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    गुफाओं का गढ़ पीतलखोड़ा | Pitalkhora Caves Guide in Hindi

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    गुफाओं का गढ़ पीतलखोड़ा | Pitalkhora Caves Guide in Hindi
    गुफाओं का गढ़ पीतलखोड़ा | Pitalkhora Caves Guide in Hindi

    सह्याद्री पहाडी के सतमाला में पीतलखोड़ा (Pitalkhora) की गुफाए स्थित है | यहा एक पहाडी की चोटी पर स्थित 13 गुफाए है | यहा से घाटी का मनोहर नजारा देखने को मिलता है | यहाँ कई गुफाओं में नक्काशी और चित्रकला दिखाई गयी है जो ईसा पूर्व पहली सदी तक की है | ये सभी गुफाये अजन्ता के बाद ही खोजी गयी है | इनके बारे में सबसे पहले 1853 में लिखा गया और इसमें गुफा 3 और गुफा 4 का उल्लेख किया गया | ऐसा माना जाता है कि सातवाहन राजवंश के शासनकाल में पीतलखोड़ा की गुफाए खोदी गयी होगी |

    पीतलखोड़ा में अजंता के समय की गुफाए अहि | ऐसा प्रतीत होता है कि 5वी ईस्वी में वकाटका शासन में काफी समय बाद ये दिखाई दी होगी | हीनयान बौद्ध धर्म के समय इनके पूजा स्थलों पर बौद्ध और बोधिसत्व की कोई मूर्ति नही थी और न ही पीतलखोड़ा की गुफा नम्बर 3 में चित्रकारी के अलावा ओर कुछ भी नही दिखाई देता था | कई सारी गुफाओं की चित्रकला खराब हो चुकी है और कुछ चित्रकारी को लोगो ने तोड़ दिया है |

    अधिकतर और पेंटिंग्स या तो मौसम की मार से खराब हो गयी है या फिर लोगो ने इन्हें तोड़ दिया है | बौद्ध धर्म के हीनयान के समय में ये गुफाए देखने को मिली जो कि पश्चिमी भारत के बौद्ध मन्दिरों में आज भी देखने को मिलती है | इन गुफाओं को दो भागो में बांटा गया है | 1 से 9 नम्बर की गुफाए उत्तर-पूर्व दिशा की ओर है जो एक-दुसरे से सटी हुयी है | इन्हें पहले समूह में रखा गया है | पहाडी के दुसरी तरफ 10 से 14 गुफाए है | इन गुफाओं का मुख दक्षिण की ओर है और इन्हें दुसरे समूह में रखा गया है |

    कई गुफाए तो जीर्ण-शीर्ण हो गयी है या फिर क्षतिग्रस्त कर दी गयी है | गुफा 1 बहुत बडा विहार नजर आता है | गुफा 2 ,3 और 4 में इसी तरह के प्रांगण है जिसे ऐसा माना जाता है कि ये भी इसी काल के समय में रहे होंगे | गुफा 2 और 3 के बीच स्तिथ दीवार अब नष्ट हो गयी है | गुफा 2 एक विहार है जिसमे पहाडो को काटकर नालिया बनाई गयी है जो पानी के बहाव को गुफा 3 में जाने से रोकती है | गुफा 3 में पूजा होती है | गुफा 3 में बेहतरीन चित्रकारी है जो कि दीवारों और पिलरो पर बनी हुई है |

    हॉल के अलावा गलियारा बनाने के लिए 37 पिलरो की सहायता ली गयी है | प्रत्येक गलियारे के 10वे और 11वे पिलर को अभिलेख के लिए समर्पित किया गया है | जिन्होंने इन दोनों पिलरो को भेंट किया वे पैठाण के रहने वाले थे | नीचे बेसमेट में चले तो यहा नक्काशी की कई कलाए देखने को मिल जाती है | गुफा 4 में कई सारी छोटी गुफाये है जिनमे हाथी और घोड़ो की नक्काशी है | साथ ही दान-दाताओं के अभिलेख यहा देखने को मिल जाते है | इनके अलावा एक अन्य पहाडी पर राज कुमार के तौर पर बुद्ध को दर्शाया गया है जो राजमहल त्याग रहे है | बुद्ध के जीवन का यह एकमात्र दृश्य है जो पीतलखोड़ा में पाया गया है |

    क्षतिग्रस्त गुफा संख्या 5 एक विहार है जिसकी चट्टानों पर व्यापारियों की दान की हुयी चीजो के नाम उकेरित है | गुफा 6 ,7 और 8 भी विहार है | गुफा 6 में दीवारों पर पेंटिंग के कुछ निशाँ देखे जा सकते है | 7 और 8 में पत्थरों को काटकर बनाया जा रहा एक अधुरा हौज है | गुफा 9 विहार का विस्तार है और इसमें पेंटिंग तथा प्लास्टर के अवशेष है | पहाडी के दुसरी ओर गुफा संख्या 10 से 14 मौजूद है जिनमे पूजास्थल बनाये गये है और इनमे स्तूप रखे गये है | गुफा 11 में कई स्तूप है जो अलग अलग समय पर खुदाई के दौरान मिली थी | गुफा 13 और 14 का प्रांगण एक ही है और यहा बेहद खुबसुरत नक्काशीयुक्त मुर्तिया है लेकिन ये टूट चुके है | शहर से बहुत दूर होने के कारण पीतलखोड़ा में बहुत कम लोग इन गुफाओं को देखने आते है |

    कैसे पहुचे

    अजन्ता से 78 किमी दूर पीतलखोड़ा बसा है | यहा टैक्सी के जरिये पहुचा जा सकता है | पहाडी पर पैदल ही चढ़ा जा सकता है | ट्रेन से यहा पहुचने के लिए मुम्बई-चालीसगाँव के लिए रात को चलने वाली ट्रेन है | इसके बाद बस से प्राचीन पाटन देवी मन्दिर पहुचा जा सकता है | इसके अलावा आप चालीसगाँव से भामरवादी के लिए बस ले सकते है | इसके बाद गुफा सिर्फ 9 किमी दूर रह जाती है | यहा आने के बाद वापस जाते वक्त अजन्ता-एलोरा की गुफाए  घ्रुनेश्वर ज्योतिलिंग  ,बीबी का मकबरा और औरंगाबाद देख सकते है |

     

     

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    खजुराहो के मन्दिर , जहां पत्थर बोलते है | Khajuraho Temples History in Hindi

    खजुराहो के मन्दिर , जहां पत्थर बोलते है | Khajuraho Temples History in Hindi
    खजुराहो के मन्दिर , जहां पत्थर बोलते है | Khajuraho Temples History in Hindi

    विश्व के सर्वश्रेष्ठ आकर्षण केंद्र खजुराहो के मन्दिर (Khajuraho Temples) अपनी अद्वितीय कला एवं चित्रकारी के कारण पर्यटकों एवं कला प्रेमियों का ध्यान बरबस अपनी ओर आकृष्ट कर लेते है | यह मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित एक छोटा सा गाँव है | खजुराहो की उत्पत्ति की प्राचीन परम्परा एवं नामकरण के संबध में यह कहा जाता है कि एक समय इसके द्वार पर दो सुनहरे खजूर के पेड़ थे | चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृतांत का अनुसार उसने इसे “चीन-ची-टू” कहा | गन्ददेव के शिलालेख में इसे श्री खुजूर वाहिका कहा गया है | कवि चंद ने इसे खजूरपूरा अथवा खाजीपपूरा नाम दिया | अलबरूनी ने सन 1031 में इसे खजुराहो कहा | अंत में इब्नतुता ने सन 1235 इसका नाम खजुराहो रखा |

    कहते है कि खजुराहो कभी बड़ा शहर था जो आठ वर्गमील क्षेत्र में फैला हुआ था | वस्तुत: खजुराहो केवल एक ही मन्दिर नही है बल्कि दो दर्जन से अधिक मन्दिर है | ऐसा विश्वास है कि पूर्व में वहां 85 मन्दिर थे | 9वी एवं 12वी शताब्दी के बीच इन मन्दिरों का निर्माण शक्तिशाली चन्देल राजा यशोवर्धन ने करवाया | तत्पश्चात विद्याधर , कीर्ति वर्मन , मदन वर्मन आदि राजाओ ने इन मन्दिरों को बनवाया | 11वी शताब्दी में महमूद गजनवी ने भारत पर आक्रमण किया और सोमनाथ के मन्दिर को ध्वस्त कर दिया | उसके बाद वह खजुराहो भी गया था लेकिन क्न्दारिया महादेव मन्दिर की अद्भुद कला से वह इतना अभिभूत हुआ कि उसने उस मन्दिर को नही तुड़वाया |

    खजुराहो में ब्राहमण ,वैष्णव , शैव , शाक्त और जैन सभी धर्मो एवं मतो के मन्दिर स्थित है | इसके आलावा चौसठ योगिनी , चित्रगुप्त , सौर मत ,ब्रह्मा वराह , देवी लक्ष्मण ,देवी जगदम्बा , जवारी ,वामन खाखरामठ , चतुर्भुज मन्दिर , ललगंवा महादेव ,विश्वनाथ , मंगतेश्वर , पार्वती तथा महादेव शैव मत के मन्दिर है | जैन मन्दिरों में पार्श्वनाथ और आदिनाथ मन्दिर मुख्य है | इन मन्दिरों की अपनी अपनी कला एवं नक्काशी है | चौसठ योगिनी , ल्ल्ग्नवा महादेव , ब्रह्मा मन्दिर एवं वराह मन्दिरों के निर्माण विशेष ढंग से करवाया गया है | कुछ मन्दिरों के उपरी भाग सादे है तो कुछ कलापूर्ण |

    कन्दारिया महादेव में सबसे अधिक मैथुन (स्त्री-पुरुष संगम मुद्रा) को दिखलाया गया है | काम वासना में डूबे जोड़ो की मुर्तिया ,स्त्री-पुरुष के शारीरिक संबधो को बहुत सुंदर सहज और जीवंत रूपों में दर्शाया गया है | कुछ मुर्तिया इतनी सुंदर और जीवंत लगती है मानो वो अभी बोल पड़ेगी | इनका आध्यात्मिक एवं धार्मिक महत्व भी है तभी तो ये मन्दिरों में प्रतिष्टित है | खजुराहो के प्राय:सभी मन्दिर ग्रेनाईट और बलुआ पत्थर से निर्मित है | यहाँ गर्भगृह , अंतराल , महामंडप , मंडप तथा अर्द्धमंडप कई   मंदिरों में मिलते है | यहा देवताओं , सुन्दरियों ,परियोर नाग-कन्याओं की भी सैकड़ो मुर्तिया है | ऐसा  कहा जाता है कि लम्बी नाक और लम्बी गर्दन वाली औरतो की   मुर्तिया गुप्तकाल की   है |

    कुछ लोग इन मूर्तियों में तन्त्र-मन्त्र की छाया पाते है वस्तुत: 11वी-12वी शताब्दी में भारत में तंत्र-मंत्र का बड़ा प्रभाव था | अनेक पाखंडी तांत्रिक धर्म के नाम पर औरतो से खिलवाड़ करते थे | ऐसा अनुमान है कि चौसठ योगीनी का मन्दिर इन तांत्रिको ने ही बनवाया था | उस काल में भारत कला ,साहित्य एवं धन दौलत से अत्यंत समृद्ध था | यह विश्व भर में सोने की चिड़िया के नाम से विख्यात था | खजुराहो के मन्दिर भारत में निर्मित किसी भी मन्दिर की अपेक्षा भव्य एवं भावोत्पादक है | वे अपने सौन्दर्य एवं सजावट के लिए विश्वप्रसिद्ध है | प्राय: सभी मन्दिर ऊँचे और पक्के चबूतरे पर निर्मित है | वे सभी तत्कालीन स्थापत्य कला से परिपूर्ण है |

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    तुगलक वंश , जो अपनी कट्टरता के लिए हुआ कुख्यात | Tughlaq dynasty History in Hindi

    अलाउदीन खिलजी की मौत के बाद फ़ैली अर्थव्यवस्था का लाभ उठाते हुए गयासुद्दीन तुगलक ने 1320 ईस्वी में तुगलक वंश (Tughlaq dynasty) की स्थापना की | उसके पुत्र मुहम्मद तुगलक ने सल्तनत का राज्य मध्य एशिया तक फैलाया | उसने कृषि सुधार , सांस्कृतिक मुद्रा चलाई और अनेक सुधार किये | उसके बाद उसका चचेरा भाई फिरोज तुगलक गद्दी पर बैठा परन्तु उसकी मृत्यु के पश्चात राज्य लडखडा गया | यो तो तुगलक वंश का राज्य 1412 ईस्वी तक चलता रहा परन्तु 1398 में तैमुर आक्रमण ने दिल्ली सल्तनत को हिलाकर रख दिया था | आइये तुगलक वंश (Tughlaq dynasty) के शासको के बारे में विस्तार से आपको जानकारी देते है

    गयासुदीन तुगलक ने रखी तुगलक वंश की नीव

    तुगलक वंश की नींव रखने वाले गाजी मलिक ने सत्ता में आने के बाद अपना नाम गयासुद्दीन तुगलक रख दिया | गयासुद्दीन तुगलक के पिता तुर्की और माँ हिन्दू थी | सत्ता में आने के बाद सबसे पहले उसने दिल्ली के पास दिल्ली सल्तनत को मंगोलों से सुरक्षित रखने के लिए तुगलकाबाद का निर्माण करवाया | इन सब से उपर उसने तुगलक दुर्ग को अपने सभी मलिक ,अमीरों और खिलजी वंश के मंत्रियों , जिन्होंने सत्ता में आने के लिए उसका साथ दिया , को सौंप दिया | उसने खिलजी के उत्तराधिकारी खुसरो खान का साथ देने वालो को सजा दी |

    गयासुद्दीन तुगलक ने मुस्लिमो पर लगान दर कम कर दी लेकिन हिन्दुओ पर बढ़ा दी ताकि वो धन की कमी से विदोह न कर सके | 1321 में उसने अपने बड़े बेटे उलुग खान (मुहम्मद तुगलक ) को आरंगल और तिलंग के हिन्दू राजाओ को तबाह करने को भेजा | पहले प्रयास में तो वो असफल रहा लेकिन चार महीने बाद गयासुदीन ने भारी सेना के साथ एक बार फिर आरंगल भेजा | इस बार उलुग खान क सफलता मिली | आरंगल का पतन हुआ जिसका नाम बदलकर सुल्तानपुर कर दिया गया | वहा से सारी सम्पति लुटकर दिल्ली सल्तनत में लाई गयी |

    अब बंगाल के फिरोज शाह के खिलाफ युद्ध करने के लिए वहा के अमीरों ने गयासुद्दीन तुगलक को आमन्त्रण दिया | उसने दिल्ली को अपने बेटे उलुग खान को सौंपकर अपनी सेना को लुख्नौटी की ओर बढ़ा और अपने अभियान में सफलता पाई | जब गयासुदीन और उसका बेटा महमूद खान लखनौती से वापस दिल्ली लौट रहे थे तो उसके बड़े बेटे ने उसकी मौत की ऐसी साजिश रची ताकि सभी को ये एक दुर्घटना लगे | उसने निजामुद्दीन ओलिया के साथ मिलकर एक लकड़ी के आकृति कुश्क में उनको मार दिया |1325 ईस्वी में इस तरह की साजिश से उलुग खान अपन पिता और भाई को मारने में सफल था |

    मुहम्मद बिन तुगलक अपनी कट्टरता से हुआ कुख्यात | Muhammad bin Tughluq History in Hindi

    मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल ने दिल्ली सल्तनत का काफी विस्तार हुआ | उसने मालवा ,गुजरात ,तिलंग ,कम्पिला , लखनौती ,चटगाँव जैसे कई प्रदेशो पर आक्रमण कर उन्हें लुट लिया | उसने सुदूर अभियानों में काफी खर्च होता था लेकिन अपने हर हमले में वो गैर मुस्लिम साम्राज्यों से अपार धन सम्पदा लुटकर लाता था | उसने लगान ना देने वालो की लगान दरे बढ़ा दी थी | गंगा और यमुना की उपजाऊ जमीन पर सुलतान गैर मुस्लिम लोगो पर भूमि कर दस गुना और दुसरी जगहों पर बीसगुना कर दिया था |

    बढ़ते हुए लगान को देखकर हिन्दू किसानो के सारे गाँवों ने खेती करना छोडकर जंगलो में भाग गये और भूमि पर कुछ भी उगने से मना कर दिया | उनमे से कई तो लुटेरे बन गये | सुल्तान ने ओर अधिक क्रूरता से उनको जवाब देते हुए उनकी सामूहिक गिरफ्तारी करवाई और मौत के घाट उतार दिया | ईतिहास के पन्नो में मुहम्मद तुगलक को एक कट्टर मुस्लिम शासक बताया है जिसने ना केवल गैर मुस्लिम बल्कि मुसलमानों के भी कुछ सम्प्रदायों से क्रूरता की | उसने शिया मुसलमान ,सूफी कलंदर और दुसरे मुसलमानों को फांसी पर लटकाया |

    मुहम्मद बिन तुगलग ने एक नये शहर जहापनाह की स्थापना की , जो पुराने दिल्ल्ली के नजदीक है | बाद में उसने अपनी सल्तनत की राजधानी दिल्ली से महाराष्ट के देवगढ़ को बनाया | उसने दिल्ली की जनता को सामूहिक रूप से देवगढ़ चलने को विवश किया और मना करने वालों को मौत के घाट उतार दिया | एक अँधा व्यक्ति जो देवगढ़ जाने में असमर्थ था , को चालीस दिनों तक घसीट घसीट कर ले जाया गया | उसकी मौत हो गयी थी और उसका केवल बंधा पैर ही दौलताबाद पहुच पाया था |

    मुहम्मद बिन तुगलक का राजधानी बदलने का फैसला असफल हुआ क्योंकि दौलताबाद के बंजर इलाक था और वहा पीने के लिए पर्याप्त पानी भी नही था | आखिरकार मुहम्मद बिन तुगलक को वापस दिल्ली लौटना पड़ा | उसके इस स्थानान्तरण में दिल्ली से आये अनेक मुस्लिम दक्कन इलाके में रुक गये और वहा पर मुस्लिम आबादी का विकास हुआ | 1327 में मुहम्मद बिन तुगलक के खिलाफ बगावत शुरू हो गयी , जिससे समय के साथ दिल्ली सल्तनत सिकुडती गयी |

    इतिहासकार बताते है कि मुहम्मद बिन तुगलक ने हिन्दुओ के घरो को सिक्को की टकसाल बना दिया और नकली ताम्बे के सिक्के बनाना शूरू किया जिससे लगान वसूल किया जा सके | इसके बाद लोगो के बढ़ते क्रोध को देखते हुए उसने बाद में चांदी के सिक्के बनवाये थे जिससे उसका खजाना खाली हो गया था | उसके शासन में उसकी नीतियों से राज्य का राजस्व गिर चूका था | इस राजस्व को संतुलित करने के लिए उसने लगान ओर बढ़ा दिया था | मुहम्मद बिंग तुगलक की मौत के समय दिल्ली सल्तनत सिकुडकर विन्ध्याचल तक सिकुड़ गयी थी |

    फिरोज शाह था दोधारी तलवार | Feroz Shah Tughluq History in Hindi

    मुहम्मद तुगलक की मौत के बाद उसके चचेरे भाई फिरोज तुगलक को मंत्रियों ने सुल्तान घोषित कर दिया | फिरोज तुगलक एक दयालु और पवित्र स्वभाव का इन्सान था | वो किसानो का सच्चा मित्र था और उसने अपने पूर्वजो द्वारा लगाये सारे ऋण माफ़ कर दिए | उसने कुरान के लिखे अनुसार लगान की दर भी नियंत्रित कर दी | बंजर जमीनों पर फिर से खेती होने लगी | उसने सजा के रूप में दिए जाने वाले यातना और विकृति के लिए फौजदारी कानून भी बनाया | उसने दिल्ली में दीवाने खैरात नाम से एक दान विभाग भी बनाया |

    फिरोज तुगलक एक उत्साही इमारत निर्मानकर्ता भी था और अपनी जन सेवा के लिए काफी प्रसिद्ध हुआ | उसने दिल्ली की नई राजधानी फिरोजाबाद बनाई | उसने हिस्सार ,फतेहाबाद ,फिरोजपुर और जौनपुर की भी स्थापना की | फिरोज ने फिरोजपुर और हिस्सार तक पानी पहुचने के लिए यमुना नहर का भे निर्माण करवाया | उसने काली मस्जिद और लाल गुम्बद का निर्माण करवाया | उसने अशोक के दो स्थम्भो को दिल्ली में स्थापित किया जिसमे से एक खिजराबाद से और दूसरा मेरठ से लाया गया था |

    फिरोज शाह ने “फतुह्त फिरोज शाही” ली रचना भी के थी | उसने कई संस्कृत पुस्तको का पारसी में अनुवाद करवाया था | गुलामो को व्यवस्था में लाने का श्रेय भी फिरोज शाह को ही दिया जाता है | उसने शरिया के अनुसार लगान लेना शुरू किया | फिरोज शाह पहला मुस्लिम सुल्तान था जिसने ब्राह्मणों पर जजिया कर लगाना शूरू किया जो अब तक लगान से बच रहे थे | फिरोज गैर मुस्लिमो के प्रति असहिष्णु था और मुस्लिम समुदाय में फिरोज ने सुन्नियो को स्वीकार किया था शिया और इस्माइल को नही |

    हिन्दू मन्दिर तो फिरोज ने भी तुड़वाये थे | उसने एक बार एक ब्राह्मण को मुसलमान को  उपदेश देते हुए देखा तो उसे जिन्दा जला दिय था | फिरोज तुगलक को तुगलक वंश के पतन के लिए जिम्मेदार माना जाता है | उसकी जागीर प्रथा और गुलाम व्वयस्था से साम्राज्य का पतन हुआ | दुसरी तरफ उसकी हिन्दुओ और शिया मुसलमानों के प्रति असहिष्णुता भी उसके पतन का कारण था | उसके मौत के बाद उत्तराधिकारी की जंग में तुग्लको के बाद दिल्ली के पास छोटा सा इलाका ही शेष रह गया था |

    गृह युद्ध से हुआ तुगलक वंश का पतन

    फिरोज शाह तुगलक की मौत के चार साल पहले ही 1384 ईसवी में प्रथम गृह युद्ध की शुरुवात हो चुकी थी जबकि दूसरा गृह युद्ध फिरोज शाह की मौत के छ साल बाद 1394 ईस्वी में हुयी थी | इन गृह युद्धों का मुख्य कारण सुन्नी इस्लाम समुदाय के प्रति अपनी अलग अलग विचारधारा था | 1376 ईस्वी में फिरोज शाह के पौते के मौत हो गयी | इसके बाद से फिरोज शाह वजीरो की मदद से शरिया ओर ज्यादा माँगना शूरू कर दिया |

    1384 में फिरोज शाह बीमार पड़ गया | इससे पहले उसको सत्ता में लाने वाले सभी मुस्लिम मंत्री मर चुके थे और उनके वंशज सत्ता के लिए आपस में लड़ रहे थे | फिरोज शाह का के एक वफादार वजीर खान जहा प्रथम का बेटा खान जहा द्वितीय उसके पिता की मौत के बाद अपनी शक्ति को बढ़ा रहा था | उस युवा वजीर ने फिरोज शाह के पुत्र मुहम्मद शह से खुली दुश्मनी ले रखी थी |

    वजीर की बढती शक्ति के कारण अमीर और मंत्री भी उसके साथ हो गये थे | खान जहा ने फिरोज शाह को उसके एकमात्र बचे इकलौते पुत्र को सत्ता से हटाने के लिए कहा | अपने बेटे को हटाने की बजाय फिरोज शाह ने वजीर को हटा दिया | इसी कारण पहला गृह युध्ह छिड गया | वजीर की गिरफ्तारी और हत्या से दिल्ली के आस्पा विद्रोही बढ़ गये थे | 1387 में मुहम्मद शह को भी देश निकाला दे दिया गया |

    1388 में फिरोज शाह की मौत के बाद तुगलक खान ने सत्ता सम्भाली लेकिन आपसी जंग में वो भी मारा गया | 1389 में अबू बकर शाह सत्ता में आया लेकिन वो भी एक साल के अंदर मर गया | ये गृह युद्ध सुलतान मुहम्मद शाह के शासन मे भी चलता रहा |  जैसे जैसे गृह युद्ध बढ़ रहा था हिमालय की तलहटी के उत्तर भारत के लोगो के विद्रोह करते हुए कर देना बंद कर दिया | दक्षिण भारत के कुछ विद्रोही भी उनके साथ मिल गये |

    सुल्तान मुहम्मद शाह ने दिल्ली के पास हिन्दू विद्रोहियों पर आक्रमण कर सामूहिक कत्ल कर दिया | 1394 में लाहोर और दक्षिण एशिया के क्षेत्रो पर हिन्दुओ ने राज करना शूरू कर दिया | मुहम्मद शाह ने अपने बेटे हुमायु खान के साथ मिलकर उन पर आक्रमण किया | जब आक्रमण की तैयारी हो रही थी तभी 1394 जनवरी में सुल्तान मुहम्मद शाह की मौत हो गयी | उसके बेटे हुमायु खान ने सत्ता सम्भाली लेकिन उसको भी दो महीनों के अंदर मार दिया गया | हुमायु खान का भाई नसीरलुदीन महमूद शाह अब सत्ता में आ गया और उसने वजीरो और अमीरों से सहायता लेना शूरू कर दिया | 1394 में मुस्लिम मंत्रियों ने मिलकर दूसरा गृह युद्ध छेड़ दिया और इन गृह युद्धों के बीच तैमुर ने आक्रमण कर तुगलक वंश को नस्तेनाबुद कर दिया |

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    Hole Punch Facts in Hindi | पंचिंग मशीन से जुड़े रोचक तथ्य

    Hole Punch Facts in Hindi | पंचिंग मशीन से जुड़े रोचक तथ्य
    Hole Punch Facts in Hindi | पंचिंग मशीन से जुड़े रोचक तथ्य | Hole Punch History in Hindi

    Hole Punch का प्रयोग Paper में छेद करने के लिए किया जाता है ताकि उसे आसानी से फाइल में लगा सके | हमने फाइलों में देखा होगा कि दो वायर या रिंग निकली रहती है इन वायर में पंच किये हुयी शीट का कागजो को व्यवस्थित किया जाता है ताकि ये अपनी जगह से ना हिले | शुरुवात में एक छेद वाला पंच उपयोग होता था लेकिन समय के साथ डबल पंच का भी उपयोग होने लगा | भले ही आपको ये यंत्र छोटा सा लग रहा हो लेकिन इस यंत्र ने कंप्यूटर युग से पहले ऑफिस वर्क में अपना अभूतपूर्व योगदान दिया | आज भी आपको हर ऑफिस में Hole Punch और स्टेपलर जैसे दैनिक यंत्र अवश्य मिल जायेंगे | इस महान खोज के लिए गूगल ने 14 नवम्बर को इसका डूडल बनाया और बताया कि ये कितना महान आविष्कार था |

    • होल पंच (Hole Punch) का पहला पेटेंट 14 नवम्बर 1886 को अविष्कारक Friedrich Soennecken फाइल किया था
    • Friedrich Soennecken एक जर्मन ऑफिस सप्लायर थे जिन्होंने 1875 में खुद की कम्पनी F Soennecken Verlag शुरू की थी |
    • होल पंच (Hole Punch) के आविष्कार के साथ सोनेकेन ने फ्रेश पंच शीट को स्टोर करने के लिए रिंग बाइंडर का अविष्कार भी किया था
    • होल पंच के आविष्कार से अब तक 131 सालो बाद भी इसकी डिजाईन मे कोई परिवर्तन नही आया है |
    • होल पंच लीवर और स्ट्रिंग सिस्टम की मदद से पंच करता है जिससे एक साथ अनेको शीट को आसानी से पंच किया जाता है |
    • आजकल डबल होल पंच का काफी प्रयोग होता है फिर भी सिंगल होल पंच आज भी प्रचलन में है |
    • इसकी डिजाईन को बड़ा रूप देकर हजारो शीटो को एक साथ पंच करने का काम प्रिंटिंग इंडस्ट्री में किया जाता है |
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    Smog से जुड़े जहरीले तथ्य , जो आपकी उम्र को कर है कम | Smog Facts in Hindi

    Smog Facts in Hindi
    Smog Facts in Hindi
    Smog Facts in Hindi

    पिछले कुछ दिनों से देशी राजधानी नई दिल्ली Smog की चपेट में है दरअसल गाडियों और फक्ट्रियो से निकलने वाली खतरनाक गैस ,धुएं और कोहरे के मेल से Smog बनता है | Smog का असर हवा में कई दिनों तक रह सकता है | तेज हवा चलने या बारिश के बाद ही Smog का असर खत्म होता है | स्मॉग वो जहर है जो किसी को भी बहुत बीमार कर सकता है | स्मॉग गाडियों और फक्ट्रियो से निकले धुएं से मौजूद राख , सल्फर ,नाइट्रोजन , कार्बन-डाई-ऑक्साईड आदि जब कोहरे के सम्पर्क में आती है तो Smog बनता है | आइये Smog से जुड़े आपको भयावह तथ्य बताते है |

    • दिल्ली ,बीजिंग या फिर पेरिस विकास की राह में आगे बढ़ रहे लगभग सभी देश के बड़े शहर Smog नाम के खतरे का सामना कर रहे है |
    • Smog शब्द का इस्तेमाल 20वी सदी की शुरुवात से हो रहा है यह शब्द अंग्रेजी के दो शब्दों Smoke और Fog से मिलकर बना है |
    • आमतौर पर जब ठंडी हवा किसी भीडभाड वाली जगह पर पहुचती है तब Smog बनता है चूँकि ठंडी हवा भारी होती है इसलिए वह भीड़ वाले इलाके की गर्म हवा के नीचे एक परत बना लेती है तब ऐसा लगता है जैसे ठंडी हवा ने पुरे शहर को एक कम्बल की तरह लपेट लिया है |
    • विश्व स्वास्थ्य संघठन काफी समय से चेतावनी देता आया है कि सूक्ष्म पार्टिकुलेट कण , ओजोन ,नाइट्रोजन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाईऑक्साइड लोगो की सेहत के लिए बहुत खतरनाक है |
    • पिछले सालो में WHO ने बार बार कहा है कि इन हानिकारक पदार्थो के लिए एक सीमा तय करनी चाहिए नही तो बड़े शहरों में रहने वाले लोगो को बहुत नुकसान पहुचेगा |
    • जाड़ो में जब Smog का मौसम चल रहा होता है तब गाड़ीयो के धुएं से मिलने वाले ये सूक्ष्म कण बहुत बड़ी समस्या खडी कर देते है  इन सूक्ष्म कणों की मोटाई करीब 2.5 माइक्रोमीटर होती है और आपने इतने छोटे आकर के कारण यह साँस के साथ फेफड़ो में घुस जाते है और बाद में हृदय को भी नुक्सान पहुचा सकते है |
    • गर्मियों में जब Smog बनता है तो सबसे बड़ी समस्या ओजोन की होती है | कारो के धुएं में जो नाइट्रोजन ऑक्साइड एवं हाइड्रोकार्बन्स होते है वे सूर्य की रोशनी में रंगहीन ओजोन गैस में बदल जाते है | ओजोन उपरी वातावरण में एक रक्षा परत बनाकर हमे सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाता है |
    • वायु प्रदुषण की वजह से समय से पहले होने वाली मौतों मामल में चीन पहले नम्बर पर है और भारत दुसरे नम्बर पर है |
    • एक रिपोर्ट के अनुसार 2015 में वायु प्रदुषण की वजह से चीन में 11 लाख से ज्यादा लोग मारे गये जबकि भारत के 10 लाख 90 हजार लोग वायु प्रदुषण का शिकार हुए |
    • दुनिया के 90 प्रतिशत लोग आज भी अशुद्ध हवा में सांस लेते है |

    Smog से कैसे बचे

    • सुबह और शाम बाहर न निकले |
    • अच्छी क्वालिटी का मास्क पहने |
    • धुप निकलने के बाद टहले |
    • खुब पानी पीये
    • स्वस्थ खाना खाए |
    • अच्छी तरह हाथ-मुंह धोये
    • सांस लेने में तकलीफ हो तो डॉक्टर की सलाह ले |
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    अनसूया साराभाई , भारत की पहली महिला मजदूर नेता | Anasuya Sarabhai Biography in Hindi

    अनसूया साराभाई , भारत की पहली महिला मजदूर नेता | Anasuya Sarabhai Biography in Hindi
    अनसूया साराभाई , भारत की पहली महिला मजदूर नेता | Anasuya Sarabhai Biography in Hindi

    अनसूया साराभाई (Anasuya Sarabhai) भारत में महिला मजदूर आन्दोलन की प्रणेता थी | अनसूया (Anasuya Sarabhai) ने 1920 में टेक्सटाइल के क्षेत्र में भारत के सबसे पुराने मजदूर संघठन मजदूर महाजन संघ (Ahmedabad Textile Labour Association) की स्थापना की | उनकी याद में गूगल ने 11 नवम्बर 2017 को गूगल डूडल भी बनाया है | आइये उनकी जिन्दगी के बारे में आपको विस्तार से बताते है |

    प्रारम्भिक जीवन एवं शिक्षा | Early Life of Anasuya Sarabhai

    अनसूया (Anasuya Sarabhai) का जन्म 11 नवम्बर 1885 को एक अमीर साराभाई परिवार में हुआ था | जब वो केवल 9 वर्ष की थी तभी उनके माता-पिता का देहांत हो गया | इसके बाद उनके भाई अम्बालाल साराभाई और उनकी छोटी बहन के साथ अनुसूया को उनके चाचा के पास रहने को भेज दिया गया | केवल 13 वर्ष की उम्र में उनका विवाह हो गया लेकिन ये विवाह सफल नही रहा और वो वापस अपने  परिवार में आ गयी | इसके बाद वो अपने भाई की मदद से 1912 में मेडिकल डिग्री लेने के लिए इंग्लैंड चली गयी लेकिन बाद में उनका विचार बदल गया क्योंकि वहा जाकर उन्हें पता चला कि मेडिकल डिग्री में जीव-जन्तुओ को काटना पड़ता है जो उनकी जैन मान्यताओ के विपरीत था | इंग्लैंड में रहते हुए वो फेबियन सोसाइटी से प्रभावित हुयी और Suffragette movement में शामिल हुयी |

    अनसूया का राजनीतिक जीवन | Political Career of Anasuya Sarabhai

    1913 में अनुसूया (Anasuya Sarabhai) वापस इंग्लैंड से लौट आयी और महिलाओं की बेहतरी और गरीबो की सेवा के काम में लग गयी | इसलिए  उन्होंने एक स्कूल भी खोला | इसके बाद उन्होंने मजदूर आन्दोलन में हिस्सा लेने का निश्चय किया जब उन्होंने देखा कि मिल में काम करने वाली महिलाये 36 घंटो की शिफ्ट के बाद घर लौट रही थी | उन्होंने महिलाओ से इस बारे में बात की तो उन्होंने अपना दर्द मोटाबेन को सुनाया | तब उन्होंने निश्चय किया कि इस स्थिति को जल्द ही बदलने की आवश्यकता है |

    1914 में अहमदाबाद में प्लेग का हमला हो गया और मजदूरों का आक्रोश बढ़ता जा रहा था | अच्छा वेतन और सुविधाए उनकी वाजिब मांगे थी मोटाबेन साराभाई इस आन्दोलन में कूद पड़ी और 1914 में उन्होंने टेक्सटाइल मजदूरों की सहायता से अहमदाबाद में हड़ताल शुरू कर ली | 21 दिनों तक हडताल चलती थी और अन्तं में मिल मालिको को झुकना पड़ा | इसके तुंरत बाद खेड़ा सत्याग्रह हुआ था जिसमे भी 21 दिन की ओर हड़ताल चली |

    गांधीजी के आश्रम में उन्होंने निस्वार्थ सेवा करते हुए इंटे और रेत उठाने का काम भी किया था | 1918 में तो उन्होंने एक महीने लम्बी हड़ताल की थी जब बुनकरों को  केवल 20 प्रतिशत मजदूरी ही दी जा रही थी जबकि 50 प्रतिशत मजदूरी दी जानी थी | गांधीजी साराभाई के प्रेरणा स्त्रोत थे | गांधीजी ने मजदूरों की तरफ से भूख हड़ताल शुरू कर दी जिसकी वजह से मजदूरों को 35 प्रतिशत भुगतान दिया जाने लगा | इसके बाद 1920 में अनुसूया ने मजदूर महाजन संघ (Ahmedabad Textile Labour Association) की स्थापना की |

    अंतिम दिन एवं मृत्यु | Last Days of Anasuya Sarabhai

    अनुसूया साराभाई (Anasuya Sarabhai) को गुजराती भाषा में मोटाबेन कहकर पुकारते थे जिसका अर्थ था बड़ी बहन | 1972 में अनुसूया साराभाई का देहांत हो गया | अनुसूया साराभाई (Anasuya Sarabhai) के 132 वे जन्मदिवस पर गूगल डूडल बनाकर उनको श्रुधांजलि दी है | गुजरात के संग्रहालय में आज भी उनके दुर्लभ चित्र मौजूद है जो उनकी करीबी सहयोगी एला भट्ट ने बनवाया है जो आज भी उनके पदचिन्हों पर चलते हुए मजदूरों के हक के लिए काम कर रही है और Self-Employed Women’s Association of India (SEWA) की  संस्थापक है |

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