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    नवाबो की नगरी लखनऊ के प्रमुख पर्यटन स्थल | Lucknow Tour Guide in Hindi

    Lucknow Tour Guide in Hindi
    नवाबो की नगरी लखनऊ के प्रमुख पर्यटन स्थल | Lucknow Tour Guide in Hindi
    नवाबो की नगरी लखनऊ के प्रमुख पर्यटन स्थल | Lucknow Tour Guide in Hindi

    नजाकत और नफासत के लिए मशहूर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ (Lucknow) की तहजीब उसकी पहचान है | एतेहासिक और आधुनिक काल की बहुत सी इमारते और वस्तुए देखने योग्य है | इनमे शाम-ए-अवध का नजारा , स्वाधीनता संग्राम सेनानियों और अंग्रेजो के बीच हुयी टकराहट को याद दिलाने वाली रेजीडेंसी देखना पर्यटक नही भूलते | गोमती नदी के दोनों तटो पर काफी बड़े क्षेत्र में अवस्थित यह नगर सत्रहवी शताब्दी में अवध के चौथे नवाब आसिफुद्दोला के शासनकाल में राजधानी बना

    लखनऊ (Lucknow) थोड़े थोड़े समय के लिए राजपूत शासको , शेख्जादो , पठानों के अधीन रहने के बाद सत्रहवी शताब्दी में लोदी वंश के शासको के समय दिल्ली शासको के अधीन आ गया | आसिफुद्दोला का शासनकाल अवध के इतिहास का स्वर्ण युग था | उसके शासनकाल में बड़ा इमामबाड़ा जैसी भव्य इमारतो का निर्माण हुआ | अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह के संगीत एवं कला प्रेम तथा उनके एशो आराम और विलासिता की कहानिया आज भी कही सूनी जाती है | वे साहित्य और संगीत के अनन्य प्रेमी थे | तारीखे-अवध के अनुसार उन्होंने छोटी बड़ी 40 पुस्तके लिखी है |कहा जाता है कि भगवान राम ने लखनऊ का कुछ हिस्सा अपने छोटे भाई लक्ष्मण जी को दे दिया था | उस समय इसका नाम लक्ष्मणपुर था | वही लक्ष्मणपुर आज का लखनऊ (Lucknow) है |

    दर्शनीय स्थल

    बड़ा इमामबाड़ा – नवाब आसिफुद्दोला ने अकाल-राहत के लिए सन 1784 में इसका निर्माण कराया था | इसमें 409 गलियारे है जिनमे दरवाजे नही है | इसके आगे के हिस्से में 49.4 मीटर लम्बा , 16.2 मीटर चौड़ा और 15 मीटर ऊँचा हॉल है | इस इमारत के एक कोने में यदि कोई कागज फाड़ा जाए तो दुसरे कोने में कागज फटने की आवाज सुनाई देती है | इसमें एक बावड़ी है जिसमे गोमती नदी का पानी आता रहता है | बेगमे इसमें स्नान करती थी | यही असिफुद्दोला की मजार और ऊँचे चबूतरे पर एक मस्जिद है | कहा जाता है कि आसिफुद्दोला बड़े दानवीर थे | इस संबध में एक लोकोक्ति मशहूर है “जिसे न दे मौला , उसे दे आसिफुद्दोला” | यह इमारत इंडो सेरेनिक वास्तुकला की अनुपम मिसाल है | कहा जाता है कि दिन में इस इमारत का निर्माण शुरू होता था और रात में नवाब के आदेश से इसे गिरा दिया जाता था |

    छोटा इमामबाड़ा – अवध के तीसरे नवाब अलीशाह ने सन 1840 में इस इमामबाड़े का निर्माण करवाया था | ताजमहल के आधार पर निर्मित इस इमारत की आन्तरिक सज्जा बहुत ही खुबसुरत है | इसका शाही हम्माम दर्शनीय है | नवाब अलीशाह और उसकी माँ की मजार यही है | नवाब अलीशाह द्वारा बाहरदरी के रूप में निर्मित कला दीर्घा में अवध के नवाबो के आदमकद चित्र देखने योग्य है |

    रूसी दरवाजा – नवाब आसिफुद्दोला द्वारा निर्मित इस 60 फीट ऊँचे विशाल दरवाजे के उपर से बड़ा इमामबाड़ा में प्रवेश किया जा सकता है | ख़ास बात यह है कि इस दरवाजे के निर्माण में लकड़ी और लोहे का बिल्कुल इस्तेमाल नही किया गया है | शेर दरवाजा और गोल दरवाजा भी देखने योग्य है | इस विशालकाय दरवाजे पर शिल्पकला की खूबसूरती दर्शनीय है |

    रेसीडेंसी – लखनऊ आने पर रेजीडेंसी नही देखा तो समझिये एक महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थल अनदेखा रह गया | अवध के दरबार की तरफ से नवाब असिफुद्दोला ने सन 1780 में यह इमारत बनवाई थी | नवाब शहादत अली खां के शासनकाल में यह इमारत बनकर तैयार हुयी | प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857 में अंगेजो ने इस पर अधिकार कर लिया और यहाँ रहने लगे इसलिए इसे रेजीडेंसी कहा जाने लगा | यहाँ अंग्रेजो के साथ स्वतंत्रता सेनानियों ने जबर्दस्त संघर्ष किया था | मस्जिद का गोलाकार दरवाजा अरबी स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना प्रस्तुत करता है | इमारत पर की गयी खूबसूरत चित्रकारी देखने योग्य है |

    शहीद स्मारक – गोमती नदी के तट पर स्वतंत्रता सेनानियों की याद में 15 अगस्त 1957 को इस स्मारक का निर्माण करवाया गे था | पास ही गोमती नदी में नौका विहार का आनन्द लिया जा सकता है |

    गौतम बुद्ध पार्क – बड़ा इमामबाड़ा और शहीद स्मारक के बीच गोमती नदी के तट पर अवस्थित इस पार्क में बच्चो के लिए झूले , अप्पूघर और पैडल बोट चलाने के लिए झील बनाई गयी है | यहाँ शीशे का फव्वारा है जिसमे देखने पर अपनी अजीबोगरीब शक्ल-सुरत दिखाई देती है | इसे हंसी का फव्वारा कहा जाता है |

    घड़ी मीनार – 221 फीट लम्बी लखनऊ की सबसे ऊँची मीनार और देश का सबसे बड़ा घंटाघर यह मीनार माना जाता है | घड़ी का डायल 12 पंखुडियो वाले खिलने वाले फुल जैसा है | इसका पेंडुलम 14 फीट लम्बा है | रूसी दरवाजे के पास स्थित यह मीनार 1881 में अंग्रेज अफसरों की देखरेख में बनी थी | इसमें सभी पुर्जे गन मेटल के बने है और चारो ओर घंटिया लगी है |

    चिड़ियाघर – चारबाग रेलवे स्टेशन से 4 किमी दूर बनारसी बाग़ में स्थित इस चिड़ियाघर में विभिन्न पशु-पक्षियों को खुले वातावरन में मुक्त विहार करते देखा जा सकता है | पैडल बोट और बच्चो की रेलगाड़ी के अलावा हाथी पर बच्चो को घुमने की भी व्यवस्था की गयी है | यहाँ एक संग्रहालय भी है | यहा राजहंस नामक एक विमान भी देखा जा सकता है जिसका उपयोग पंडित नेहरु किया करते थे |

    कुकरैल – यह एक खुबसुरत पिकनिक स्थल है | यहाँ मगरमच्चो की प्रजातियाँ विकसित की जाती है |

    छतर मंजिल – इतालवी शैली से निर्मित इस खुबसुरत इमारत का निर्माण अवध के नवाब गाजीउद्दीन ने शुरू करवाया था किन्तु बीच में उनकी मृत्यु हो जाने पर नवाब नसीरुद्दीन ने इसे पूरा करवाया | गोमती नदी के किनारे बसी इस इमारत में बड़ा दीवानखाना , तहखाने और सुरंगे है |

    म्यूजिकल फाउंटेन – चारबाग रेलवे स्टेशन से 5 किमी दूर राजाजी पुरम कॉलोनी में टिकैत राय नामक इस तालाब में निर्मित संगीतमय फव्वारे कोफ़्रांस से मंगवाया गया था | शाम को 6 से 8 बजे तक तरह तरह की धुनों पर झूमते रंग-बिरंगे फव्वारे बड़े अच्छे लगते है |

     

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    Mount Everest Facts in Hindi | माउंट एवेरेस्ट से जुड़े 60 रोचक तथ्य

    Mount Everest Facts in Hindi | माउंट एवेरेस्ट से जुड़े रोचक तथ्य
    Mount Everest Facts in Hindi | माउंट एवेरेस्ट से जुड़े रोचक तथ्य

    माउंट एवरेस्ट (Mount Everest) विश्व की सबसे ऊँची चोटी है जिसके शीर्ष पर फुह्चने का सपना हर mountaineer का होता है क्योंकि विपरीत परिस्थितियों में वहा पहुचना बड़ा मुश्किल होता है इसलिए आज हम आपको माउंट एवेरेस्ट (Mount Everest )से जुड़े ऐसे रोचक तथ्य बतायेंगे जिसे पढकर आप हैरान रह जायेंगे |

    1. माउंट एवेरेस्ट (Mount Everest )की चोटी पर अब तक 5000 पर्वतारोही चढ़ चुके है जिसमे 13 साल के बच्चे से लेकर 76 वर्ष के बुजुर्ग तक चढ़ चुके है |
    2. माउंट एवेरेस्ट (Mount Everest )पर 200 से अधिक लोग मर चुके है जो एवेरेस्ट पर चढ़ते वक्त अब पर्वतारोहियों के निशान के रूप में काम आते है |
    3. 2013 में युचिरो नामक एक 80 वर्षीय जापानी बुजुर्ग ने एवेरेस्ट की चोटी पर कदम रखकर एवेरेस्ट पर सबसे बुजुर्ग आदमी के चढने का विश्व रिकॉर्ड कायम किया |
    4. माउंट एवेरेस्ट पर 50 टन से भी ज्यादा कचरा पड़ा है जो इसे विश्व का सबसे गंदा पर्वत बनाते है क्योंकि पर्वतारोही नीचे उतरते वक्त कचरा वापस साथ नही लाते है और वही छोड़ आते है |
    5. इतिहास पर नजर डाले तो हर 100 पर्वतारोही जो माउंट एवेरेस्ट पर चढ़ते है उनमे से 4 की मौत हो जाती है और वापस कभी लौटकर नही आते है |
    6. माउंट एवेरेस्ट (Mount Everest )पर चढने का खर्च 1 लाख से लेकर चार लाख प्रति व्यकित पड़ता है जो रिस्क के आधार पर और पर्वतारोहीयो की सुविधा के आधार पर बढ़ता रहता है |
    7. माउंट एवेरेस्ट की चोटी पर पानी का बोइलिंग पॉइंट 71 डिग्री सेल्सियस रहता है |
    8. एक आदमी अपनी बाइक पर स्वीडन से माउंट एवेरेस्ट तक आया और उसने माउंट एवेरेस्ट की चोटी तक पहुचने की कोशिश की लेकिन चोटी से 300 फीट नीचे ही उसे वापस लौटना पड़ा |
    9. माउंट एवेरेस्ट (Mount Everest) हर साल 4 मिलीमीटर की दर से वृद्धि कर रहा है |
    10. माउंट एवेरेस्ट (Mount Everest) के रास्ते में अब आपको हाई स्पीड इन्टरनेट भी मिल जाएगा |
    11. 2011 में दो आदमी माउंट एवेरेस्ट की चोटी से paragliding करते हुए नीचे आये | वो दोनों एक गाँव में 42 मिनट में पहुच गये जिससे वो खतरनाक 3 दिन की नीचे उतरने की प्रक्रिया से बच गये |
    12. 2015 में आये भूकम्प की वजह से माउंट एवेरेस्ट 1 इंच तक सिकुड़ गया |
    13. माउंट एवेरेस्ट का नाम जॉर्ज एवेरेस्ट के नाम पर रखा गया |
    14. 2005 में एक नेपाली जोड़े ने माउंट एवेरेस्ट की चोटी पर शादी करके नया इतिहास कायम किया |
    15. गूगल मैप के स्ट्रीटव्यू में आपको एवेरेस्ट बेस कैम्प का 360 डिग्री नजारा देखने को मिल जाएगा |
    16. सर एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे एवेरेस्ट की चोटी पर कदम रखने वाले पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ये 19 मई 1953 को यह कारनामा कर दिखाया था |
    17. तेनजिंग नोर्ग की एवेरेस्ट पर विजय से पहले छ: बार पहले भी असफलतापूर्वक प्रयास कर चूका था |
    18. एडमंड हिलेरी और उनका पुत्र पीटर हिलेरी 1990 में माउंट एवेरेस्ट पर चढने पर वाली पहली पिता-पुत्र की जोड़ी थी |
    19. एक भारतीय महिला जिसने अपना एक पैर रेल दुर्घटना में गंवा दिया था , एवेरेस्ट पर चढने वाली पहली विकलांग महिला बनी |
    20. बेस कैम्प से माउंट एवेरेस्ट की चोटी पर सबसे तेजी से 8 घंटे 10 मिनट में पहुचा गया है |
    21. एवेरेस्ट (Mount Everest) पर चढने वालो में सबसे ज्यादा मौत का कारण हिमस्खलन होता है |
    22. माउंट एवेरेस्ट की चोटी पर का पत्थर जलीय लाइमस्टोन है जिससे यह अनुमान लगता है कि 450 मिलियन पूर्व एवेरेस्ट की चोटी समुद्रतल के नजदीक थी |
    23. माउंट एवेरेस्ट की चोटी पर पहुचने के दो रास्ते है नेपाल के रास्ते से साउथ-ईस्ट चोटी से तथा तिब्बत के रास्ते नार्थ चोटी से जाया जा सकता है लेकिन तिब्बत वाला रास्ता ज्यादा कठिन और खतरनाक है |
    24. माउंट एवेरेस्ट पर चढ़ते वक्त गर्मियों में तापमान -20 डिग्री से लेकर -35 डिग्री तक बदलता रहता है |
    25. माउंट एवेरेस्ट (Mount Everest) पर हवाए 200 मील प्रति घंटे से भी ज्यादा रिकॉर्ड की जा चुकी है |
    26. 1974 के बाद 2015 एक ऐसा वर्ष रहा है जब एक भी पर्वतारोही माउंट एवेरेस्ट की चोटी पर नही पहुच सका |
    27. माउंट एवेरेस्ट (Mount Everest) पर सबसे सुरक्षित वर्ष 1993 था जब 129 लोग चोटी तक पहुचे थे और केवल आठ लोगो की जान गयी थी |
    28. विश्व के चार सबसे ऊँचे पर्वत में एवेरेस्ट की चोटी पर पर 1953 , K2 पर 1954 में , कंचनजंघा पर 55 में और ल्होत्से पर 1956 में पहली बार चढ़ा गया |
    29. अगर सतह से शीर्ष पर देखा जाए तो माउंट एवेरेस्ट विश्व का सबसे ऊँचा पर्वत नही है बल्कि हवाई का Mauna Kea की ऊँचाई 1 किमी तक है |
    30. तिब्बत में माउंट एवेरेस्ट को चोमोलुंगमाँ नाम से पुकारा जाता है जिसका अर्थ है “पहाडियों की देवी माँ ” और नेपाल में एवेरेस्ट को सागरमाथा कहते है जिसका अर्थ है आकाश में देवी माँ
    31. माउंट एवेरेस्ट की चोटी पर पहुचने वाला सबसे कम ऊम्र का व्यक्ति जॉर्डन रोमेरो था जिसने 2010 में केवल 13 साल की उम्र में यह कारनामा कर दिखाया था |
    32. माउंट एवेरेस्ट पर चढने वाली पहली महिला जापान की जुंको तबई थी जिसने 1975 में चोटी पर कदम रखा |
    33. माउंट एवेरेस्ट पर सबसे खतरनाक इलाका खुम्बू आइस फाल माना जाता है जहा अब तक 19 जाने जा चुकी है |
    34. एवेरेस्ट (Mount Everest) पर चढ़ते वक्त एक व्यक्ति की लगभग 20,000 कैलोरी खर्च हो जाती है जो सामान्य समय में 10,000 कैलोरी होती है |
    35. माउंट एवेरेस्ट की चोटी पर सबसे ज्यादा बाद पहुचने का रिकॉर्ड 53 वर्षीय आपा शेरपा के नाम पर है जिसे सुपर शेरपा भी कहा जाता है जिसने 21 बार एवेरेस्ट की चोटी पर कदम रखा और अंतिम बार 2011 में चढाई की थी |
    36. बाबू चिरी शेरपा 1999 में एवेरेस्ट की चोटी पर 21.9 घंटे बिताकर सबसे लम्बे समय तक चोटी पर रहने का रिकॉर्ड बनाया |
    37. Erik Weihenmayer एवेरेस्ट की चोटी पर पहुचने वाला पहला नेत्रहीन क्यक्ति था | जिसने यह कारनामा 2001 में किया था |
    38. 1976 में की गयी एक स्टडी के अनुसार शेरपा में हजारो वर्षो तक पहाड़ो में रहने के बाद विश्व के ऊँचे पहाड़ो पर रहने के लिए आनुवांशिक रूपान्तर हो गया है जिससे ये पहाड़ो पर दुसरो एक मुक़ाबले आसानी से चढ़ जाते है |
    39. पर्वतारोही अमूमन 26,000 फीट की उंचाई पर ऑक्सीजन बोटल का इस्तेमाल करना शूर कर देते है |
    40. 1924 में 37 वर्षीय Britons George Mallory और 22 वर्षीय Andrew Irvine   एवेरेस्ट से गायब हो गये थे और वो चोटी तक पहुचे थे या नही , आज भी रहस्य है | 1999 में mallory का शव 27,000 फीट पर मिला था |
    41. 2008 सेव लेकर 2011 तक माउंट एवेरेस्ट से एक अभियान के तहत 400 किलोग्राम कचरा साफ़ किया जा चूका है |
    42. साउथ काल रास्ते से जाते वक्त हर साल 33,000 फीट लम्बी fixed Rope का प्रयोग किया जाता है |
    43. 1980 में एक इटालियन पर्वतारोही Reinhold Messner ने एवेरेस्ट की चोटी पर अकेले चढने का कारनामा कर दिखाया था क्योंकि अक्सर एवेरेस्ट पर ग्रुप में चढ़ा जाता है |
    44.  Reinhold Messner ने इस कारनामे के अलावा बिना ऑक्सीजन बोटल के एवेरेस्ट पर चढने का कारनामा कर दिखाया था जो उन्होंने 1978 में ऑस्ट्रियन पर्वतारोही Peter Habeler के साथ चढाई की थी |
    45. एवेरेस्ट (Mount Everest) पर तापमान कभी कभी शून्य से 60 डिग्री तक भी पहुच जाता है |
    46. 10 मई 1993 को 40 पर्वतारोही चोटी तक पहुचे थे जो एक दिन में सबसे ज्यादा पर्वतारोहियों के चोटी तक पहुचने का रिकॉर्ड है |
    47. माउंट एवेरेस्ट (Mount Everest) पर चढने वालों में सबसे बड़ा दल एक चीनी दल था जिसमे 410 सदस्य थे और 1975 वर्ष था |
    48. माउंट एवेरेस्ट पर जान गंवाने वालो में सबसे अधिक संख्या नेपाल के लोग ही है | नेपाल के 46 लोग एवेरेस्ट चढ़ते वक्त मारे जा चुके है जिसमे सबसे अधिक संख्या उन शेरपाओ की जो एवेरेस्ट पर चढने में वेस्टर्न पर्वतारोहियों की सहायता करते थे |
    49. अक्टूबर 1950 में जब तिब्बत पर चीन ने हमला कर दिया था तब नार्थ से एवेरेस्ट चढने पर पाबंदी लग गयी थी तब से नेपाल के रास्ते से माउंट एवेरेस्ट का रास्ता खुल गया |
    50. जियोलाजिकल तरकी से देखा जाय तो माउंट एवेरेस्ट 60 मिलियन वर्ष पुराना है |
    51. ऐसा अनुमान है कि एवेरेस्ट पर शुरू से अंत करने तक लगभग 2 महीने का समय लगता है |
    52. माउंट एवेरेस्ट (Mount Everest) की चारो दिशाओं से चोटी पर पहुचने वाला एकमात्र पर्वतारोही Kushang Sherpa है जो Himalayan Mountaineering Institute में instructor है |
    53. 1856 तक किसी को पता नही था कि एवेरेस्ट विश्व का सबसे उंचा पहाड़ है लेकिन Trigonometric Survey of India ने इसकी उंचाई का पता लगाया |
    54. जापानी महिला Tamae Watanabe एवेरेस्ट की चोटी पर पहुचने वाली सबसे वृद्ध महिला है जो 2012 में चोटी पर पहुची और उनकी उम्र 73 वर्ष है |
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    Sydney Harbour Bridge Facts in Hindi | सिडनी हार्बर ब्रिज से जुड़े रोचक तथ्य

    Sydney Harbour Bridge Facts in Hindi | सिडनी हार्बर ब्रिज से जुड़े रोचक तथ्य
    Sydney Harbour Bridge Facts in Hindi | सिडनी हार्बर ब्रिज से जुड़े रोचक तथ्य

    ऑस्ट्रेलिया स्थित सिडनी हार्बर ब्रिज (Sydney Harbour Bridge) देखने में बेहद खुबसुरत एवं भव्य है यह ब्रिज ऑस्ट्रेलिया को उत्तरी समुद्र तट से जोड़ता है | सिडनी हार्बर ब्रिज (Sydney Harbour Bridge) का निर्माण सिडनी हार्बर पर किया गया है | इस ब्रिज से रेल , गाडिया ,साइकिल और पैदल सवारी भी की जाती है | इस ब्रिज के पास में सिडनी ओपेरा हाउस है जो इसकी खूबसूरती को ओर भी बढाता है | साथ ही सिडनी और ऑस्ट्रेलिया का बहुत ही खुबसुरत तस्वीर पेश करता है इसके आर्च बेस्ड डिजाईन की वजह से इसे वहा की भाषा में कोंथेगर भी कहा जाता है |

    कब और कैसे बना

    यह ब्रिज Newyork City में बनी Hell Gate Bridge के डिजाईन से प्रभावित है | इसका डिजाईन डॉक्टर जेजेसी ब्रेद्फील्ड ने तैयार किया था | यह विश्व की छठी सबसे लम्बी Arch Shaped Bridge है | Water Level से लेकर उपर तक की इसकी लम्बाई 440 फुट है | विस्तार में भी यह विश्व की सबसे चौड़ी ब्रिज है | इसकी चौड़ाई 160 फुट है | इसे 28 जुलाई 1923 में बनाना शुरू किया गया था उअर 19 जनवरी 1932 में बनकर तैयार हुआ | 19 मार्च 1932 से इस पर आवाजाही शुरू हो गयी | 1912 में जेजेसी ब्रेडफील्ड को सिडनी बन्दरगाह पुल और मेट्रोपोलिटन रेलवे निर्माण का मुख्य इंजिनियर नियुक्त किया गया और इस योजना पर कई वर्षो तक किये गये उनके विशिष्ट कार्य के लिए उन्हें “पुल के पिता” नाम से नवाजा गया |

    उद्घाटन में घटी रोचक घटना

    पुल का औपचारिक उद्घाटन 19 मार्च 1932 को किया गया | ऑस्ट्रेलिया के सभी गणमान्य लोग वहा उपस्थित थे | न्यू साउथ वेल्स के लेबर प्रधानमंत्री जैक लैंग पुल के दक्षिणी छोर पर रिबन काट उद्घाटन करने वाले थे लेकिन जब लैंग रिबन काटने वाले थे तभी फ़ौजी वर्दी पहने घोड़े पर सवार एक आदमी आया और उसने अपनी तलवार से रिबन को काट दिया | इस तरह अधिकृत समारोह के शुरू होने से पहले ही न्यू साउथ वेल्स की जनता के नाम पर सिडनी हार्बर ब्रिज का उद्घाटन कर दिया गया | उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया और रिबन को तुंरत फिर से बाँधा गया और लैंग ने आधिकारिक उद्घाटन सम्पन्न किया |

    मनाई गयी 75वी वर्षगाँठ

    18 मार्च 2007 को इसके उद्घाटन की 75 वी वर्षगाँठ सिडनी के संग्रहालय में एक प्रदर्शनी द्वारा मनाई गयी जिसे “ब्रीजिंग सिडनी” नाम दिया गया | यह प्रदर्शनी एतेहासिक भवन ट्रस्ट की एक पहल थी इस कार्यक्रम में लगभग ढाई लाख लोगो ने हिस्सा लिया था | वर्तमान में इस पुल के 85 साल हो चुके है |

    सबसे उपरी हिस्से पर चढ़ते है पर्यटक

    1998 में ब्रिज क्लाइंब ने पर्यटकों के लिए पुल के दक्षिणी हिस्से पर चढना सम्भव कर दिया है | यहाँ पर्यटन सूर्योदय से सूर्यास्त तक चलता रहता है | केवल बिजली वाले तुफानो या तेज हवा होने पर ही स्थगित किये जाते है | दिसम्बर 2006 से ब्रिज क्लाइंब ने उपरी हिस्से पर चढने के लिए भी व्यवस्था की है चढने वाले लोगो के समूहों को मौसम के अनुसार रक्षात्मक कपड़े उपलब्ध कराए जाते है और चढाई करने से फ्ल्ले एक सलाह दी जाती है | प्रत्येक चढाई पुल के पूर्वी भाग से शुरू होती है और शीर्ष तक जाती है इसमें तैयारी से लेकर चढने में लगभग साढ़े तीन घंटे का समय लगता है इसमें सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाता है |

    नये साल पर होता है ख़ास आयोजन

    नये साल के अवसर पर हर साल आधी रात को सिडनी हार्बर ब्रिज पर दो तरह की आतिशबाजी का आयोजन किया जाता है इसमें एक 9 PM फॅमिली फायरवर्क्स और दूसरा मिडनाइट फायर वर्क्स होता है हर साल इसके लिए थीम निश्चित की जाती है | यहा होने वाले फायरवर्क्स को 1996-97 में पहली बार टीवी पर दिखाया गया था | इसकी शुरुवात 1983 में की गयी थी | इसे देखने के लिए लाखो लोग इकट्ठा होते है | जुलाई से ही हर साल इस आयोजन की तैयारी शूरू हो जाती है |

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    ऋषिकेश के प्रमुख पर्यटन स्थल | Rishikesh Tour Guide in Hindi

    Rishikesh Tour Guide in Hindi
    Rishikesh Tour Guide in Hindi
    Rishikesh Tour Guide in Hindi

    संतो , योगियों और साधको की साधना भूमि तथा प्राकृतिक सौन्दर्य से सुषमा-मंडित ऋषिकेश (Rishikesh) हिन्दुओ का पवित्र तीर्थ ही नही , पर्यटकों के लिए प्राकृतिक सुन्दरता की दृष्टि से दर्शनीय पर्यटन स्थल भी है | ऋषिकेश (Rishikesh) बद्रीनाथ ,केदारनाथ ,गंगोत्री एवं यमुनोत्री जैसे तीर्थो का प्रवेश द्वार है | गंगा पहाड़ो के अंचल को छोडकर यहाँ मैदानी क्षेत्र में फ़ैल जाती है | ऊँचे-नीचे पर्वतीय मार्गो से उछलती , प्रस्तर खंडो से टकराती अल्हड गंगा हरे-भरे जंगलो की छाया में मंथर गति से प्रवाहित होती है |

    गंगा-तट के दृश्य बहुत ही मोहक औ आकर्षक है | शाम को गंगा के किनारे घूमते हुए मुनि की रेती , स्वर्गाश्रम तथा शिवानन्द आश्रम की ओर जाने पर विभिन्न भावमुद्राओं में ध्यान लगाये – भारत के अलावा अमेरिका , जापान , फ्रांस और जर्मनी आदि देशो के जिज्ञासु मिल जाते है | नौका विहार और जल क्रीडा के लिए यहाँ बड़ी संख्या में लोग आते रहते है | गंगा के दुसरी तरफ घने जंगलो में तरह तरह के वन्य प्राणियों को देखा जा सकता है | समुद्र तल से लगभग 7700 फीट की ऊँचाई पर ऋषिकेश हरिद्वार से 24 किमी और देहरादून से 42 किमी दूर है |

    कहा जाता है कि प्राचीनकाल में यहाँ एक ऋषि ने कठिन तपस्या की थी | भगवान ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर दर्शन दिए | तभी से इस स्थान को ऋषि के नाम पर ऋषिकेश कहा जाने लगा | यह भी कहा जाता है कि भगवान राम अनुज लक्ष्मण के साथ यहाँ आये थे | ब्राह्मण राजा रावण के वध से लगे पाप से मुक्ति पाने के लिए राम ने ऋषिकेश में और लक्ष्मण ने तपोवन में कुछ दिनों तक तप किया | ऋषिकेश संतो , आश्रमों ,आध्यात्मिक साधना केन्द्रों और मन्दिरों का नगर है | यहाँ योग साधना की शिक्षा लेने और योगाभ्यास के लिए विदेशी पर्यटक भी आते है | यहाँ के मन्दिरों की वास्तुकला भी दर्शनीय है | ऋषिकेश को प्राचीन परम्पराओं और आधुनिक विकास का अनुपम संगम कहा जा सकता है |

    ऋषिकेश के दर्शनीय स्थल

    लक्ष्मण झुला – समुद्रतल से 150 मीटर की ऊँचाई पर गंगा के उपर 1939 में लोहे के तारो से निर्मित झूलते हुए विशाल पुल को पारकर स्वर्गाश्रम जाया जाता है | वैसे नाव  से भी गंगा पार कर यहाँ पहुचा जा सकता है लेकिन पुल पर से गंगा का दृश्य बहुत ही लुभावना प्रतीत होता है | गर्मियों में पुल पर टहलते हुए शीतल पवन के झोंको का स्पर्श बड़ा सुखद लगता है | पुल के समीप लक्ष्मण जी का प्राचीन मन्दिर और लक्ष्मण घाट है | पुल के पार यात्रियों के ठहरने के लिए कैलाश आश्रम है | कहा जाता है कि यहाँ लक्ष्मण जी ने तप किया था | गंगा को पार करने के लिए उन्होंने अपने बाणों से पुल का निर्माण किया | इसी पुल से झूलते हुए उन्होंने गंगा को पार किया इसलिए इस पुल को लक्ष्मण झुला कहा जाता है |

    राम झुला – शिवानन्द आश्रम और स्वर्गाश्रम के बीच लक्ष्मण झुला के निकट ही नवनिर्मित झूलते हुए इस झूले को शिवानन्द झुला ही कहते है |

    भरत मन्दिर – ऋषिकेश के बीच बाजार में भगवान राम के अनुज भरत जी के नाम पर भरत मन्दिर है | इसकी बनावट बौद्ध मन्दिरों जैसी है | कहा जाता है कि भरत जी ने यहा तपस्या की थी |

    त्रिवेणी घाट – भरत मन्दिर के आगे गंगा तट पर कुब्बा भ्रमक नाम का एक कुंड है जिसमे पर्वत से तीन स्त्रोतों से जल आता है | इन स्त्रोतों को गंगा ,यमुना और सरस्वती माना जाता है इसलिए इसे त्रिवेणी घाट कहा जाता है | इसके समीप कई मन्दिर है जिनमे रघुनाथ मन्दिर वास्तुकला की दृष्टि से दर्शनीय है | त्रिवेणी घाट में प्रात:काल बड़ी संख्या में लोग स्नान करने और शाम को आरती देखने आते है | घाट की सीढियों पर बैठकर गंगा की लहरों और आस-पास के प्राकृतिक दृश्यों को देखने में बड़ा आनन्द आता है |

    नीलकंठ महादेव – ऋषिकेश से 12 किमी दूर 1700 मीटर ऊँचाई पर शांत वन में स्थित इस मन्दिर के विषय में कहा जाता है कि शिवजी ने समुद्र मंथन से निकले विष को पी लिया था |

    स्वर्गाश्रम – यहाँ अनेक मन्दिर और आश्रम है | यहाँ एक मन्दिर में श्री बद्रीनाथ जी की मूर्ति है | यहाँ ठहरने के लिए रेस्टोरेंट उपलब्ध है तथा खाने पीने की बहुत सी दुकाने है | एक औषधि निर्माणशाला भी है | शिवानन्द आश्रम से मोटर बोट अथवा राम झुला की ओर से यहाँ जाया जा सकता है |

    गीता भवन – स्वर्गाश्रम से आगे कई मन्दिर और भवन है | गीता प्रेस गोरखपुर ट्रस्ट द्वारा निर्मित गीता भवन के अंदर लक्ष्मी नारायाण मन्दिर है जिसके चारो ओर आवासीय कमरे बने है | भवन की दीवारों पर रामायण -महाभारत की कथाये चित्रों में अंकित है | गीता भवन का उद्देश्य समाज सेवा और धर्म प्रचार है | गीता भवन में प्रवेश करते ही बाई ओर पंक्तिबद्ध पौराणिक कथाओं के आधार पर बनी सुंदर मुर्तिया है | दाई ओर विभिन्न देवताओं की विशाल मुर्तिया , चारो ओर लगे दर्पण पर परावर्तित प्रतिबिम्ब देखने में बड़ा अच्छा लगता है | आश्रम के बाहर गंगा तट पर घंटा घर है |

    शिवानन्द आश्रम – ऋषिकेश से लक्ष्मण झुला जाने वाले मार्ग पर योगी शिवानन्द जी द्वारा स्थापित शिवानन्द आश्रम “दिव्य जीवन संघ” के नाम से भी जाना जाता है | यहाँ आँखों के अस्पताल में निशुल्क चिकित्सा की जाती है तथा रोगियों को भोजन दिया जाता है | एक प्रेस है जहां योग-वेदान्त तथा धार्मिक पुस्तके प्रकाशित होती है |

    काली कमलीवाला पंचायत क्षेत्र -विशुद्धानन्द जी द्वारा स्थापित इस क्षेत्र का संचालन कोलकाता स्थित एक ट्रस्ट द्वारा किया जाता है | संस्था की बद्रीनाथ , केदारनाथ ,गंगोत्री तथा यमुनोत्री स्थित शाखाओं द्वारा यात्रियों को आवास , निधनो को कम्बल तथा रोगियों को निशुल्क चिकित्सा सुविधा प्रदान की जाती है | संस्था द्वारा आत्मविज्ञान भवन का निर्माण किया गे है |

    रिवर राफ्टिंग – ऋषिकेश से बद्रीनाथ मार्ग पर कौडियाला ,लासी के आस-पास कुछ एजेंसीयो द्वारा रिवर राफ्टिंग का प्रशिक्ष्ण दिया जाता है प्रशिक्षुओ के रहने के लिए टेंटो की व्यवस्था की जाती है |

    चीला -ऋषिकेश से 20 किमी दूर  ,300 मीटर की ऊंचाई पर यह मनोरम पर्यटन स्थल है | गंगा से एक नहर निकालकर जलाशय का निर्माण किया गया है | यहाँ के अभ्यारण्य में अनेक प्रकार के वन्य पशु देखे जा सकते है | पर्यटकों के रहने के लिए पर्यटक आवास गृह है |

    नरेंद्र नगर – ऋषिकेश से 15 किमी दूर टिहरी-चम्बा मार्ग पर टिहरी रियासत में राजा नरेंद्रशाह द्वारा बसाया गया छोटा सा एतेहासिक नगर है | यहाँ का राजमहल और नन्दी बैल की प्रतिमा दर्शनीय है |

    कैसे जाये

    निकटतम हवाई अड्डा जौलीग्रांट (18 किमी) के लिए दिल्ली से कुछ छोटे विमान आते-जाते रहते है | हरिद्वार और देहरादून होते हुए ऋषिकेश देश के विभिन्न भागो से सडक मार्ग से जुड़ा हुआ है | दिल्ली , आगरा ,देहरादून , मसूरी ,हरिद्वार , चंडीगढ़ ,पटियाला ,सहारनपुर और शिमला से ऋषिकेश के लिए सरकारी और निजी बसे उपलब्ध रहती है | ऋषिकेश से आगे उत्तरी क्षेत्र में जाने के लिए बस स्टैंड एवं देहरादून से बसे मिलती है | स्थानीय भ्रमण के लिए टैक्सी , ऑटो-रिक्शा ,तांगा और साइकिल रिक्शा उपलब्ध है |

    क्या खरीदे

    यहाँ हस्तशिल्प की तरह तरह की वस्तुए मिलती है | सीपी , शंख ,मोती , रंग-बिरंगे पत्थर और हींग आदि खरीदने योग्य वस्तुए है | इनके अलावा साड़िया , कुर्ते , चादरे आदि भी खरीदी जा सकती है |

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    कन्याकुमारी के प्रमुख पर्यटन स्थल | Kanyakumari Tour Guide in Hindi

    कन्याकुमारी के प्रमुख पर्यटन स्थल | Kanyakumari Tour Guide in Hindi
    कन्याकुमारी के प्रमुख पर्यटन स्थल | Kanyakumari Tour Guide in Hindi

    यों तो एतेहासिक , धार्मिक और प्राकृतिक सुषमा की दृष्टि से भारत में दर्शनीय स्थानों की कमी नही है किन्तु इनमे कन्याकुमारी ( Kanyakumari )सभी दृष्टियों से अन्यतम है | दक्षिण भारत के सीमान्त छोर पर स्थित कन्याकुमारी के साथ कई पौराणिक कथाये जुड़ी है | कहा जाता है कि यही शिवजी को वर रूप में पाने के लिए पार्वती जी ने तपस्या की थी | कन्याकुमारी में अंकित पार्वती जी के चरण चिन्हों को “श्रीपाद” कहा जाता है और इन चरण चिन्हों की पूजा की जाती है | कन्या पार्वती के नाम पर ही इस स्थान को कन्याकुमारी ( Kanyakumari ) कहा जाता है |

    एक प्रचलित जनश्रुति के अनुसार भाण नामक एक राक्षस ने आकाश ,पाताल और पृथ्वी पर विजय प्राप्त करने के बाद देवलोक पर आक्रमण किया | देवताओं ने जब भाण के नाश के लिए शिवजी से प्रार्थना की तो शिवजी ने कहा कि पार्वती कुमारी कन्या के रूप में अवतरित होगी और भाण का नाश करेगी | कन्या के रूप में पार्वती की सुन्दरता पर मुग्ध होकर राक्षसराज भाण ने उनका पीछा किया | इसी क्रम में पार्वती जी के साथ उसका भीषण युद्ध हुआ और वह मारा गया |

    राक्षस का वध करने के बाद पार्वती जी ने शिवजी को पाने के लिये कठिन तपस्या की | शिवजी विवाह के लिए सहमत हो गये किन्तु नारद जी के छल-कौशल के कारण शुभ मुहूर्त पर विवाह स्थल पर नही पहुच सके | दुःखी और क्षुब्ध पार्वती जी ने अपने आभूषन उतारकर फेंक दिए | लोगो का मानना है कि पार्वती जी के फेंके हुए वे आभूषण समुद्र तट पर रंग बिरंगी रेत बनकर फ़ैल गये , जो आज भी स्वर्णाभुषण की तरह चमक रहे है |

    मुख्य भूमि पर स्थित वर्तमान मन्दिर का मुंह पूर्व की ओर है | कहते है कि देवी की नाक के हीरे की चमक से दिग्भ्रमित होकर कई जहाज चट्टानों से टकराकर नष्ट हो चुके है इसलिए सिंहद्वार वर्ष में केवल पांच बार खोले जाते है | मन्दिर के दक्षिणी भाग से सागर संगम का दृश्य दिखाई पड़ता है | यहाँ बंगाल की खादी , अरब सागर और हिन्द महासागर मिलते है | एक जनश्रुति के अनुसार पार्वतीजी ने भगवान राम को – जब वे सीताजी की खोज में कन्याकुमारी (Kanyakumari )के तट पर आये तप रामेश्वरम भेजा , जहां रामजी ने शिवजी की स्थापना और पूजा की | महाभारत में यह उल्लेख मिलता है कि इस मन्दिर में देवी दर्शने के लिए बलराम और अर्जुन गये थे |

    शुचीड्रम मन्दिर में हनुमान जी की 16 फीट ऊँची संगीतमय मूर्ति और शंख सीपियो के चूर्ण से निर्मित त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु ,महेश) दर्शनीय है | कहा जाता है कि आत्री ऋषि की पत्नी अहल्या का छल से शील भंग करने के कारण गौतम ऋषि ने इंद्र को श्राप दिया | शापमुक्त होने के लिए इंद्र ने यहाँ तपस्या की | तपस्या से प्रसन्न होक शिवजी ने उन्हें शापमुक्त कर दिया | राम-रावण युद्ध के समय रणक्षेत्र में लक्ष्मण मुर्छित हो गये थे | द्रोणाचल पर्वत पर ऐसी जड़ी-बूटी थी जिससे लक्ष्मण की मूर्च्छा टूट सकती थी | उस जड़ी-बूटी को लाने के लिए हनुमान जी जब द्रोणाचल पर्वत पर्वत को उठाकर ले जा रहे थे तो पर्वत के कुछ शिलाखंड टूटकर कन्याकुमारी की भूमि पर पड़े | इसी कारण आज भी यहाँ की पहाडियों पर दुर्लभ औषधिया और जड़ी-बूटिया पायी जाती है | यह भी कहा जाता है कि कन्याकुमारी की पहाडियों और दुर्लभ जड़ी-बूटियों की खोज में अगस्त्य मुनि आये थे | यही है सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकता के सूत्र में सारे भारत को पिरोने वाले आदिगुरू शंकराचार्य का स्मृति स्थल |

    आधुनिक भारत के सांस्कृतिक एवं आध्यत्मिक दूत विवेकानंद , जिन्होंने सारे विश्व को भारत के विश्व बन्धुत्व , विश्व शान्ति और अद्वैत ज्ञान के संदेश से परिचित ही नही अनुप्राणित और प्रभावित किया , ने यही तपस्या की थी | मोक्ष प्राप्त करने के लिए नही , देशवासियों की दासता , दरिद्रता और अज्ञान को दूर करने तथा सम्पूर्ण मानवता के कल्याण के लिए श्रीपाद शिला पर 100 वर्ष पहले तीन दिनों तक ध्यानमग्न रहे | यह शिला विवेकानंद शिला तथा रॉक मेमोरियल के नाम से विख्यात है | इस चट्टान पर दो मंडप है नीचे की तरफ का मंडप “श्रीपाद मंडप” और दूसरा “विवेकानन्द मंडप” के नाम से विख्यात है | श्रीपाद मंडप में एक पद-चिन्ह अंकित है जिसे कन्याकुमारी के चरण की छाप मानकर पूजा जाता है | उपर की ओर ऊँचे मंडप में स्वामी विवेकानंद की 7.5 फीट ऊँची कास्य प्रतिमा है | इस स्मारक तक पहुचने के लिए फेयरी बोट उपलब्ध है |

    विवेकानंद ने मुख्य भूमि से श्रीपाद शिला तक 550 गज तैरकर पार किया था इसलिए कि उनके पास नाविक को देने के लिए पैसे नही थे | कुछ लोग नाव में केले और नारियल लेकर उनके पास आये किन्तु स्वामी जी ने उनकी यह भेंट स्वीकार नही की | वे शिला पर तीन दिन , तीन रात समाधिस्थ रहे | ध्यानावस्था में उन्हें निष्काम भाव से मानवता की सेवा की प्रेरणा मिली | इसे ही उन्होंने ईश्वर की सच्ची सेवा और उपासना माना |

    यहाँ के दर्शनीय स्थलों में नागरकोइल कन्याकुमारी (Kanyakumari )से 13 किमी दूर स्थित एक भव्य मन्दिर है | मन्दिर का प्रवेश द्वार चीनी स्थापत्य शैली से निर्मित है | यहाँ शिव और विष्णु की प्रतिमाये विराजती है | इसके अलावा राजकीय संग्रहालय , होली क्रॉस चर्च , शंकराचार्य मन्दिर , सर्कुलर फोर्ट , बत्तोकतोई भी दर्शनीय स्थल है | यहाँ से आप शंख ,कौड़ी , सीपी आदि से बनी चीजे और केले और नारियल के रेशे से बना कुशन , बैग ,पर्स आदि खरीदकर ले जा सकते है

    कन्याकुमारी (Kanyakumari) रेल मार्ग द्वारा देश के सभी महत्वपूर्ण भागो से जुड़ा है | दक्षिण भारतीय नगरो से कन्याकुमारी के लिए विभिन्न बस सेवाए है | वायु मार्ग के लिए नजदीकी हवाई अड्डा त्रिवेन्द्रम है | यहाँ से बस ,टैक्सी एवं ट्रेन से कन्याकुमारी पहुचा जा सकता है | यहाँ होटल , धर्मशालाये एवं लॉज भी उपलब्ध है | यात्री अपनी मनपसन्द जगह ठहर सकते है|(

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    मनोरम पर्वतीय स्थल ऊटी के पर्यटन स्थल | Ooty Tour Guide in Hindi

    मनोरम पर्वतीय स्थल ऊटी के पर्यटन स्थल | Ooty Tour Guide in Hindi
    मनोरम पर्वतीय स्थल ऊटी के पर्यटन स्थल | Ooty Tour Guide in Hindi

    समुद्र तल से 7500 फीट की उंचाई पर स्थित ऊटी (Ooty) भारत का एक सुंदर पर्वतीय स्थल है | पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र ऊटी (Ooty) तमिलनाडू में नीलगिरी की पहाडियों में स्थित है | पर्वतीय प्राकृतिक सुन्दरता के कारण इसे पहाड़ो की रानी कहा जाता है | ऊटी के निकट ही दो ओर छोटे पर्वतीय स्थल है कुन्नूर और कोटागिरी | ऊटी के निकटतम रेलवे स्टेशन मेट्टूयलायम से ऊटी तक पर्वतीय रेल यात्रा बहुत ही आनन्ददायक है | चाय बागानों और पर्वतीय हरियाली का नजारा लेते हुए 4 घंटे का सफर बहुत ही सुखद प्रतीत होता है |

    आकर्षक और खुबसुरत प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण नीलगिरी की पर्वतीय सुन्दरता पर्यटकों को बरबस अपनी ओर आकर्षित कर लेती है | ऊटी या ऊटकुंड 36 वर्ग किमी में फैला है | यहाँ चारो ओर नेत्र सुखद हरियाली ही हरियाली नजर आती है | यहाँ झरने और झीले है चाय और कॉफ़ी के बागान है | इस पहाडी का नाम नीलगिरी इसलिए पड़ा , क्योंकि अमेरिका के ग्रेट स्मोकीज पहाड़ो पर रहने वाले कुहरे की तरह यहाँ भी नीला कुहरा छाया रहता है | इस पहाडी जिले में कई आदिवासी जनजातियाँ रहती है जिनमे टोडा , कोटा , कुम्बा , पनिया , ईरुला आदि मुख्य है | ऊटी में चार भाषाए बोली जाती है तमिल , कन्नड़ , मलयालम और अंग्रेजी |

    ऊटी (Ooty)  भ्रमण के लिए अप्रैल से जून और सितम्बर से अक्टूबर का समय सर्वाधिक सुखद है | गर्मियों में यहाँ का अधिकतम तापमान 21 डिग्री और न्यूनतम 6 डिग्री तक रहता है | गर्मियों में हल्के उनी वस्त्रो से काम चल जाता है किन्तु सर्दियों में भरपूर उनी वस्त्रो की आवश्कयता होती है वायुयान ,रेल और बस तीनो से ऊटी जाया जा सकता है | वायुयान से यह कोच्चिन , चेन्नई तथा बंगलौर से जुड़ा हुआ है | कोयम्बतूर सबसे नजदीकी हवाई अड्डा है | यह ऊटी से 89 किमी दूर है | चेन्नई , कोच्चिन , बंगलोर , मदुरै तथा तिरुचिराप्प्ली से ट्रेन द्वारा भी ऊटी जा सकते है |

    भारत के सभी भागो से ऊटी सडक मार्ग से जुड़ा हुआ है | डीलक्स बसे लगभग 4 घंटे में कोयम्बतूर से ऊटी पहुचा देती है | साधारण बसे 6 घंटे में पहुचाती है | कोयम्बतूर से रेल द्वारा ऊटी जाने में 12 घंटे लगते है | इस रेल यात्रा की विशेष बात यह है कि यह रेल मैदानी इलाको की रेल से भिन्न प्रकार की होती है | इसका रंग अन्य रेलों की तरह लाल या काला नही , सफेद या नीला होता है | इंजन रेल को खींचता नही , धक्का देकर उपर चढ़ा देता है | इस रेल में सिर्फ दो ही डिब्बे होते है | जो लोग कन्याकुमारी होते हुए ऊटी जाना चाहते है वे बस से जाना अधिक पसंद करते है | बीच में बहुत ही खुबसुरत शहर मदुरै देखा जा सकता है | कोटागिरी , कुन्नूर और ऊटी में कही भी जाने के लिए टैक्सी हमेशा उपलब्ध रहती है |

    दर्शनीय स्थल

    वानस्पतिक उद्यान  -ऊटी के इस वानस्पतिक उद्यान की विशेषता यह है कि यहाँ 2 करोड़ वर्ष पुराना एक वृक्ष का तना सुरक्षित है | यहाँ साउथ इंडिया कैनल क्लब द्वारा वार्षिक डॉग शो आयोजित किया जाता है | यहाँ आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण और सजावट के लिए उपयुक्त बहुत सारे पेड़-पौधे है | मई में यहाँ फूलो और पौधों की प्रदर्शनी लगाई जाती है | इस उद्यान की नींव सन 1847 में रखी गयी थी | उद्यान के बीच में एक सुंदर झील है |

    झील – वनस्पतिक उद्यान में सन 1824 में निर्मित इस झील में बच्चे घुड़सवारी , नाव चलाने तथा खिलौना गाड़ी पर घुमने  का आनन्द लेते है | इस झील के किनारे फिल्मो की शूटिंग होती है | यहाँ हाउस बोट की भी व्यवस्था है |

    कैटी वैली – ऊटी से 8 किमी दूर छोटे छोटे गाँवों का समूह है | ये गाँव कोयम्बतूर और मैसूर तक फैले हुए है | यहाँ सुई बनाने का उद्योग है |

    दोड़बेट्टा – ऊटी से 10 किमी दूर नीलगिरी की इस सबसे ऊँची चोटी से पहाड़ो , मैदानों और पठारों का दृश्य नजर भर से देखा जा सकता है | यहाँ एक दूरबीन भी लगी हुयी है | ऊटी से यहाँ बस से जाया जा सकता है | तमिल में दोड़बेट्टा का अर्थ है सबसे बड़ी चोटी | दोड़बेट्टा ऊटी-कोलागिरी पर स्थित है |

    लेक गार्डन – रेलवे स्टेशन और बस अड्डे के निकट यह उद्यान विशेषकर बच्चो के लिए है किन्तु प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण यहाँ पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है |

    कालहट्टी झरना – ऊटी से करीब 14 किमी की दूरी पर यह एक मनोरम पिकनिक स्थल है | लगभग 36 मीटर की उंचाई से गिरते हुए झरने का दृश्य बहुत ही मनोहारी है | बसे कालहट्टी गाँव तक ही जाती है | यहाँ से 3 किमी पैदल या बस द्वारा जाया जा सकता है | यह पिकनिक और ट्रैकिंग के लिए उत्तम स्थान है |

    बेनलेक हाउस – ऊटी से 30 किमी दूर यहाँ जिमखाना क्लब , भेड़-पालन केंद्र और हिंदुस्तान फोटो फिल्म का कारखाना है | ऊटी मैसूर मार्ग पर 104 वर्ग किमी क्षेत्र के विस्तृत इस स्थान के गोल्फ लिकंस से सितम्बर और अक्टूबर में सूर्यास्त का दृश्य बहुत ही मनोरम होता है | उत्क्मन्द क्लब और जिमखाना क्लब का गोल्फ लिंक्स दर्शनीय है |

    कोटागिरी – ऊटी से 29 किमी दूर कोटागिरी में सेंट कैथरीन फाल्स , रंगास्वामी पीक और कोयानाद व्यू देखने योग्य है |

    एल्वा हिल्स – ऊटी से करीब घंटे भर पैदल चलकर यहाँ जाया जा सकता है | इस पहाडी से शहर और घाटी के खुबसुरत नजारे का आनन्द लिया जा सकता है |

    एवेलांच – ऊटी से 25 किमी दूर इस वन क्षेत्र में टहलने-घुमने का अलग आनन्द है | एवलांच नदी में लोग मछली मारने का आनन्द लेते है | इसके अतिरिक्त फ्रोजन हिल , पिकारा डैम और स्नोडेन भी देखने लायक स्थान है |

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