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Child Labour Essay in Hindi | भारत में बाल श्रमिक समस्या पर निबन्ध

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Child Labour Essay in Hindi | भारत में बाल श्रमिक समस्या पर निबन्ध
Child Labour Essay in Hindi | भारत में बाल श्रमिक समस्या पर निबन्ध

भारत एक विकासशील देश है | स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के नागरिको की गरीबी हटाने के लिए अनेक बृहद एवं सिमित योजनाये समय समय पर बनती गयी | फिर भी गरीबी की मान्य सीमा रेखा से भी निचली सतह पर जीवन जीने को विवश लोगो की संख्या यहाँ कम नही हो सकी | बाल श्रमिक समस्या का संबध मुख्यरूप से गरीबी से है | जिन नन्हे मुन्नों के खेलते-खाने या पढ़-लिखकर अपना भविष्य संवारने के दिन होते है उन दिनों वे बच्चे भूखे प्यासे कठोर श्रम के लिए विवश होते है | उन बच्चो को केवल काम ही नही करना पड़ता बल्कि निर्दयी मालिको की भद्दी गालियाँ भी सुननी पडती है |

आज राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक वर्ष बाल-दिवस मनाया जाता है | बच्चो को भविष्य का नागरिक घोषित करके उनके उचित लालन-पालन को राष्ट्रीय एवं महत मानवीय कर्तव्य कहा जाता है | परन्तु वस्तु-स्थिति यह है कि बाल-श्रमिको की समस्या और स्थिति सुधरने के स्थान पर ओर भयावह होती जा रही है | भारत में बाल श्रमिको की समस्या कोई नई बात नही है | स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले भी घरो में बाल-श्रमिक देखे जाते थे | इन बाल-श्रमिको में ज्यादा पहाडी क्षेत्र या दूर-दराज देहात के बच्चे हुआ करते है | अब भी वैसे बच्चे बाल-श्रमिक होते है | जिनका परिवार दरिद्र और अशिक्षित है |

आज केवल पहाडी क्षेत्रो के बाल श्रमिक ही नही प्रत्येक क्षेत्र के बाल श्रमिक देखे जा सकते है | इनका कार्यक्षेत्र केवल घरो तक ही सिमीत नही रह गया होटलों , दुकानों , कल-कारखानों , छोटी बड़ी फैक्ट्रियो आदि स्थानों पर उन्हें कठोर श्रम करके बचपन को बर्बाद करना पड़ता है | अक्सर यह देखा जाता है कि बाल-श्रमिक दूर दराज के देहातो से आये हुए बच्चे ही होते है | घोर दरिद्रता बाल श्रमिको का मूल कारण है | कुछ बच्चे माता-पिता के कठोर व्यवहार से तंग आकर भी घर से भाग जाते है और उन्हें बाल श्रमिक बनने पर मजबूर होना पड़ता है |

विमाता के व्यवहार से पीड़ित होकर घरो से भागकर श्रम के लिए विवश होने वाले बच्चो की कमी नही है | निर्धनता , दुर्व्यवहार , कुसंगति आदि मुख्य स्त्रोत एवं कारण है जो बाल-श्रम को बढ़ावा देते है | बाल श्रम के कुछ परम्परागत कारण भी है जैसे मोची , बढ़ई , लोहार आदि स्वभाव से ही श्रमजीवी होते है | इनके बच्चे जैसे ही पांच-सात साल के होते है उन्हें छोटे-मोटे कामो में लगा दिया जाता है | उनकी पढाई-लिखाई की ओर स्वयं अशिक्षित होने के कारण उनका ध्यान ही नही जाता | मुख्य बात यह है कि ऐसे बच्चे स्वतंत्र धंधे अपनाने के कारण स्वावलंबी होते है | जैसे पोलिश आदि करने वाले , मुंगफली बेचने वाले बच्चे आदि |

बाल श्रमिक युवको-प्रौढ की तुलना में सस्ते मिल जाते है | इनमे मालिको को कोई खतरा भी नही रहता | कम दाम और मनमाना काम यह मनोवृति इन बेचारो के शोषण के पीछे साफ़ स्पष्ट देखी जा सकती है | यों भारत में और अंतर्राष्ट्रीयता के स्तर पर भेई 14 वर्ष से कम आयु के बच्चो से काम न लेने का कानून बना हुआ है पर इसकी प्रवाह कौन करता है ? कई बार गरीबी और भुखमरी की स्थिति में स्वयं माँ-बाप अमीरों,ठेकदारो के हाथो बच्चो को या तो बेच देते है या बंधक रख देते है | तब उनकी स्थिति बंधुआ जैसी हो जाती है | उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है | बच्चो से कठोर काम करवाना एक घोर अपराध एवं अमानवीय कार्य है | इसका निराकरण आवश्यक है |

बच्चे राष्ट्र की सम्पति और भविष्य के नागरिक हुआ करते है | अत: प्रत्येक राष्ट्र का यह पहला कर्तव्य होता है कि अपनी इस चल-सम्पति की रक्षा और विकास की तरफ उचित ध्यान दे | बाल-श्रमिक बनने को बाध्य होने की जो स्थितियां है या हो सकती है उन्हें दूर करना राष्ट्र का राष्ट्रीय एवं सहज मानवीय दोनों प्रकार का कर्तव्य है | यदि इस ओर तत्काल ध्यान न दिया गया तो बाल-श्रमिको के रूप में मानवता पिसती ही रहेगी , हमारा भविष्य भी खतरे में पड़ जायेगा | इस अमानवीय लापरवाही के कारण इतिहास हमे कभी माफ़ नही करेगा |

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