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वाराणसी की प्रमुख पर्यटन स्थल | Varanasi Tour Guide in Hindi

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Varanasi Tour Guide in Hindi
Varanasi Tour Guide in Hindi

धार्मिक विशिष्टताओ के साथ ही सांस्कृतिक जीवंतता के कारण भारतीय पर्यटक एवं विदेशी पर्यटकों के मुख्य आकर्षण के केंद्र के रूप में विख्यात वाराणसी (Varanasi) गंगा के अर्द्धचन्द्राकार तट पर बसा यह नगर विश्व के एतेहासिक स्थानों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है | वाराणसी (Varanasi) का वास्तविक एवं पौराणिक नाम काशी है जिसका अर्थ है तेज | ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में इसे बनारस नाम दिया गया | स्वतंत्रता के पश्चात करुणा एवं असी नदियों के बीच बसे इस नगर का नाम इन दोनों नदियों के नाम पर वाराणसी रख दिया गया |

“गलियों और मन्दिरों का शहर” के नाम से जाना जाने वाला यह नगर अनेक रुढियो , मान्यताओं , विश्वासों , अंधविश्वासों , आस्तिको ,नास्तिको , जोगी ,फकीरों ,दानियो-भिखारियों , पंडे-पुजारियों का यह अनूठा शहर ज़िंदादिली से भरा अलमस्त शहर है | इस धरती ने जहा कबीरदास , महारानी लक्ष्मीबाई , मुंशी प्रेमचन्द जैसी विभूतियों को जन्म दिया वही रविदास , तुलसीदास , भगवान बुद्ध जैसे महापुरुषों ने इसे अपनी साधनास्थली बनाया | हिन्दू समाज के धर्मभीरु लोग आज भी इस जीवंततापूर्ण शहर में मृत्यु की कामना में निवास करते है |

यहाँ आने वाले पर्यटकों में भारतीयों के अलावा काफी बड़ी संख्या विदेशी सैलानियों की भी होती है | अनेक विदेशी तो साल के 10 महीने यही गुजारते है और यही की माटी में बनारसी बन कर ढ़ह जाते है | बदलते समय के साथ साथ आधुनिकता की मार ने वाराणसी को भी अपनी चपेट में ले लिया है | बढती हुयी आबादी , गन्दगी और प्रदूषण से जहां इसका सौन्दर्य नष्ट हो रहा है वही इस शहर की पतली और संकरी सडके अब छोटी पड़ने लगी है | रिक्शे वालो की टेढ़ी-मेढ़ी और मनचाली चाल से यातायात घंटो जाम रहता है | संकरी गलियों में सफाई की कारगर व्यवस्था न होने से नालियाँ बजबजाती रहती है और स्थान स्थान पर गाय-भैंसों का मल-मूत्र बिखरा रहता है |

वाराणसी के दर्शनीय स्थल

वाराणासी के घाट – गंगा के तटवर्ती क्षेत्रो में बने हुए घाटो का सौन्दर्य सुबह के समय अपनी छटा बिखेरता है | सुबहे बनारस का सुंदर दृश्य मन को शान्ति प्रदान करता है | अपने वाराणसी प्रवास के दौरान एक दिन सूर्योदय से एक घंटा पूर्व ही दशाश्वमेध या राजेन्द्रप्रसाद घाट से नौका लेकर नौका विहार अवश्य करे | नौका चालको से किराया पहले ही तय कर ले |

काशी विश्वनाथ मन्दिर – नौका-विहार तथा घाटो के अवलोकन के पश्चात निकट के काशी विश्वनाथ मन्दिर को देखा जा सकता है | मुगल आक्रमकता के शिकार इस मन्दिर के वर्तमान स्वरूप का निर्माण 1717 में महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने कराया था | सन 1889 में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने 15.5 मीटर ऊँचे इस मन्दिर के शिविर को 820 किलोग्राम के स्वर्ण पत्रों से मंडित करवाया था | वर्तमान में सुरक्षा की दृष्टि से इस मन्दिर के सभी मार्गो पर धातु खोजी यंत्रो से तलाशी की जाती है | अत: अपने साथ कोई झोला या सामान ल ले जाए तो अच्छा है | मन्दिर से सटी हुयी विश्वनाथ गली में साड़ियो एवं कलात्मक वस्तुओ की बहुत सी दुकाने है जिनमे बिना मोलभाव किये सामान न खरीदे |

ज्ञानवापी मस्जिद – प्राचीन विशेश्वर मन्दिर को ध्वस्त कर मुगल शासक औरंगजेब ने इस मस्जिद का निर्माण करवाया था | इस मस्जिद की पश्चिमी दीवार पर आज भे प्राचीन मन्दिर के अवशेष दिखाई देते है जो प्राचीन शिल्प कला का उत्कृष्ट उदाहरण है | अयोध्या विवाद के बाद इस मस्जिद के चारो ओर रात -दिन सुरक्षा के प्रबंध किये गये है |

भारत माता मन्दिर – वाराणसी रेलवे स्टेशन से मात्र 1 किमी दूरी पर महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में स्थित भारत माता मन्दिर राष्ट्ररत्न बाबू शिव प्रसाद गुप्त द्वारा बनवाया गया था जिसका उद्घाटन 1936 में महात्मा गांधी ने किया था | इस मन्दिर में संगमरमर के घनाकार पत्थरों को तराशकर अविभाजित भारत का त्रिआयामी मानचित्र बनाया गया है जिसमे पर्वतों ,मैदानी क्षेत्रो और समुद्रो को उनकी उंचाई एवं गहराई के अनुपात में प्रदर्शित किया गया है |

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय – 3 हजार एकड़ में फैला यह एशिया का सबसे बड़ा आवासीय विश्वविद्यालय है | पंडित मदनमोहन मालवीय ने चंदा माग माँग कर शिक्षा के इस केंद्र की स्थापना की थी | यहाँ कला ,विज्ञान , संगीत ,संस्कृत , भाषा ,अभियांत्रिकी , चिकित्सा विज्ञान तथा संगंणक के विविध विषयों की उच्चस्तरीय शिक्षा दी जाती हा | इसी विश्वविद्यालय  के परिसर में बिडला द्वारा निर्मित संगमरमर का विशाल विश्वनाथ मन्दिर भी देखने योग्य है | इसी विश्वविद्यालय में स्थित सर सुंदरलाल चिकित्सक , चिकित्सा की आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित है जहां पूर्वी उतर प्रदेश ,विहार तथा नेपाल तक से रोगी अपना इलाज कराने आते है | विश्वविद्यालय में भारत कला भवन संग्रहालय तथा मालवीय भवन देखने लायक है |

रामनगर दुर्ग –  काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 2 किमी गंगा नदी के पार स्थित यह किला पूर्व काशी नरेश का पैतृक निवास है | किले के एक हिस्से में एक संग्रहालय है जिसमे तत्कालीन राजसी वैभव को देखा जा सकता है | पुराने जमाने में हथियार ,तीर-तलवार ,बंदूके और दरबारी शानो शौकत को इस संग्रहालय में बखूबी दर्शाया गया है | इस संग्रहालय में स्तिथ धर्म घड़ी तिथि , वार ,नक्षत्र ,सूर्योदय ,चन्द्रोदय आदि की ठीक ठीक जानकारी देती है | रामनगर पडाव मार्ग के दाहिनी ओर एक भव्य दुर्गा मन्दिर है जिसमे पत्थरों पर बहुत सी मुर्तिया और बारीक नक्काशी बनाई गयी है | इसके अतिरिक्त रामनगर की रामलीला भी विश्व प्रसिद्ध है | सितम्बर-अक्टूबर में होने वाली यह रामलीला आज भी पुरानी परम्पराओं की याद को ताजा कर देती है |

अन्य दर्शनीय स्थल – अस्सी घाट के निकट ही गोस्वामी तुलसीघाट है जहां उन्होंने रामचरितमानस के आखिरी अंशो एवं विनय पत्रिका की रचना की थी | इसी स्थान पर उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दिन बिताए थे | तुलसीघाट के निकट ही महारानी लक्ष्मीबाई की जन्मस्थली है जहां उन्होंने बचपन के दो वर्ष बिताये थे | आज भी यह स्थान सरकार की उदासीनता से उपेक्षित पड़ा है | इन स्थानों के अतिरिक्त दुर्गा मन्दिर  -तुलसी मानस मन्दिर ,संकट मोचन मन्दिर ,अन्नपूर्णा मन्दिर तथा विशालाक्षी मन्दिर भी दर्शनीय है | वाराणसी से 45 किमी दक्षिण में मिर्जापुर जनपद में बाबू देवकी नन्दन खत्री के उपन्यास चन्द्रकान्ता में वर्णित चुनारगढ़ स्थित है जो प्राचीन स्थापत्य कला तथा चीनी मिटटी के बर्तनों के लिए प्रसिद्ध है |वाराणसी से 70 किमी की दूरी पर राजदरी एवं देवदरी जल प्रपात भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है |

कैसे जाये

रेलमार्ग से वाराणसी भारत के छोटे बड़े नगरो से उत्तर तथा पूर्वी रेलवे से जुड़ा है | यहाँ का मुख्य रेलवे स्टेशन वाराणसी केंट है और सहायक रेलवे स्टेशन मुगलसराय है जो पूर्वी रेलवे से जुड़ा है | सड़क मार्ग से वाराणसी राष्ट्रीय राजपथ संख्या 27 एवं 29 पर स्थित है तथा देश के विभिन्न भागो से जुड़ा हुआ है | यहाँ से बस स्टैंड केंट रेलवे स्टेशन के निकट स्तिथ है जहां से बिहार , मध्यप्रदेश और सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश के लिए सीधी बस सेवाए उपलब्ध है |

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