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    Aurobindo Ghosh Biography in Hindi | अरविन्द घोष की जीवनी

    Aurobindo Ghosh Biography in Hindi
    Aurobindo Ghosh Biography in Hindi
    Aurobindo Ghosh Biography in Hindi

    इस भारत भूमि में अनेक योगी-महात्माओं ने समय समय पर जन्म लिया है | स्वामी दयानन्द , रामकृष्ण परमहंस , स्वामी विवेकानंद इत्यादि के नाम आप में से बहुतो ने सुने होंगे | अरविन्द घोष (Aurobindo Ghosh) भी एक महान योगी और संत थे अपने ढंग के बिल्कुल ही निराले संत | उनका जन्म 15 अगस्त 1872 को बंगाल के एक सम्पन्न परिवार में हुआ था | उनके पिता का नाम डॉक्टर कृष्णधन घोष और माता का नाम श्रीमती स्वर्णलता देवी था | डॉक्टर कृष्णधन सिविल सर्जन थे और पुरी तरह पश्चिमी सभ्यता में रंग गये थे | वैसा ही वह अपने बच्चो को बनाना चाहते थे | अरविन्द से बड़े उनके दो ओर पुत्र थे |

    अरविन्द (Aurobindo Ghosh) बचपन से ही बड़े कुशाग्र बुद्धि और चंचल थे | उन्हें देखकर लोग बरबस उनकी ओर आकर्षित हो उठते थे | “होनहार बिरवान के होत चिकने पात” वाली कहावत उन पर पुरी तरह लागू होती थी | जब वह पांच वर्ष के थे तभी उन्हें पढने के लिए दार्जीलिंग के एक अंग्रेजी स्कूल में भेजा गया | उनके साथ उनके दो बड़े भाई भी थे | इन तीनो भाइयो के अतिरिक्त वहां सभी अंग्रेजो के बच्चे पढ़ते थे | चूँकि अरविन्द बड़े हाजिर जवाब थे इसलिए उनके अध्यापक उनसे बहुत प्रसन्न रहते थे |

    सात वर्ष की छोटी अवस्था में अरविन्द (Aurobindo Ghosh )अपने माता-पिता के साथ इंग्लैंड गये | वहां एक सम्पन्न और सभ्य अंग्रेजी परिवार में उन्हें ओर उनके दोनों भाइयो की शिक्षा ग्रहण करने के लिए छोड़ दिया | इस परिवार में द्युत दम्पति के संरक्षण में अरविन्द ने लैटिन भाषा में काफी अच्छी योग्यता प्राप्त कर ली पर अचानक डुएट परिवार को इंग्लैंड के बाहर जाना पड़ा और तीनो भाइयो को लन्दन के सेंट पॉल स्कूल में भर्ती कर दिया गया | अरविन्द की स्मरण शक्ति बचपन से ही बड़ी तीव्र थी | साथ ही वह प्रत्येक बात पर बड़ी गहराई से सोचते थे | अत: शीघ्र ही वहा के मुख्याध्यापक उनसे प्रभावित हो गये और उनके पढने-लिखने में इतनी रूचि लेने लगे कि कुछ ही समय में वह ऊँची कक्षाओं में जा पहुचे | ग्रीक और लैटिन का उन्होंने बहुत ही अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया | स्कूल में विद्याअध्ययन करते समय अरविन्द ने अंग्रेजी काव्य और फ्रांसीसी साहित्य भी खूब पढ़ा |

    स्कूल की पढाई खत्म करके अरविन्द कॉलेज पहुचे | वहा किंग्स कॉलेज में उन्होंने ग्रीक और लैटिन में असाधारण योग्यता दिखाकर अनेक पुरुस्कार प्राप्त किये | वह स्वयं भी अंग्रेजी में अच्छी कविता करते थे | 18 वर्ष की आयु में वह ICS की परीक्षा में बैठे | इस परीक्षा में उन्होंने ग्रीक और लैटिन में सबसे अधिक नम्बर लाये और बड़े सम्मान के साथ पास हुए परन्तु घुड़सवारी में पीछे रह गये | इस तरह वह ICS में न आ सके | पर एक तरह से यह अच्छा ही हुआ क्योंकि ICS से बाहर रहते हुए उन्होंने जितने महान कार्य किये उतने शायद ICS में आने के बाद न कर पाते |

    इंग्लैंड में ही अरविन्द (Aurobindo Ghosh) की भेंट बडौदा नरेश से हुयी और उन्होंने उन्हें अपना प्राइवेट सेकेट्री बना लिया | तदुपरांत इंग्लैंड में पुरे 14 वर्ष बिताने के बाद एकदम विलायती आचार-विचार में रंगे हुए अरविन्द भाइयो के साथ भारत लौटे | पर जब ये लोग रास्ते में ही थे | तब उनके पिता को यह समाचार मिला कि जिस जहाज में तीनो भाई आ रहे थे वह डूब गया | इस दुखद समाचार को डॉक्टर कृष्णधन बर्दाश न कर सके तत्काल ही उनका निधन हो गया |

    बडौदा नरेश के यहाँ कुछ समय काम करने के पश्चात अरविन्द ने अनुभव किया कि उन जैसा स्वतंत्र विचार वाला व्यक्ति राजा-महाराजाओं की नौकरी के लिए सर्वथा अनुपयुक्त है अत: उक्त नौकरी को छोडकर वह बडौदा कॉलेज में प्रोफेसर हो गये | फिर कुछ ही समय बड़ा वह उक्त कॉलेज के वाईस प्रिंसिपल बना दिए गये | उनके विद्यार्थी उनसे इतना प्रेम करते थे कि उसका वर्णन नही किया जा सकता | अरविन्द की विद्वता और सरल व्यवहार की प्रशंशा करते वह अघाते नही थे | वह सचुमुच अपने विधार्थियों के आदर्श बन गये थे |

    अपने देश लौटने के बाद अरविन्द के मन में भारतीयता की भावना जागी | उन्होंने भारतीय भाषाए सीखना आरम्भ किया और शीघ्र ही बंगला ,संस्कृत ,गुजराती मराठी आदि भाषाओं के अच्छे ज्ञाता बन गये | सिर्फ यही नही , भारतीय साहित्य और दर्शन पढकर वह पक्के सनातनी भी हो गये | मृणालिनी जी के साथ उनका विवाह भी सनातनी विधि से हुआ | विवाह के पश्चात कुछ वर्ष अरविन्द अपने छोटे से परिवार में सुखपूर्वक रहे पर भारतीय साहित्य के गहन अध्ययन के कारण शीघ्र ही उनका मन योग की ओर खींचने लगा | वह योगाभ्यास करने लगे |

    कुछ समय बाद उन्होंने बडौदा कॉलेज की नौकरी छोड़ दी और कलकत्ता के नेशनल कॉलेज के प्रिंसिपल हो गये | उनके जीवन का नियम था सादा जीवन और उच्च विचार | उन्होंने रामकृष्ण और विवेकानंद की लगभग सभी पुस्तके पढ़ी और उन पर गम्भीरतापूर्वक मनन किया | इन पूस्तको का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा | भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में भी अरविन्द (Aurobindo Ghosh) ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की | वह कहा करते थे कि पहले पूर्ण रूप से भारतीय बनो क्योंकि राष्ट्रीयता अमर है | संयोग से उनके जन्म जन्म दिवस 15 अगस्त को ही भारत की स्वतंत्रता प्राप्त हुयी |

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    Bal Gangadhar Tilak Biography in Hindi | बाल गंगाधर तिलक की जीवनी

    Bal Gangadhar Tilak Biography in Hindi
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    बाल गंगाधर तिलक (Bal Gangadhar Tilak) का जन्म 23 जुलाई 1856 ई. को महाराष्ट्र के पश्चिमी किनारे पर स्थित रत्नागिरी में हुआ था | उनके पिता संस्कृत के पंडित थे और माता तपस्विनी थी | पुत्र के लिए तिलक जी की माता ने सूर्य भगवान की पूजा की थी | तिलक का जन्म का नाम था केशव पर प्यार से उन्हें सब बाल कहते थे | आगे चलकर उनका यही नाम प्रसिद्ध हुआ | बचपन में स्कूल में ही उनकी प्रखर बुद्धिमता फलक उठी | उनके पिता ने उन्हें संस्कृत पढाई | तिलक को गणित विषय भी प्रिय था |

    कक्षा के अध्यापक सवाल हल करने को देते तो वे उसे कागज पर न लिखकर जबानी ही उत्तर देते थे | परीक्षा में भी कठिन सवाल ही हल करते थे बाकि वैसे भी छोड़ देते थे | सवाल करने की इस अजीब पद्धति के कारण के शिक्षक से उनका झगड़ा भी हो गया | सारे अध्यापक उन्हें तेज और बुद्धिमान विद्यार्थी मानते थे | कॉलेज के प्रथम वर्ष में उन्होंने अपना स्वास्थ्य सुधारने का बीड़ा उठाया | कॉलेज की पढाई की ओर उदासीन होकर उन्होंने अपना व्यायाम और तैरने का शौक पूरा किया | वहां भी सबको उनके स्वभाव का परिचय मिला | किसी भी विषय का अभ्यास करने की तिलक की पद्धति अनोखी थी | जिस विषय का अभ्यास करना होता , उसका वह हर दृष्टिकोण से हर पहलू से सर्वागीण विकास करते थे |

    वकालत पढ़ते समय कॉलेज में भोपाल गणेश आगरकर नामक एक युवक से उनकी मित्रता हो गयी | केवल किताबी पढाई से ही नही देश की स्तिथि पर रात-दिन विचार करने में इन दोनों मित्रो का समय कटता था | देश की स्थिति सुधारने के लिए क्या क्या करना चाहिए , इस विषय पर दोनों में वाद विवाद होता रहता था | वे अनुभव करते थे कि देश की स्तिथि में परिवर्तन लाना हो तो देश के लिए जीवन होम करने वाले लोग चाहिए | दोनों ने सरकारी नौकरी न कर देशसेवा करने की प्रतिज्ञा की | आगरकर बहुत गरीब थे | उनकी माँ आस लगाये बैठी थी कि बेटे की शिक्षा पुरी होगी और वह नौकरी करने लगेगा | तिलक के आत्मीय भी उनके वकील या न्यायाधीश बनने की आशा करते थे किन्तु दोनों ने देशसेवा का मार्ग अपनाया |

    उस जमाने में सुशिक्षित लोगो को सरकारी नौकरी की लालच होती थी और कई लोग तो केवल इसी लालच में शिक्षा ग्रहण करते थे किन्तु तिलक और आगरकर ने अपनी शिक्षा का उपयोग समाज सुधार के लिए करने का निश्चय किया | इसी समय पूना के सामाजिक कायकर्ता न्यायमूर्ति रानाडे की सरकारी नौकरी छोडकर शिक्षण के लिए पूना आते हुए विष्णु शास्त्री चिपलूनकर से पहचान हो गयी | तिलक ,चिपलूनकर और आगरकर तीनो ने पूना में पहले एक स्कूल ,फिर एक कॉलेज शुरू किया | इससे भी शिक्षा को नई दिशा मिली | फिर उन्हें लगा , लोक शिक्षण के लिए एक अखबार भी निकालना चाहिए अत: उन्होंने मराठी में केसरी और अंग्रेजी में मराठा दो साप्ताहिक शुरू किये | इन दो पत्रों ने जनता की शिकायते प्रकट करना शुरू किया |

    इस तरह तिलक (Bal Gangadhar Tilak) के सार्वजनिक जीवन का आरम्भ हुआ | अखबार शुरू होने पर उन्हें अनेक विषयों पर लिखना पड़ा | तिलक की कलम बड़ी तेज थी | एक बार उन्होंने एक प्रकरण पर कड़ी आलोचना की | तब उन्हें और आगरकर को 101 दिन के कारावास की सजा मिली | कारावास के समय भी वह देश के संबध में ही सोचा करते थे | वाद-विवाद के जोश में वह इतने जोर से बोला करते थे कि पहरेदार को बार-बार धीरे बोलने के लिए कहना पड़ता |

    तिलक (Bal Gangadhar Tilak) कुछ समय तक प्राध्यापक भी रहे थे | गणित और संस्कृत बहुत ही अच्छी तरह से पढाते थे | तिलक और आगरकर ने प्राध्यापक का काम केवल 40 रूपये वेतन पर किया किन्तु तिलक शिक्षा के क्षेत्र में काम करने से संतुष्ट नही थे | उन्हें लगता था कि सारा राष्ट्र जाग उठे , ऐसा कुछ करना चाहिए वस्तुत: तिलक की तमन्ना गणित का प्राध्यापक बनने की थी | दिन-रात पढने-लिखने के इच्छुक रहते किन्तु देश में होने वाले अत्याचारों को वह सहन नही कर पा रहे थे | महाराष्ट्र में वासुदेव बलवंत फडके ने अंग्रेजो के विरुद्ध विद्रोह किया | कुछ समय तक तिलक ने इस महान क्रांतिकारी की निगरानी में शस्त्राभ्यास किया किन्तु समस्त देश को साथ लेकर कार्य करने का मार्ग खोज रहे थे |

    इसी समय महाराष्ट्र में अकाल पड़ा | तिलक (Bal Gangadhar Tilak) ने अपने पत्र में जनता की शिकायते जाहिर की | असंतोष के बीज बोने के लिए यह अच्छा अवसर था अत: तिलक ने कृषको की ओर से आन्दोलन शुरू किया , लेख लिखे अर्जिया भेजी | उन्होंने अपने युवा साथियो को सारे महाराष्ट्र में गाँव-गाँव प्रचार के लिए भेजा | उन्होंने लोगो से कहना शुरू किया कि सरकारी अधिकारियों के साथ निडरता से बर्ताव करे | उन्होंने प्रचार जारी किया “कानून का राज्य है डंडेशाही नही” इस आन्दोलन से कृषक समाज तिलक के पीछे खड़ा हो गया |

    बहुत से युवक इनके अनुगामी बने | तिलक और उनके पत्र केसरी ने सरकार को भी प्रभावित किया | लगभग उसी समय महाराष्ट्र में प्लेग की बीमारी आयी | उस समय भी तिलक ने जनता का पक्ष ग्रहण किया | सरकारी अस्पताल या रोगियों के शिविरों की अव्यस्स्था थी कुप्रबंध था | इस पर तिलक ने कड़ी आलोचना की | गाँव के गाँव प्लेग के कारण उजड़ गये किन्तु तिलक गाँवों में ही डटे रहे | खुद घूम घूमकर वह रोगियों की हालत देखा करते | इस प्लेग ने उनके पुत्र की बलि ली किन्तु तिलक का हृदय अडिग रहा | उस दिन उन्होंने शांत चित से केसरी का अग्रलेख लिखा |

    पूना में प्लेग के लिए नियुक्त सरकारी अधिकारी बड़ा ही उन्मत्त और अत्याचारी था | लोग उससे चिढ़े हुए थे | भीतर ही भीतर ज्वालामुखी सुलग रहा था | आखिर विस्फोट होकर उस अधिकारी का खून हो गया | तब पुन में पुलिस के अत्याचार आरम्भ हुए | इन जुल्मो पर कड़ा लेख लिख कर “सरकार का दिमाग तो ठिकाने है ?” ऐसा प्रश्न तिलक ने पूछा | इस लेख पर और पहले दिए हुए भाषणों के आधार पर सरकार मुकदमा चलायेगी , यह तो तिलक जानते ही थे | वैसा हुआ भी |

    1917 में पुलिस ने राजद्रोह में तिलक (Bal Gangadhar Tilak) को पहली बार गिरफ्तार किया | उन्हें जमानत पर छोड़ने को सरकार तैयार है या नही , यह जानने के लिए उन्होंने अपने मित्र को अधिकारियों के पास भेजा | अधिकारियों से मिलकर उनके मित्र यह बताने के लिए कि उनकी जमानत देने से इंकार कर दिया गया है उनसे मिलने गये | तब तिलक सो गये थे | उन्होंने मित्र से कहा “मुझे तो आशा थी ही नही और मेरा सोने का समय हो गया था अत: सो गया” कितना मनोधैर्य था उनमे | मुकदमे का फैसला हुआ | ढाई साल के श्रमसहित कारावास की सजा मिली | उन्हें राजबंदी नही माना गया | रस्सी आदि साफ़ करने का काम उन्हें दिया गया |

    कारागृह का अन्न बड़ा ही खराब होता था | तिलक के कष्ट को देखकर पहरेदार दुखी हुआ | वह अपने घर से गरी , बादाम आदि पौष्टिक पदार्थ लाकर चोरी से उनके कोठरी में डाला करता था | तिलक के मना करने पर भी उसने अपना हठ नही छोड़ा | जेल से छुटते समय तिलक ने उसे घर आकर मिलने को कहा | उस समय तिलक के प्रति सर्वत्र कितना भक्तिभाव बढने लगा था इसका यह छोटा सा उदाहरण है | तिलक इस कारवास से ओर अधिक लोकप्रिय होकर बाहर आये | भारत में तिलक की कीर्ति फ़ैल चुकी थी | लोग आशा से उनके नेतृत्व की ओर आँखे लगाये हुए थे |

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    Jamshedji Tata Biography in Hindi | जमशेदजी नौशेरवांजी टाटा की जीवनी

    Jamshedji Tata Biography in Hindi
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    Jamshedji Tata Biography in Hindi

    आज हमारे देश में बड़े से बड़े कारखाने दिखाई देते है पर आज से सौ साल पहले हमारे देश में कारखाने नही थे | जमशेदजी नौशेरवांजी टाटा (Jamshedji Tata) भारत के उन गिने-चुने लोगो में से थे जिन्होंने यहाँ कारखाने खोले | उनका जन्म 03 मार्च 1839 को बम्बई के नवसारी में एक पारसी कुटुंब में हुआ था | उनके पुरखे पुरोहिती करते थे पर जमशेदजी के पिता नौशेरवांजी का मन पुरोहिती करने में नही लगा और वे व्यापार करने लगे |

    जमशेदजी (Jamshedji Tata) की पढाई-लिखाई का अच्छा इंतजाम किया गया | 19 वर्ष की आयु में उन्होंने बम्बई के elphinston कॉलेज की पढाई समाप्त की फिर वह अपने पिता के साथ मिलकर व्यापार करने लगे | जमशेदजी  के पिताजी चीन के साथ अफीम और कपास का व्यापार करते थे | उनकी कोठी की दो शाखाए चीन के हांगकांग और शंघाई शहरों में थी | वह इन दोनों शहरों में गये और वहां उन्होंने खूब अनुभव प्राप्त किया |

    उनके पिता (Jamshedji Tata) ने जमशेदजी को लन्दन भेजा कि वह भे कोठी की एक शाखा खोले तथा व्यापार विषयक में नया अनुभव प्राप्त करे परन्तु उनके बैंक की हालत बहुत बिगड़ गयी और जमशेदजी बड़ी मुसीबत में पड़ गये | इस समय उन्होंने बड़ी सूझ-बुझ और ईमानदारी से काम लिया जिसका उनके बैंकों और महाजनों पर बड़ा अच्छा असर पड़ा | वहा अपनी ही कोठी में ऋण दिलाने वाले अफसर तैनात किये गये |

    विलायत से लौटकर उन्होंने अलेक्सेंद्रा नाम की कपड़े की मिल खोली | दो साल बाद उन्होंने अच्छा मुनाफा पाकर अलेक्सेंद्रा मिल को बेच दिया | दुबारा लंकाशायर जाकर सब बातो की जानकारी प्राप्त हो जाने के बाद उन्हें इस बात का पक्का भरोसा हो गया कि हिन्दुस्तान में भी सूती कपड़े के कारखाने खोले जा सकते है | उस समय हमारे देश में सूती कपड़े के केवल पन्द्रह कारखाने थे और प्राय: सब के सब बंबई या उसके आसपास ही थे | उनकी मशीने पुरानी थी और मजदूर आदि अपने काम में चतुर न थे | जमशेदजी ने निश्चय किया कि वे एक आदर्श कारखाना खोलेंगे |

    घुमने के बाद उन्हें मालुम हुआ कि मध्य प्रांत की राजधानी नागपुर ऐसा शहर है जहा कारखाना खोला जा सकता है | नागपुर कपास पैदा करने वाले भाग में है | वहां कपास आसानी से मिल सकती थी पर नागपुर की जलवायु गर्म और साल के आठ महीने सुखी रहती है | सुखी जलवायु में कपास से सूत अच्छा और लम्बा नही कतता | पर टाटा ने इस बात का उपाय पहले ही सोच लिया था | उन्होंने एयर कंडीशनर से मिल के अंदर की हवा नमी वाली करवा दी | अम्प्रेस मिल में उन्होंने नये नये प्रयोग किये और उन्हें सफलता भी मिली | नागपुर में खोलने के बाद उन्होंने बम्बई में स्वदेशी मिले और अहमदाबाद में एडवांस मिल नाम से कपड़े के कारखाने खोले | इन कारखानों की मशीने , मजदूरी और इंतजाम दुसरे कारखानों से अच्छा था | इसका नतीजा यह हुआ कि कारखानों की उन्नति के साथ साथ टाटा का धन भी बढ़ता गया |

    जमशेदजी (Jamshedji Tata) अपने देश में हर चीज के कारखाने देखना चाहते थे ताकि हर चीज यही तैयार हो सके | हिंदुस्तान में कोई चीज बाहर से आये , उन्हें पसंद नही था | इंग्लैंड की यात्राये करने के बाद वह इन तीन नतीजो पर पहुचे थे |

    1. यदि किसी देश में लोहा और इस्पात बनाने के कारखाने नही है तो वह देश कभी भी कल-कारखानों में तथा सामान बनाने में बड़ा नही हो सकता |
    2. विज्ञान और तकनीकी शिक्षा के बगैर कोई भी देश धनवान नही हो सकता |
    3. बंबई शहर हिन्दुस्तान के उद्योग की नाड़ी है वह तब तक नही बढ़ सकता जब तक बम्बई में बिजली की सहूलियत न हो और कल-कारखानों को सस्ती बिजली न मिले |

    टाटा (Jamshedji Tata) में इन तीनो बातो के लिए दौड़-धुप शुरू की | वह हिन्दुस्तान में लोहा और इस्पात का कारखाना खोलने के लिए जगह की तलाश करने लगे | जहा लोहा और कोयला पास-पास मिले , उसी जगह लोहा और इस्पात का कारखाना खुल सकता है | बहुत घुमने के बाद उन्हें बिहार के जंगलो में साकची नामक गाँव मिला | उस गाँव के पास लोहे की खाने थी और वहां झरिया की खानों से आसानी से कोयला आ सकता था | टाटा ने साकची में कारखाना खोलने की योजना बनाई पर उसके पहले ही 13 मई 1904 को उनका स्वर्गवास हो गया था |

    उनके बाद उनके लडको ने भारतीय पूंजीपतियों से रूपये लगाने को कहा | 1907 में टाटा आयरन एंड स्टील कम्पनी खुली और 1914 में इस कम्पनी के कारखानों में इस्पात बनने लगा | प्रथम महायुद्ध के समय इस कारखाने की बड़ी तरक्की हुयी | छोटा सा जंगली गाँव साकची इस कारखाने के खुलने से एक बड़ा शहर हो गया | उसका नाम जमशेदजी के नाम पर जमशेदपुर पड़ा | जमशेदपुर का लोहे अक कारखाना इस समय भी भारत के बड़े लोहे के कारखानों में से एक है | वहां रेल की पटरिया , स्लीपर , लोहे की चादरे , रेल की लाइनों को जोड़ने वाले पहिये , रेल के पुर्जे , छुरी आदि जैसी चीजे खेती के काम में आने वाले औजार और तार , कीले ,मशीनों के पुर्जे  आदि न जाने कितनी छोटी-बड़ी चीजे तैयार की जाती है | जमशेदजी में एक टेक्निकल विद्यालय भी है |

    टाटा कम्पनी का ध्यान पानी से पैदा होने वाली बिजली की तरफ भी गया था | जमशेदजेई (Jamshedji Tata) की मृत्यु के सात साल बाल लोनावाला में बिजली की कारखाने की नींव पड़ी | लोनावाला बिजली केंद्र से बम्बई , पूना आदि शहरों में बिजली आती है रोशनी होती है और कारखाने चलते है | अब तो टाटा के द्वारा खोले हुए कारखाने खूब तरक्की पर है इन कारखानों से बहुत अधिक फायदा हुआ और नये नये कारखाने खोले गये | टाटा कम्पनी आज हमारे देश की सबसे बड़ी औद्योगिक कम्पनी है | उसके पास लोहा ,स्टील , तेल ,साबुन , बनस्पति घी आदि से लेकर रंग आदि रासायनिक पदार्थ बनाने के भी कारखाने है | उसके बैंक और बीमा कम्पनियां भी है |

    टाटा ने केवल कारखाने बढाने का ही काम नही किया | कारखानों के चलाने के लिए कारीगर ,इंजिनियर आदि की शिक्षा के लिए उन्होंने टेक्निकल विद्यालयों को खोलने की भी योजना बनाई पर उनकी योजनाये बाद में पुरी हुयी | उनकी मृत्यु के सात साल बाद ही बंगलौर में इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस नाम के विद्यालय की स्थापना हुयी | इसके लिए टाटा ने हजारो रूपये खर्च किये | यह विद्यालय केवल हिन्दुस्तान में ही नही बल्कि सारे एशिया में अपने ढंग का एक ही है | विज्ञान में ऊँची से ऊँची शिक्षा इस विद्यालय में दी जाती है | इस विद्यालय में वे विद्यार्थी भर्ती हो सकते है  जो किसी दुसरे विश्वविद्यालय में एम.एस.सी.  की परीक्षा अच्छे अंको से पास कर चुके हो और उन में विज्ञान के प्रति विशेष रूचि हो |

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    Ramakrishna Paramahansa Biography in Hindi | रामकृष्ण परमहंस की जीवनी

    Ramakrishna Paramahansa Biography in Hindi
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    हुगली जिले के कामारपुर नामक छोटे से गाँव में खुदीराम चट्टोपाध्याय नाम के गरीब ब्राह्मण रहते थे | उनकी पत्नी चन्द्रमणि भी पति के समान ही सरल स्वभाव वाली थी और भगवान की पूजा किया करती थी | इन्ही के घर 17 फरवरी 1836 ई. को भी श्री रामकृष्ण परमहंस (Ramakrishna Paramahansa) का जन्म हुआ | उनका असली नाम था गदाधर | रामकृष्ण नाम तो सन्यास लेने के बाद पड़ा | पिता चाहते थे कि पुत्र उन्ही के समान ईश्वर-भक्त और धार्मिक बने इसलिए वह उसे रामायण और महाभारत की कहानियाँ सुनाया करते थे |

    गदाधर अत्यंत कुशाग्रबुद्धि बालक था इसलिए पिता ने उसे पाठशाळा में भर्ती करा दिया | पाठशाळा जाकर बालक ओर भी अधिक फुर्तीला हो गया | गदाधर बंगला आसानी से पढ़-लिख लेता था लेकिन गणित उसकी समझ से बाहर थी | उसके मीठे स्वभाव के कारण अध्यापक उससे बहुत प्रसन्न रहते और उसे खूब प्यार करते थे | गदाधर का कंठ बड़ा मधुर था और बड़े सुरीले स्वर से कृष्णलीला के गीत गाया करते थे | वह सदैव प्रसन्न रहता और अपनी मीठी मीठी बातो से सबको खुश रखता था | बचपन से ही गदाधर की धर्म एम् रूचि थी |

    गदाधर की भक्ति भावना धीरे धीरे बढती जा रही थी | जब वह रामलीला और कृष्णलीला में अभिनय करता तो भक्तिभाव में इतना लीन हो जाता कि अपने तन-बदन की सुध भूल जाता | कुछ दिन बीत जाने पर गदाधर के यज्ञोपवीत का समय आ गया | उसके गाँव में एक धनी शुद्र ने गदाधर से प्रतिज्ञा करा ली कि वह यज्ञोपवीत के समय सबसे पहले उसी क दान ग्रहण करेगा | ययज्ञोपवीत से दो-एक दिन पहले जब यह बात गदाधर ने अपने बड़े भाई राजकुमार को बतलाई तो वह बड़े परेशान हुए | ब्राह्मण का लड़का भला शुद्र का दान कैसे ले सकता है ? उन्होंने गदाधर को बहुतेरा समझाया परन्तु वह किसी प्रकार अपनी प्रतिज्ञा तोड़ने को तैयार नही हुआ | आखिर रामकुमार को उसकी बात माननी ही पड़ी |

    कुछ दिनों के बाद घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ जाने पर रामकुमार कलकत्ता चले आये | कलकत्ते के जान बाजार में रानी रासमणि जमींदारी का काम सम्भालती थी | उन्होंने कलकत्ते के दक्षिणेश्वर नामक स्थान पर गंगा के किनारे भारी मन्दिर बनवाया | रानी का जन्म केवट जाति में हुआ था इसलिए कोई भी ब्राह्मण उनके मन्दिर की पूजा स्वीकार करना नही चाहता था | अंत में राजकुमार ने मन्दिर की पूजा का उत्तरदायित्व सम्भाला और अपने छोटे भाई गदाधर को भी अपने पास बुला लिया | मन्दिर की देखभाल रानी के दामाद बाबू मथुरा विश्वास किया करते थे | गदाधर की सरलता और स्वभाव से विश्वास बाबू अत्यंत प्रसन्न थे अत:उन्होंने माँ काली की सुरक्षा का भर उसको सौंप दिया |

    अपने बड़े भाई की मुत्यु के पश्चात गदाधर को ही मन्दिर का पुजारी बना दिया गया | इसके बाद तो उसका एकमात्र कार्य ही देव साधना रह गया | काली माँ की सारी सेवा वह अपने ही हाथ से करता | धीरे धीरे उसका यह प्रेम इतना बढ़ गया कि चिंता के कारण उसे रात रात भर जब इन नींद नही आती | पूजा करने बैठता तप पूजा खत्म न होती और आरती करता तो आरती खत्म न होती |

    कुछ दिनों के बाद गदाधर को ऐसा लगा जैसे मूर्ति की पूजा से उसे शान्ति नही मिलेगी | वह कली माँ के दर्शन करने के लिए बच्चो के समान बिलख-बिलख कर रोया करता था | पूजा करते करते कभी वह मूर्ति से बाते करता , कभी हंसता , कभी क्रोध करता और कभी माँ के चरणों को पकड़कर रोया करता | कभी प्रसाद स्वयं खा लेता और कभी कुत्ते-बिल्ली को खिला देता | रानी तो उसको देवता मानने लगी थी | जैसे हनुमान राम की सेवा किया करते थे वैसे ही अब गदाधर ने दास्य-भगवान से भगवान राम की पूजा करनी आरम्भ कर दी |

    धीरे धीरे इन सब बातो का पता उसकी माँ को चला तो उसने उसे घर बुला लिया | बहुत दिनों के बाद घर लौटने के कारण गाँव के सभी लोग गदाधर को देखने के लिए बहुत उत्सुक थे परन्तु जब उन्होंने गदाधर को पागलो जैसे काम करते देखा तो उन्होंने सोचा कि शायद गदाधर को भुत लग गया है | कुछ दिनों के बाद गदाधर का पागलपन काफी कम हो गया | उसकी माँ ने सोचा कि गदाधर की शादी करने से शायद उसका पागलपन जाता रहेगा | कामारपुर से दो कोस पर जयरामवाटी ग्राम में रहने वाले श्रीराम चन्द्र मुखोपाध्याय की लडकी शारदामणि के साथ बड़ी धूमधाम से इनका विवाह कर दिया गया | शारदामणि बाद में शारदा देवी के नाम से प्रसिद्ध हुयी |

    एक बार दक्षिणेश्वर में जब वह गंगा के किनारे बाग़ में काली की पूजा के लिए फुल तोड़ रहे थे तभी वहा गेरुआ वस्त्र पहने एक सन्यासिनी आयी | वह साक्षात भैरवी जान पड़ती थी | उन्हें ऐसा लगा जैसे उस सन्यासिनी से उनका जन्म जन्म का संबध हो | वह तुंरत मन्दिर में गये और अपने भांजे हृदयराम को उस सन्यासिनी को लाने के लिए भेजा | सन्यासिनी के पास जाकर उसने जैसे ही गदाधर का नाम लिया वह दौड़ी हुयी हृदयराम के साथ आ गयी | उसके आँखों में आनन्द के आंसू भरे हुए थे | गदाधर ने उससे पूछा “माँ तुम्हे मेरी खबर कैसी लगी ?”

    वह बोली मुझे माँ जगदम्बा ने आदेश दिया था कि मेरे तीन पुत्रो से जाकर मिलो | दो से तो मै पूर्व बंगाल में मिल चुकी थी | तुम बाकी थे | आज तुमसे भी मुलाक़ात हो गयी | यह सन्यासिनी तन्त्रशास्त्र में बहुत सिद्ध थी | गदाधर भी उससे उपदेश पाकर तंत्रों के अनुसार साधना करने लगे परन्तु इस साधना में उनका मन बहुत दिनों तक नही लगा | वह किसी ओर साधना की चिंता में रहने लगे | संसार और संसार की बातो को भूलकर वह साधना में डूब गये | सबसे पहले उन्होंने भैरवी ब्राह्मण के तरीके से तांत्रिक साधना की थी जिसकी चर्चा उपर की गयी है |

    तांत्रिक साधना का प्रभाव उन पर यह हुआ कि ईश्वर को माँ के रूप में पूजने लगे थे | फिर उन्होंने एक नागा संत तोतापुरी के बताये हुए तरीके से वैधान्तिक साधना की | तोतापुरी ने उनको सन्यास की दीक्षा भी दी | वेदान्तिक साधना का उनपर यह असर हुआ था कि वह निर्गुण और निराकार ब्रह्म की उपासना करने लगे यानि ऐसा ब्रह्म जिसका न कोई नाम और न कोई रूप | इसके बाद से उनका नाम गदाधर की जगह रामकृष्ण पड़ा | रामकृष्ण उनका सन्यास का नाम था आगे चलकर उनका यही नाम प्रसिद्ध हुआ |

    वेदान्तिक साधना से उनका दिमाग खुल गया | वह परम सत्य की प्राप्ति के लिए सब धर्मो की गहराई से छानबीन करने लगे | गोविन्द रे नाम के एक सूफी के प्रभाव में आकर उन्होंने कुरान पढ़ी | उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया और उसके अनुसार चलने लगे | इस समय हिन्दू धर्म के विचार और बाते अपने मन से निकाल दी | इस्लाम धर्म की ही तरह आगे चलकर उनका ध्यान मसीही धर्म की ओर गया | बाइबिल और ईसामसीह की कहानी ने उनको विभोर कर दिया | एक दिन उन्होंने ईसा को गोद में लिए हुए मैडोना का चित्र देखा | इसका उन पर इतना असर हुआ कि वह बराबर ईसामसीह के ध्यान में रहने लगे और सब कुछ भूल गये | कहते है कि कुछ दिन बाद उन्हें ईसामसीह के दर्शन हुए | इसी प्रकार उन्होंने कितने ही धर्मो को अपनाया था | जिस धर्म को अपनाते थे उस समय वह उसी के अनुयायी जान पड़ते थे | बौद्ध ,जैन और सिखों का भी वह बहुत सम्मान करते थे |

    हिन्दू धर्म के अनेक सम्प्रदायों की साधना करने के बाद और यहूदी , पारसी ,इस्लाम ,इसाई आदि अनेक धर्मो की जानकारी प्राप्त करने के बाद उन्होंने यह समझ लिया था कि सब धर्मो में ईश्वर एक ही है केवल उसे प्राप्त करने के रास्ते अलग अलग है | काली ,खुदा ,बुद्ध , राम ,कृष्ण ,दुर्गा सब एक ही भगवान के रूप है | यधपि अपनी माँ की इच्छा पुरी करने के लिए उन्होंने अपना विवाह कर लिया था परन्तु अपनी स्त्री को भी वह अन्य स्त्रियों के समान ही पूज्य समझते थे | विवाह के बाद वह अधिकतर अपने पिता के घर में ही रहती थी | उनकी प्रसिद्धि सुनकर वह अपने पति के पास आ गयी | रामकृष्ण ने उनका बड़ा आदर किया और कहा कि मै किसी भी स्त्री को पत्नी रूप में स्वीकार नही कर सकता | मै प्रत्येक स्त्री को माँ समझता हु अत: तुम भी मुझे जो आज्ञा दोगी मै वही करूंगा और यह कहकर वह उनके चरणों पर गिर पड़े | उनकी स्त्री पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ा और वह बहे दक्षिणेश्वर के मन्दिर में रहकर ईश्वर का भजन-पूजन करने लगी |

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    P. T. Usha Biography in Hindi | उड़नपरी पी.टी.उषा की जीवनी

    P. T. Usha Biography in Hindi
    P. T. Usha Biography in Hindi
    P. T. Usha Biography in Hindi

    पी.टी.उषा (P. T. Usha) भारत में ट्रैक क्वीन , एशिया की स्प्रिंट , उड़नपरी , गोल्डनगर्ल आदि नामो से जानी जाती है | पी.टी.उषा केरल में प्योली नामक गाँव में 20 मई 1964 में जन्मी थी | कई सम्मान एवं उपाधियाँ इनके नाम है | सियोल में हुए 10वे एशियाई खेलो में उन्होंने जो सफलता प्राप्त के है या फिर प्रतिष्टा के जिस शिखर पर पहुची है उस पर प्रत्येक भारतवासी गर्व महसूस कर सकते है | एक साथ चार स्वर्ण पदक और एक रजत पदक जीतना अपने आप में गौरवपूर्ण उपलब्धी मानी जा सकती है |

    इस बात को नकारा नही जा सकता है कि सियोल में सारी सफलता पी.टी.उषा (P. T. Usha) तक ही सिमीत रही | 200 मी , 400मी , 400 मी.पगबाधा  और 1600 , 4500 मीटर रिले में स्वर्ण पदक जीतने वाली यह खिलाड़ी 100 मीटर में केवल रजत पदक ही प्राप्त कर सकी तथा एशिया की सबसे तेज धावक का गौरव प्राप्त नही कर सकी | यह गौरव मिला फिलिपिनी सुन्दरी लीडिया दिवेगो को |

    यह कहना गलत नही होगा कि बड़े कार्यो के लिए किसी प्रकार की उम्र एवं सीमा निर्धारित नही की गयी है | पी.टी.उषा अभ्यास के लिए पोलपट्टम के समुद्री किनारों पे मीलो दौड़ा करती थी | सन 1978 ई. में किलवान में हुयी अंतर्राष्ट्रीय एथेलेटिक प्रतियोगिता में 14 साल की इस बालिका ने 100 मीटर दौड़ को 13.1 सैकैंड में पूरा किया ,बस उसके बाद तो प्रदर्शन में निरंतर सुधार और निखार ही आता गया | वे एक एक पायदान उपर चढने लगी | इसी बीच कन्नूर स्पोर्ट्स स्कूल में वैज्ञानिक ढंग से प्रशिक्षण प्राप्त हुआ और फिर ओ.एम्.नमबियार जैसे प्रशिक्षक से प्रशिक्षण प्राप्त कने का सुख |

    ऐसा माना जाता है कुछ रत्न ऐसे होते है जिन्हें परखने के लिए जौहरी की आवश्यकता नही होती है पी.टी.उषा इसी प्रकार की रत्न थी | उन्होंने 11वे बीजिंग एशियाई खेलो में 3 रजत पदक 400 मी. 4×100 मी तथा 4×400 मी. में जीता | हिरोशिमा एशियाई खेलो में इन्होने एक रजत पदक 4×400 मी. जीता | पी.टी.उषा ने चार एशियाई खेलो में 1982 , 1986 , 1990 तथा 1994 में 11 पदक – 4 स्वर्ण और 7 रजत पदक प्राप्त किये है | उन्होंने एशियाई खेलो में सबसे अधिक स्वर्ण पदक जीतकर भारत का मान पुरी दुनिया में बढाया है |

    सन 1984 ई .में ओसे एंजेल्स में आयोजित ओलम्पिक खेलो में भारत का नेतृत्व पी.टी.उषा द्वारा ही किया गया | वे केवल कस्य पदक से बहुत नजदीकी फासले से पिछड़ गयी | पी.टी.उषा प्रथम भारतीय महिला एथीलीट बनी जिसने ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई किया | वह भारतीय महिला रिले टीम की सदस्य रही एवं 4×400 मी. रिले में सातवा स्थान लोस एंजेल्स में प्राप्त किया | उन्हें सर्वश्रेष्ठ रेलवे एथीलेट घोषित किया गया |

    पी.टी.उषा (P. T. Usha) ने 17 पदक प्राप्त किये है जिनमे से 13 स्वर्ण , 3 रजत पदक , 200 मी  में एशियाई ट्रैक एंड फील्ड मीट , 1983 ई में कुवैत में प्राप्त किया | छठी एशियाई ट्रैक एंड फील्ड मीट 1985 ई. जकार्ता में उन्होंने 5 रजत पदक प्राप्त किये तथा 1 कांस्य पदक भी जीता | इसके बाद उन्हें एशिया की उडन प्री की उपाधि से सम्मानित किया गया | उनके द्वारा सन 1980 , 1984 , 1988 और 1996 में भारत का नेतृत्व किया गया |

    सियो ओलम्पिक 1988 ,इ उनका प्रदर्शन बिलकुल भी अच्छा नही रहा | उनके पाँव में चोट थी और वे सही तरह से चोटिल पैर का इस्तेमाल नही कर पाती थी | बीमार होने की वजह से खेल में हिस्सा लेने की जगह से उनका काफी विरोध किया गया | सन 1995 में उनका चयन वर्ल्ड कप केनबरा के लिए एशियाई टीम के कप्तान के रूप में किया गया | वे भारतीय महिला एथीलीट 4×400 मी. रिले टीम की सदस्या रही जिसने रजत पदक 12वी एशियाइ खेलो में हिरोशिमा , जापान में 1994 ई , में प्राप्त किया |

    उन्होंने अपने अंतिम खेल के वर्षो में 200 मी. की स्पर्धा में कांस्य पदक 1995 ई .इ मद्रास में प्राप्त किया | 1996 ई.में फैडरेशन कप एथीलीटक्स चैंपियनशिप में उन्होंने 3 स्वर्ण पदक , 100 मी.  में तथा 4000 मी. में अपनी झोली में डाले | इससे उन्होंने यह सिद्ध किया कि 34 वर्ष की अवस्था में भी वे स्वस्थ एवं चुस्त-दुरुस्त अहि और उनमे अभी भी दमखम बचा हुआ है | भारत सरकार ने पी.टी.उषा को 1983 ई. में अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया | तत्पश्चात सन 1985 ई. में उन्हें पद्मश्री अवार्ड से नवाजा गया एवं सर्वश्रेष्ठ रेलवे स्पोर्ट्स पर्सन वर्ष 1985-86 ई. तथा 1986-87 ई. में चुना गया |

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    प्रेरक प्रसंग – अनूठा धैर्य

    संत सुकरात के घर सवेरे से शाम तक सत्संग के लिए आने वालो का ताँता लगने लगा | सुकरात की पत्नी कर्कश स्वभाव की थी | वह सोचती थी कि निठल्ले लोग बेकार ही उसके घर अड्डा जमाए रखते है | वह समय समय पर उनके साथ रुखा व्यवहार करती | इस बात से सुकरात को दुःख होता |

    एक दिन सुकरात लोगो के साथ बतिया रहे थे कि पत्नी ने उनके उपर छत से गंदा पानी उलीच दिया | इतना ही नही वह उन्हें निठल्ला कहकर गालीया भी देने लगी | सत्संगीयो को यह उनका अपमान लगा |

    सुकरात को भी यह व्यवहार बुरा लगा परन्तु उन्होंने बहुत धैर्य के साथ उपस्थित लोगो से कहा “आप सभी ने सुना होगा कि जो गरजता है वह बरसता नही | आज तो मेरी पत्नी ने गरजना-बरसना साथ साथ कर उपरोक्त कहावत को ही झुठला दिया है ”

    सुकरात के विनोद भरे ये शब्द सुनते ही तमाम लोगो का क्रोध शांत हो गया | वे पुन: सत्संग में लिप्त हो गये | सुकरात का धैर्य देखकर उनकी पत्नी चकित रह गयी | उसी दिन से उसने अपना स्वभाव बदल दिया और आने वाले लोगो का सत्कार करने लगी |

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