Aurobindo Ghosh Biography in Hindi | अरविन्द घोष की जीवनी

Aurobindo Ghosh Biography in Hindi
Aurobindo Ghosh Biography in Hindi

इस भारत भूमि में अनेक योगी-महात्माओं ने समय समय पर जन्म लिया है | स्वामी दयानन्द , रामकृष्ण परमहंस , स्वामी विवेकानंद इत्यादि के नाम आप में से बहुतो ने सुने होंगे | अरविन्द घोष (Aurobindo Ghosh) भी एक महान योगी और संत थे अपने ढंग के बिल्कुल ही निराले संत | उनका जन्म 15 अगस्त 1872 को बंगाल के एक सम्पन्न परिवार में हुआ था | उनके पिता का नाम डॉक्टर कृष्णधन घोष और माता का नाम श्रीमती स्वर्णलता देवी था | डॉक्टर कृष्णधन सिविल सर्जन थे और पुरी तरह पश्चिमी सभ्यता में रंग गये थे | वैसा ही वह अपने बच्चो को बनाना चाहते थे | अरविन्द से बड़े उनके दो ओर पुत्र थे |

अरविन्द (Aurobindo Ghosh) बचपन से ही बड़े कुशाग्र बुद्धि और चंचल थे | उन्हें देखकर लोग बरबस उनकी ओर आकर्षित हो उठते थे | “होनहार बिरवान के होत चिकने पात” वाली कहावत उन पर पुरी तरह लागू होती थी | जब वह पांच वर्ष के थे तभी उन्हें पढने के लिए दार्जीलिंग के एक अंग्रेजी स्कूल में भेजा गया | उनके साथ उनके दो बड़े भाई भी थे | इन तीनो भाइयो के अतिरिक्त वहां सभी अंग्रेजो के बच्चे पढ़ते थे | चूँकि अरविन्द बड़े हाजिर जवाब थे इसलिए उनके अध्यापक उनसे बहुत प्रसन्न रहते थे |

सात वर्ष की छोटी अवस्था में अरविन्द (Aurobindo Ghosh )अपने माता-पिता के साथ इंग्लैंड गये | वहां एक सम्पन्न और सभ्य अंग्रेजी परिवार में उन्हें ओर उनके दोनों भाइयो की शिक्षा ग्रहण करने के लिए छोड़ दिया | इस परिवार में द्युत दम्पति के संरक्षण में अरविन्द ने लैटिन भाषा में काफी अच्छी योग्यता प्राप्त कर ली पर अचानक डुएट परिवार को इंग्लैंड के बाहर जाना पड़ा और तीनो भाइयो को लन्दन के सेंट पॉल स्कूल में भर्ती कर दिया गया | अरविन्द की स्मरण शक्ति बचपन से ही बड़ी तीव्र थी | साथ ही वह प्रत्येक बात पर बड़ी गहराई से सोचते थे | अत: शीघ्र ही वहा के मुख्याध्यापक उनसे प्रभावित हो गये और उनके पढने-लिखने में इतनी रूचि लेने लगे कि कुछ ही समय में वह ऊँची कक्षाओं में जा पहुचे | ग्रीक और लैटिन का उन्होंने बहुत ही अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया | स्कूल में विद्याअध्ययन करते समय अरविन्द ने अंग्रेजी काव्य और फ्रांसीसी साहित्य भी खूब पढ़ा |

स्कूल की पढाई खत्म करके अरविन्द कॉलेज पहुचे | वहा किंग्स कॉलेज में उन्होंने ग्रीक और लैटिन में असाधारण योग्यता दिखाकर अनेक पुरुस्कार प्राप्त किये | वह स्वयं भी अंग्रेजी में अच्छी कविता करते थे | 18 वर्ष की आयु में वह ICS की परीक्षा में बैठे | इस परीक्षा में उन्होंने ग्रीक और लैटिन में सबसे अधिक नम्बर लाये और बड़े सम्मान के साथ पास हुए परन्तु घुड़सवारी में पीछे रह गये | इस तरह वह ICS में न आ सके | पर एक तरह से यह अच्छा ही हुआ क्योंकि ICS से बाहर रहते हुए उन्होंने जितने महान कार्य किये उतने शायद ICS में आने के बाद न कर पाते |

इंग्लैंड में ही अरविन्द (Aurobindo Ghosh) की भेंट बडौदा नरेश से हुयी और उन्होंने उन्हें अपना प्राइवेट सेकेट्री बना लिया | तदुपरांत इंग्लैंड में पुरे 14 वर्ष बिताने के बाद एकदम विलायती आचार-विचार में रंगे हुए अरविन्द भाइयो के साथ भारत लौटे | पर जब ये लोग रास्ते में ही थे | तब उनके पिता को यह समाचार मिला कि जिस जहाज में तीनो भाई आ रहे थे वह डूब गया | इस दुखद समाचार को डॉक्टर कृष्णधन बर्दाश न कर सके तत्काल ही उनका निधन हो गया |

बडौदा नरेश के यहाँ कुछ समय काम करने के पश्चात अरविन्द ने अनुभव किया कि उन जैसा स्वतंत्र विचार वाला व्यक्ति राजा-महाराजाओं की नौकरी के लिए सर्वथा अनुपयुक्त है अत: उक्त नौकरी को छोडकर वह बडौदा कॉलेज में प्रोफेसर हो गये | फिर कुछ ही समय बड़ा वह उक्त कॉलेज के वाईस प्रिंसिपल बना दिए गये | उनके विद्यार्थी उनसे इतना प्रेम करते थे कि उसका वर्णन नही किया जा सकता | अरविन्द की विद्वता और सरल व्यवहार की प्रशंशा करते वह अघाते नही थे | वह सचुमुच अपने विधार्थियों के आदर्श बन गये थे |

अपने देश लौटने के बाद अरविन्द के मन में भारतीयता की भावना जागी | उन्होंने भारतीय भाषाए सीखना आरम्भ किया और शीघ्र ही बंगला ,संस्कृत ,गुजराती मराठी आदि भाषाओं के अच्छे ज्ञाता बन गये | सिर्फ यही नही , भारतीय साहित्य और दर्शन पढकर वह पक्के सनातनी भी हो गये | मृणालिनी जी के साथ उनका विवाह भी सनातनी विधि से हुआ | विवाह के पश्चात कुछ वर्ष अरविन्द अपने छोटे से परिवार में सुखपूर्वक रहे पर भारतीय साहित्य के गहन अध्ययन के कारण शीघ्र ही उनका मन योग की ओर खींचने लगा | वह योगाभ्यास करने लगे |

कुछ समय बाद उन्होंने बडौदा कॉलेज की नौकरी छोड़ दी और कलकत्ता के नेशनल कॉलेज के प्रिंसिपल हो गये | उनके जीवन का नियम था सादा जीवन और उच्च विचार | उन्होंने रामकृष्ण और विवेकानंद की लगभग सभी पुस्तके पढ़ी और उन पर गम्भीरतापूर्वक मनन किया | इन पूस्तको का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा | भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में भी अरविन्द (Aurobindo Ghosh) ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की | वह कहा करते थे कि पहले पूर्ण रूप से भारतीय बनो क्योंकि राष्ट्रीयता अमर है | संयोग से उनके जन्म जन्म दिवस 15 अगस्त को ही भारत की स्वतंत्रता प्राप्त हुयी |

इंग्लैंड से लौटने के बाद ही अरविन्द को भारत की पराधीनता खलने लगी थी | जिस व्यक्ति का पालन-पोषण इंग्लैंड के स्वतंत्र वातावरण में हुआ हो , उसका भारत के पराधीन वातावरण में दम घुटना स्वाभाविक ही था अत: धीरे धीरे उनमे विद्रोही भावना पनपने लगी और उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं में भारतीय राजनितिक परिस्थिति पर अपना नाम दिए बिना लेख लिखने आरम्भ किये | उनके लेख बड़े प्रभावशाली होते थे | उनके ख्याल में , भारत की पराधीनता का कारण अंग्रेजो का प्रभुत्व न होकर भारतवासियों की हीनता और अज्ञानता था | अत: उनके विचारोत्तेजक लेखो से जहां एक ओर जनता प्रभावित हुयी , दुसरी ओर सरकार चौक उठी | वह उन लेखो के लेखक के संधान में लग गयी | इसी बीच अलीपुर बम षडयंत्र का भंडाफोड़ हुआ और अरविन्द पकडकर जेल भेज दिए गये | अब कारवास की कोठरी में , उन्हें योग के लिए उपयुक्त अवसर मिला | उनकी अंतरात्मा में उन्हें राजनितिक कार्य छोडकर आत्मा की खोज करने का आदेश दिया |

पांडिचेरी पहुचने के बाद अरविन्द सांसारिक कार्यो से अलग होकर आत्मा की खोज करने लगे | इसी विषय पर उन्होंने लेख लिखने शुरू किये , जो देश-विदेश में बड़े आदर के साथ पढ़े जाते थे | उनके विचारो से प्रभावित होकर लोग दूर दूर से उनके दर्शन के लिए आने लगे | इसी समय एक फ़्रांसिसी दम्पती उनके दर्शन के लिए आये | वे दोनों उनसे इतने प्रभावित हुए कि उनके साथ ही रहने लगे | आगे चलकर वह महिला अरविन्द आश्रम की आत्मा बन गयी | आज संसार उन्हें मदर के रूप में जानता है | द्र्श्नाथियो और शिष्यों की बढती संख्या को देखते हुए उनके ठहरने के लिए पांडिचेरी में निर्मित आश्रम का संचालन भार उन्ही पर है |

पांडिचेरी आने के बाद से अपने जीवन के अंत तक अरविन्द योगाभ्यास में लगे रहे | योगाभ्यास के द्वारा ही उन्होंने परमात्मा की साक्षात्कार की अनुभूति भी प्राप्त की | मानव मात्र की आध्यात्मिक उन्नति के क्षेत्र में उनका योगदान सचमुच बड़ा महत्वपूर्ण रहा | उनके आध्यात्मिक अनुभवो ने असंख्य लोगो को लाभान्वित किया | यह लाभ दलित-पीड़ित मानवता की ओर भी विपुल मात्रा में प्राप्त होता यदि 5 दिसम्बर 1950 को उनकी जीवन ज्योति सदा के लिए बुझ न जाती | मृत्यु से पूर्व अरविन्द ने भारतवासियों का जो अंतिम संदेश दिया था | उसमे उन्होंने कहा था “आध्यात्मिकता ही भारतीय लोकमानस की कुंजी है ” भक्ति की भावना उसकी सहजात भावना है भारत ने आदिकाल में ही इसे देख लिया और अपनी यह अंतर्दृष्टि कभी नही खोई , भविष्य भी उससे इस अंतर्दृष्टि की अपेक्षा करता है |

 

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