शिक्षक दिवस विशेष – इतिहास के पन्नो में गुरु शिष्य के रोचक प्रसंग Teacher’s Day Historical Stories in Hindi

Teacher’s Day Historical Stories in Hindi

Teacher's Day Historical Stories in Hindiमित्रो आज आज के दिन  5 सितम्बर को हर वर्ष शिक्षक दिवस के रूप में मनाते है | इसकी शुरुवात 1962 में देश के पहले उपराष्ट्रपति और भारतरत्न डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सम्मान में की गयी थी | हर छात्र एक आदर्श शिक्षक की तुलना उनसे करता है और चाहता है कि उसे भी ऐसा गुरु मिले मगर इसके लिए हमे भी एक आदर्श विद्यार्थी बनने की जरूरत है | इतिहास ऐसे महापुरुषों से भरा पड़ा है जिन्होंने गुरु शिष्य सम्बधो का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत किया है | इनके जीवन के कुछ रोचक प्रसंगो से सबक लेकर हम भी अपना जीवन श्रेष्ठ बना सकते है

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01 हस्तामलक और शंकराचार्य

9वी सदी में शकंराचार्य दक्षिण भारत का भ्रमण करते हुए श्रीबाली गाँव पहुचे  | वहा ब्राह्मण प्रभाकर को दुःख था कि 13 वर्षीय पुत्र बोलता नही था | शंकराचार्य को उसने व्यथा सुनाई | बालक को देखते आचार्य भांप गये कि वह तेजस्वी होगा | उन्होंने पूछा “तुम कौन हो ?”| उत्तर में बालक ने संस्कृत की 12 पंक्तियों में वेदांत के “स्वयं” सार की व्याख्या कर डाली | सभी चकित थे | वे आचार्य के शिष्य बने नाम रखा “हस्तामलक “| वे द्वारिका मठ के पधान बने | उनके लिखे श्लोको में स्वयं गुरु ने टिप्पणी की है |

02 स्वामी विवेकानंद और परमहंस

स्वामी जी के पिता को गुजरे कुछ समय बीते थे | उन्हें दूखी देख परमहंस ने एक धनी अनुयायी से कहा “इस दुखद पल में तुम उसकी मदद कर पाओ  तो अच्छा रहेगा “| उनके जाने के बाद विवेकानन्द बोले “क्या जरूरत थी उससे यह कहने की ?” | परमहंस आँखों में आसू भर बोले “तुम्हारे दुःख को दूर करने के लिए मै हर घर से भीख मांग ला सकता हुआ “| अपने प्रति गुरु का यह प्रेम देख तुंरत स्वामी जी ने क्षमा माँगी |

03 शिवाजी महाराज और स्वामी रामदास

शिवाजी अपने गुरु रामदास स्वामी को बहुत मानते थे | गुरु रामदास ने ही उन्हें क्षत्रिय धर्म का अनुसरण करने की सलाह दी थी | गुरु रामदास भी लोगो को शिवाजी का साथ देने के लिए प्रेरित करते थे | एक बार शिवाजी से मिलने गुरु रामदास सिघंन वाडी आये | आशीर्वाद देकर प्रसाद के रूप में नारियल के अलावा मुट्ठी भर मिटटी , कंकड़ , घोड़े का गोबर भी प्रदान कर गये | शिवाजी ने इनका तात्पर्य निकाला – मिटटी को धरती , कंकड़ को किले और गोबर को हृष्टपुष्ट घोड़े | इने चीजो का महत्व समझने के कारण महाराज के जीवन में कभी भी इन चीजो की कमी नही रही |

04 तानसेन और हरिदास

एक बार शंहशाह अकबर ने तानसेन के गुरु से मिलने की इच्छा जताई | तानसेन बोले “मेरे गुरु आपके आदेश पर नही गायेंगे , वे स्वछन्द पक्षी की तरह गाना पसंद करते है हम उन्हें छिप कर सुनेगे “| अगले दिन वे गुरु की कुटिया की ओर निकल पड़े | तानसेन के गुरु हरीदास फकीर थे | वे दोनों की उपस्थिति से अनिभिज्ञ मुक्त कंठ से गाने लगे | उनकी मधुर आवाज सुनकर बादशाह की आँखों से आंसू निकल पड़े | वे बोले “ऐसी मिठास तो तुम्हारे कंठ में भी नही “| तानसेन गुरु के प्रति नतमस्तक होकर बोले “गुरु से मेरी बराबरी नही क्योंकि मेरा संगीत बादशाह के इनाम और श्रोताओ की प्रशंशा के लिए होता है जबकि मेरे गुरु इनसे परे अपनी खुशी के लिए गाते है “|

05 भगवान महावीर और प्रसन्नजीत

एक बार राजा प्रसन्नजीत ठाठ बाट और सेवको के साथ भगवान महावीर के पास पहुचे | उन्हें नमन करने के बाद आने के कारण बताया “प्रभु मुझे जीवन का हर सुख प्राप्त है अब मै तप करना चाहता हु इसकी प्राप्ति के लिए अपना खजाना खोल सकता हु”| भगवान महावीर मुस्कुराते हुए बोले “राजन ,तुम्हारे राज्य में एक गरीब व्यक्ति तप कर रहा है वह मुझसे ज्यादा तुम्हारी मदद कर पायेगा “| राजा ने उस व्यक्ति को ढूंड निकाला और अपनी बात दोहराई | उस गरीब आदमी ने सकुचाते हुए मना कर दिया | “ऐसा क्यों ” राजा ने चौंक कर पूछा | गरीब आदमी बोला “महाराज तपस्या नित्य प्रयत्न से ही प्राप्त कर सकते है संसार में कोई धन इसे नही खरीद सकता , आपके लिए अपने प्राण  त्याग सकता हु परन्तु अपने मन के भावो को कैसे बांटू “| राजा समझ गये कि ध्यान और तप मोल भाव से प्राप्त नही होंगे | खुद का प्रयास से मिलेंगे |  वो बाद म इ भगवान महावीर की शरण में चले गये |

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