सिंदबाद जहाजी की तीसरी यात्रा The Third Voyage of Sinbad the Sailor

The Third Voyage of Sinbad the Sailorअब सिंदबाद जहाजी ने अपनी तीसरी यात्रा की कहानी सुनाना शुरू किया | मेरी तीसरी कहानी पहली कहानियों से ज्यादा रोमांचक है | मै दुसरी यात्रा के आराम से अपनी जिदंगी गुजार रहा था लेकिन मेरी रूह मुझे अगली यात्रा के लिए प्रेरित कर रही थी | इसलिए एक बार फिर मैंने अपना सामान लिया और एक विशाल जहाज में सवार हो गया |हर बार की तरह हम एक टापू से दुसरे टापू और रक देश से दुसरे देश व्यापार करने लगे | एक दिन समुद्र में भयंकर तूफ़ान आया और हमारा कप्तान ये देखकर घबरा गया | उसने सभी साथियों को जोर लगाकर जहाज को संभाले रखने को कहा | मैंने उससे पूछा कि एकदम इतना भयंकर तूफ़ान कैसे आ गया |

loading...

जहाज के कप्तान ने बताया “अल्लाह हमारी रक्षा करे , हवाए बहुत जोरो से चल रह रही है और हमारा भाग्य हमे वानरपर्वत की ओर ले जा रहा है जहा से आज तक कोई बचकर वापस नही आया , हमारा काल अब सामने आ गया है ” | हमारे कप्तान के इतना बोलते ही बहुत सारे बन्दर हमारे जहाज की ओर बढ़ने लगे और हमारे जहाज को घेर लिया | उनकी सख्या इतनी थी कि उन्होंने पुरे जहाज को चारो ओर से घेर लिया | हमे डर था कि अगर हमने एक भी बन्दर को नुकसान पहुचाया तो वो सभी मिलकर हमको मार देंगे | हमे अब अपने माल का भी डर लग रहा था | हम ना तो उनकी भाषा समझ पा रहे थे और वो ना हमारी भाषा समझ पा रहे थे | वो बन्दर बहुत ही खूंखार और विशाल थे और उन्होंने पुरे जहाज सहित सारा माल को उठा लिया और हमे उस टापू के किनारे छोड कर चले गये |

अब हम उस टापू पर बिना जहाज के थे और हमे ये भी पता नही था कि वो सारे बन्दर कहा गये | अब हम उस टापू पर आगे बढे और भोजन की तलाश करने लगे | हमे कुछ दूरी पर पानी भी मिल गया और हमने फल खाकर दिन निकाला|  अब हमने उस टापू के बीच में एक घर देखा जो कि उजाड़ लग रहा था | हमने सोचा कि रात बिताने के लिए उस जगह पर जाना ही पड़ेगा इसलिए हम सब तेजी से उस घर की ओर बढ़ने लगे | हमे पास जाकर पता चला कि वो तो एक महल था जिसकी उची उची दीवारे थी जो उस समय खुला हुआ था | हम उस महल के अंदर चले गये जहा पर एक विशाल पत्थर की बेंच थी | वहा पर खाना बनाने का सामान भी था जिसके पास हड्डिया बिखरी हुयी थी लेकिन हमे वहा पर के भी इन्सान दिखाई नही दिया |

हम वहा पर बैठे और कुछ देर आराम किया | शाम होते ही धरती कांपने लगी और हमे अजीबोगरीब आवाजे आना शुरू हो गयी | एक विशालकाय आदमी उस पहाड़ की चोटी से नीचे उतरा जो बहुत ही खतरनाक लग रहा था | अब हम सभी मरने का बहाना कर लेट गये | वो विशालकाय आदमी थोड़ी देर तक उस विशाल बेंच पर बैठा और मेरे पास आकर मुझे उठा लिया | उसके हाथो में मै मसला जा रहा था और कुछ देर बाद उसने मुझे दुबला समझकर नीचे छोड़ दिया | इसके बाद एक के बाद एक आदमियों को उठाता गया और छोड़ता गया | अंत में हमारे जहाज के कप्तान की बारी आयी जो हमारे जहाज पर सबसे मोटा आदमी था | उसने हमारे कप्तान को मसलकर रख दिया और आग जलाकर उसे भूनने लग गया | हमारी आँखों के सामने उसने कप्तान को बड़ी बेरहमी से गोश्त खा गया | उसने उसकी हड्डिया वही एक तरफ फेंक दी | अब वो वही पर सो गया और रात गुजारने के बाद वापस अपने रास्ते निकल पड़ा |

जैसे ही वो हमसे दूर चला गया तो हम आपस में बाते करने लगे कि वो विशाल नरभक्षी मानव हमे खाए इससे अच्छा तो हम पानी में डूब मरते | वहा से बच निकलने का कोई रास्ता नही दिख रहा था | अब हम सभी वहा से निकलकर किसी सुरक्षित जगह की तलाश करने लगे लेकिन हमे कोई जगह नही मिली | हमने सोचा कि बाहर जानवरों के हाथो सबको एक साथ मरने के बजाय उस किले में रहना ही ठीक है | हम सबको मजबूरी में फिर से उस किले में आना पड़ा | शाम होते ही वो विशाल नरभक्षी मानव फिर लौटा और पिछली रात की तरह ही हमारे एक आदमी को भूनकर खा गया | उसी तरह दुसरे दिन भी वो वापस निकल पड़ा |

अब हम वहा से बच निकलने का तरीका सोचने लगे | हममे से एक आदमे ने कहा हमे उसको मारने की योजना बनानी चाहिए ” | मैंने सभी को समझाया “अगर हमे उसे मारना है तो हमे यहा से कुछ लकडिया ले जाकर नौकाये बनानी होगी जिसमे कम से कम तीन लोग आ सके फिर हम उसको मारकर नौका में सवार होकर यहा से चले जायेंगे , अगर हम उसे नही मार पाए तो हम नौकाओ पर सवार होकर चले जायेंगे , अगर हम डूब गये तो कम से कम भूनने से तो बच जायेंगे और अगर बच निकले तो ये करामात ही होगी ” | सभी लोग मेरी बात पर सहमत हो गये और नौका बनाने में लग गये |

शाम होते ही वो फिर लौटा और हममे से एक को खाकर सो गया | रात में जब वो सो गया तब हम सभी जागे , हमने दो लोहे की सलाखे ली और उन्हें आग में गर्म किया | लाल होने तक सलाखों को गर्म किया और हम सभी ने हिम्मत दिखाकर उसकी आँखों में वो लोहे की सलाखे डाल दी | वो दर्द के मारे कराहने लगा और हमने उसकी आँखे फोड़ दी थी | गुस्से में आकर वो अपनी बेंच पर खड़ा हो गया लेकिन वो कुछ देख नही पा रहा था इसलिए मौके का फायदा उठाकर हम अलग अलग दिशाओ में भाग गये | वो हमको नही ढून्ध पाया और उसके रोने की आवाज से धरती काँप रही थी |  कुछ देर बार वो एक मादा विशाल नरभक्षी मानव के साथ वापस आया जो उससे भी बड़ी और भयानक थी | हम तुरंत अपनी नौकाओ की तरफ दौड़े लेकिन वो दोनों विशाल नरभक्षी मानव हम पर बड़े बड़े पत्थर फेंकने लगे | हम केवल तीन जीवित नौका तक पहुच पाए और नौका पर सवार होकर वहा से दुसरे टापू की ओर निकल गये |

अब हम एक दुसरे टापू पर उतर गये और शाम तक उस टापू पर घूमते रहे | हम वहा पर कुछ देर आराम करने लगे और जब उठे तो हमारे सामने एक विशाल सांप था उसने हममे से एक को पूरा निगल लिया और चला गया |अब हम केवल दो बच गये थे और हमे हमारी सुरक्षा के लिए डर लग रहा था | हर मौत पिछली मौत से भयानक होती जा रही थी | हम अपने आप को खुशनसीब मान रहे थे कि अब तक हम उस नरभक्षी मानव , फिर नौका में डूबने से और अंत में इस विशाल सांप से बच कर निकल गये थे | अब हम कुछ देर टापू पर घुमने के बाद फल खाकर पानी पिया और सोने के लिए सुरक्षित जगह देखने लगे |हमे एक विशाल पेड़ दिखाई दिया और हमने सोचा कि इस पेड़ पर हम सुरक्षित रह सकते है |

हम दोनों उपर चढ़ गये और मै उस पेड़ के सबसे उपर जी टहनी पर जाकर सो गया | घनी रात में वो विशालकाय सांप ढूंढते ढूंढते फिर आया और मेरे एकमात्र बचे साथी को भी निगल गया | अब मै अकेला उस पेड़ पर मरे हुए आदमी की तरह पड़ा रहा | अब मै उस पेड़ से नीचे उतरा और सोचने लगा कि उस सांप के मुह में जाने से अच्छा है कि मै समुद्र में कूदकर अपनी जान दे दु लेकिन मेरे लिए आत्महत्या करना आसान नही था | अब मैंने बचने की योजना सोचने लगा और मैंने एक योजना सोची | मैंने अपने पैरो की तरफ आड़े लकड़ी के टुकड़े लगा दिए ताकि मै उस सांप के मुह में ना आ सकू | अब शाम ढलते ही सांप फिर आया और उसने मुझे निगलने की कोशिस की लेकिन लकड़ी के टुकडो की वजह से मुझको मुह में नही ले पाया और इस तरह मेरी जान बच गयी |

उसके भय से मै पुरी रात मरे आदमी की तरह पड़ा रहा और अगली सुभ वापस उस टापू पर टहलने लगा | मैंने थोड़ी देर बार दूर से एक जहाज को देखा और मैंने पेड़ो के पत्तो को हिलाकर मदद मांगने लगा | मेरी किस्मत अच्छी थी कि कुछ यात्रियों ने मुझे देख लिया था और वो जहाज मेरे पास आया और मुझे ले गया | मैंने उन्हें अपनी पुरी कहानी सुनाई और उन्होंने मुझे खाने पीने का सामान दिया | कई दिनों बाद मैं चैन की नींद सोया था | मेरी किस्मत मुझे फिर उसी जहाज पर लायी थी जिस जहाज पर मै उस विशलाकाय पक्षी वाले टापू पर खो गया था | मैंने जहाज के सभी लोगो को नरभक्षी वानर और पक्षियों की कहानी सुनाई | उन्होंने मेरा सामान फिर लौटा दिया  |

इस तरह रास्ते में ओर अजीबोगरीब चीजे देखते हुए बगदाद पहुच गया और वापस अपने दोस्तों से मिलकर खुश होने लगा | अब मै कल तुम्हे अपनी चौथी यात्रा की कहानी सुनाऊंगा | अब सिंदबाद जहाजी ने उस हमल को 100 दीनार देकर विदा किया उर अगले दिन फिर आने को कहा |अगले दिन वो फिर आया और मैंने अपनी चौथी यात्रा की कहानी सुनाना शुरू किया |

Loading...
loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *