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सांप्रदायिकता पर निबन्ध | Communalism Essay in Hindi

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सांप्रदायिकता पर निबन्ध | Communalism Essay in Hindi
सांप्रदायिकता पर निबन्ध | Communalism Essay in Hindi

साम्प्रदायिकता का अर्थ जातीय वैमनस्य से लिया जा रहा है | एक जाति के दुसरी जाति के विरुद्ध किये जाने वाले कार्यो को सांप्रदायिकता का नाम दिया जाता है | अब तो सभी लोग एक जाति या मतवालों के विरुद्ध कुछ कहने को साम्प्रदायिक रंग दे देते है | सच्ची बाते कहना भी साम्प्रदायिक माना जाता है |

भारत के प्राचीन साहित्य में साप्रदायिक शब्द का अर्थ यह नही था जो आजकल लिया जा रहा है | तक किसी आचार्य की शिष्य परम्परा को सम्प्रदाय कहा जाता था | धार्मिक गूरुओ की परम्परा सम्प्रदाय कहलाती थी जैसे कि वैष्णव या शैव सम्प्रदाय | किसी काव्य सिद्धांत के समर्थक आचार्य भी उस सम्प्रदाय से सम्बधित माने जाते थे जैसे कि रस-सम्प्रदाय या अलंकार-सम्प्रदाय के आचार्य | इन सम्प्रदायों के अतिरिक्त किसी सम्प्रदाय का ज्ञान भारत में न था | बौद्ध और जैन सम्प्रदाय के विद्वान भी प्रसिद्ध होते थे परन्तु वर्तमान में प्रचलित साम्प्रदायिक अर्थ में उनका बोध कभी नही होता था |

विचित्र बात यह है कि जातिवाद को सभी नेता बढ़ावा देते है | अपने नाम के आगे गांधी , नेहरु , बोस , देशमुख , चौधरी , मनचंदा , नंदा , देसाई , वाजपयी सब लगाना चाहते है और दुसरी ओर देश में जातीय साम्प्रदायिकता को दूर करना चाहते है | इस विरोधी स्थिति का सामना किया जाना चाहिए | जातिवाद से ही आज का साम्प्रदायिक विरोध बढ़ता जाता है |

दुसरा तथ्य यह है कि आज सरकार स्वयं साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देती है | सभी सरकारी कागजो में ब्राह्मण ,क्षत्रिय और अधूत जातियों का नाम लिखा रहता है | जिस सरकार ने देश में सौ से अधिक अनुसूचित जातियों की सूची बना रखी है वह साम्प्रदायिकता को उखाड फेंकने की बाते किस प्रकार से करती है ? कितनी विचित्र बात है ? वस्तुत: सरकारी कागजो जाति भेद वाले नाम नही होने चाहिए | किसी भी व्यक्ति को जतिबोधक शब्द नही लिखने देना चाहिए |

सरकारी पक्ष एवं विरोधी पक्ष के नेता देश में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक जातियों के संबध में नारे लगाते है जब देश के सभी निवासियों को केवल भारतीय न कहकर सिख- मुसलमान , हिन्दू और ईसाई आदि कहा जाएगा तो साम्प्रदायिक वैमनस्य की आग अवश्य भड़केगी | शिक्षा संस्थाओ के नाम जब तक जातियों के नाम पर चलते रहेंगे , विश्वविद्यालयो के नाम जब तक जतिबोधक रहेंगे ,तब तक साम्प्रदायिक तनाव कम नही होंगे |

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के साम्प्रदायिक ढाँचे को तोडकर जब नया कानून बनाया गया तो मुसलमानों ने विरोध किया , ऐसी दशा में सरकारी निति पुन: शिथिल हो गयी है | इससे साम्प्रदायिकता को फैलने का अवसर मिलता है | साम्प्रदायिक तत्वों को सरकार कठोरता से दंडित नही कर पाती है क्योंकि अल्पसंख्यक का प्रश्न सामने आ जाता है | सरकार को असाम्प्रदायिक निति अपनाकर सबको समान समझना चाहिये | एक ओर तो देश को धर्म निरपेक्ष उया सर्वधर्मसमभाव वाला होने का प्रचार किया जाता है तो दुसरी ओर धार्मिक आधार पर ही लोग अल्पसंख्यक बने हुए है |

देश में कई बार साम्प्रदायिक विरोधी सम्मेलन हो चुके है | हर बार हिन्दू जाति के लोगो को ही संकीर्ण कहा गया है | अल्पसंख्यको के अधिकारों की रक्षा की दुहाई दी जाती है परन्तु उनके कर्तव्यो की ओर कोई ध्यान नही देता है | साम्प्रदायिकता को जीवीत रखने वाले नेता लोग भाषण साम्प्रदायिकता के विरोध में देते है परन्तु पकिस्तान से आने वाले मुसलमानों को आज तक नही रोक सके |

परमिट या प्रवेश-पत्र के बिना लाखो मुसलमान इस देश में रहकर जनसंख्या वृद्धि कर रहे है | देश की आर्थिक स्थिति को डांवाडोल कर रहे है | उन्हें अल्पसंख्यक कहकर टाला जाता है और बहुसंख्यक जाति के नाम पर दोष लगाये जाते है | सरकार ने सामूहिक दंड देने की निति भी अपनाई है | इस प्रकार से साम्प्रदायिकता कभी दूर नही होगी |

यह बात ध्यान में रखनी होगी कि सरकार सब लोगो को समान समझे और जातिबोधक नाम किसी को भी न लिखने दे | केवल भारतीय ही नाम लिखा जाए | धार्मिक संकीर्णता की उपेक्षा धार्मिक उदारता बरती जाये | देश के नागरिको को सब उपासना एवं पूजा स्थानों में जाने का अधिकार दिया जाए | सभी प्रतिबन्ध हटा दिया जाए | तभी देश में असाम्प्रदायिक स्थिति पैदा हो सकती है |

साम्प्रदायिकता का जहर केवल राजनीतिज्ञों का पैदा किया हुआ है इसलिए देश की जनता को चाहिए कि सहृदयता के साम्प्रदायिकता-विरोधी मंडल स्थापित करके इसके रोग को समाप्त करे | वास्तव में लोगो में स्वदेश की भावना आते ही साम्प्रदायिकता समाप्त हो जायेगी | 1986 में मुरादाबाद , लखनऊ , इलाहाबाद ,मेरठ अरु दिल्ली में भी दंगो की आग भडकी परन्तु सरकार ने उस पर काबू पा लिया था |

भारत का इतिहास पढने पर पता चलता है कि मत-मतान्तरो में तो वाद-विवाद चलते रहते है परन्तु साम्प्रदायिक दंगे कभी नही होते है | शासक लोग अपनी राजनीती से उन्हें दबाते रहते है परन्तु अंग्रेजो ने भारत में शासन जमाने के लिए साम्प्रदायिकता की जडो को जमाया था | देश के स्वतंत्र होने के पश्चात अब इस साम्प्रदायिकता को नष्ट किया ही जाना चाहिए | राजनीतिज्ञों को अपने स्वार्थ के लिए साम्प्रदायिकता का तनाव नही फैलाना चाहिये और सरकार को भी कठोर कानून बनाकर साम्प्रदायिकता समाप्त करनी चाहिए |

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