद्ध धर्म दर्शन के अनुसार उनको आगे की शिक्षा दी गयी |

Dalai Lama दलाई लामा की दिनचर्या भी बहुत व्यवस्थित हुआ करती थी जो रोज सुबह छ बजे उठ जाते थे और एक घंटे प्रार्थना करने के बाद हल्का नाश्ता करते थे | इसके बाद पहली कक्षा लगती थी और दस बजे अध्ययन कार्य खत्म हो जाता था | इसके बाद बालक होने के बावजूद दलाई लामा को धार्मिक विषयों पर बात करने के लिए धर्म गुरुओ के पास बैठना पड़ता था | बैठको के बाद वो पुन: कक्षा में जाते थे जो दोपहर तक चलती थी | इसके बाद हल्का भोजन होता था और शाम को चार बजे चाय मिलती थी | पांच बजे छुट्टी हो जाती थी जिसके बाद दलाई लामा अपने मनपसंद खेल खेला करते थे | सात बजे शाम का भोजन होता था और भोजन के बाद कुछ देर टहलने के बाद वो सो जाते थे |

1950 में उन्हें पुरी तरह तिब्बत के लिए समर्पित होना पड़ा था जो पुरी तरह युवा भी नही हुए थे | 15 वर्ष की उम्र में ही उन्हें तिब्बत प्रशाशन ने तिब्बत की बागडोर दे दी और उन्होंने बड़ी बुद्धिमानी से तिब्बत के कामो में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था | उनको बाहरी दुनिया की शिक्षा देने के लिए आस्ट्रिया के पर्वतारोही हिनरिच हैरर को चुना गया जिन्होंने अपनी मृत्यु तक दलाई लामा को शिक्षण दिय था | 1959 में उनके बौद्ध ज्ञान की अंतिम परीक्षा हुयी थी जिसमे कई बौद्ध भिक्षु शामिल हुए थे | इस परीक्षा में तेनजिन उर्फ़ दलाई लामा उत्तीर्ण घोषित हुए और इसके साथ ही उनको दलाई लामा की उपाधि और लार्म्पा डिग्री प्रदान की गयी जो तिब्बत की सबसे बड़ी शैक्षणिक उपाधि होती है जो डॉक्टरेट ले समकक्ष मानी जाती है |इन पदवियो के पाने के बाद उनको तिब्बत का सबसे बड़ा राजनितिक नेता भी माना जाने लगा था |

Attack on Tibet and Exile of Dalai Lama तिब्बत पर आक्रमण और निर्वासन

Attack on Tibet and Exile of Dalai Lama1950 के दशक में चीन और तिब्बत के बीच कड़वाहट शूरु हो गयी थी | जब गर्मियों ने तिब्बत में उत्सव मनाया जा रहा था तब चीन ने तिब्बत पर आक्रमण कर दिया और प्रशाशन अपने हाथो में ले लिया | दलाई लामा उस समय मात्र 15 वर्ष के थे इसलिए रीजेंट ही सरे निर्णय लेते थे लेकिन उस समय तिब्बत की सेना में मात्र 8000 सैनिक थे जो चीन की सेना के सामने मुट्ठी भर सैनिक थे | जब चीनी सेना ने तिब्बत पत कब्जा कर लिया तो वो जनता पर अत्याचार करने लगे गये | स्थानीय जनता विद्रोह करने लगी थी और दलाई लामा Dalai Lama ने चीन सरकार से बात करने के लिए वार्ता दल भेजा  लेकिन ज्यादा ख़ास समझौता नही हुआ था |

1959 में लोगो में भारी असंतोष छा गया था और अब दलाई लामा के जीवन पर भी खतरा मंडराने लगा था | चीन सरकार दलाई लामा को बंदी बनाकर तिब्बत पर पूर्णत कब्जा करना चाहती थी इसलिए दलाई लामा के शुभ चिंतको ने दलाई लामा को तिब्बत छोड़ने का परमर्श दिया | अब भारी दबाव के चलते दलाई लामा को तिब्बत छोड़ना पड़ा | अब वो तिब्बत के पोटला महल से 17 मार्च 1959 को रात को अपना आधिकारिक आवास छोडकर 31 मार्च को भारत के तवांग इलाके में प्रवेश कर गये और भारत्त से शरण की मांग की ||

Dalai Lama Peaceful Life in India भारत में निवास और विश्व शांति

Dalai Lama Peaceful Life in Indiaअपने निर्वासन के बाद Dalai Lama  दलाई लामा भारत आ गये और उन्होंने तिब्बत में हो रहे अत्याचारों का ध्यान पुरे विश्व की तरफ खीचा | भारत में आकर वो धर्मशाला में बस गये जिसे “छोटा ल्हासा” भी कहा जता है जहा पर उस समय 80000 तिब्बती शरणार्थी भारत आये थे |  दलाई लामा भारत में रहते हुए सयुक्त राष्ट्र संघ से सहायता की अपील करने लगे और सयुंक्त राष्ट्र ने भी उनका प्रस्ताव स्वीकार किया | इन प्रस्तावों में तिब्बत में तिब्बतियो के आत्म सम्मान और मानवाधिकार की बात रखी गयी | 1987 में अमेरिका में आयोजित बैठक में दलाई लामा ने शांति प्रस्ताव रखा जिसे जोन of पीस भी कहते है |इस प्रकार से चीन के साथ संघर्ष की समाप्ति हो गयी | 1991 में दलाई लामा ने तिब्बत लौटने की इच्छा जाहिर की ताकि चीन और तिब्बत के बीच समझौता कर सके लेकिन लोगो ने उन्हें जाने से रोका |Dalai Lama tourDalai Lama  दलाई लामा ने इसके बाद विश्व शांति के लिए विश्व के 50 से भी ज्यादा देशो का भ्रमण किया जिसके लिए उन्हें शांति का नोबेल पुरुस्कार भी दिया गया | 2005 और 2008 में उन्हें विश्व के 100 महान हस्तियों की सूची में भी शामिल किया गया | 2011 में Dalai Lama  दलाई लामा तिब्बत के राजिनितक नेतृत्व पद से सेवानिवृत हो गये | 14वे दलाई लामा ने पुरे विश्व में लामाओ को मशहूर कर दिया जिसके कारण लोग लामाओ का सम्मान करने लगे है | Dalai Lama  दलाई लामा वर्तमान में सोशल मीडिया से भी जुड़े हुए है और उनके विचारो को पुरी दुनिया में फैलाया जा रहा है | दलाई लामा के जीवन पर कई Documentry और फिल्मे भी बन चुकी है |

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