Srinivasa Ramanujan Biography in Hindi भारत के महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन की जीवनी

Srinivasa Ramanujan Biography in Hindi

Srinivasa Ramanujan Biography in HindiSrinivasa Ramanujan श्रीनिवास रामानुजन भारत के महान गणितज्ञ थे जिन्होंने 20वी सदी में गणित के क्षेत्र में पुरे विश्व में भारत का नाम रोशन किया था  | हालांकि उनको शुद्ध गणित की कोई शिक्षा नही ली थी इसके बावजूद उन्होंने कुछ ऐसे गणित के सूत्र निकाले जिसे देखकर दुनिया दंग रह गयी | Srinivasa Ramanujan रामानुजन ने अपने छोटे से जीवनकाल में 3900 समीकरण हल किये थे जिसमे से सभी समीकरण एकदम सही थे |रामानुजन के कार्यो पर आधारित Ramanujan Journal नामक एक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका भी प्रकाशित हुई थी | आइये आज हम आपको उस महान गणितज्ञ Srinivasa Ramanujan की जीवनी से रुबुरु करवाते है |

रामानुजन का प्रारम्भिक जीवन

Srinivasa Ramanujan श्रीनिवास रामानुजन का जन्म 22 दिसम्बर 1887 को तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी में आने वाले इरोड नामक गाव में अपने ननिहाल में एक तमिल ब्राह्मण परिवार में हुआ था | उनके पिता श्रीनिवास इयेंगर तंजावुर जिले के एक साड़ी की दूकान पर मुनीम का काम करते थे | उनकी माँ कोमलतामल एक गृहणी थी जी स्थानीय मन्दिर में अक्सर भजन गाया करती थी | Srinivasa Ramanujan श्रीनिवास रामानुजन का बचपन कुम्ब्कोनम कस्बे के सारान्गाप्नी मार्ग पर स्तिथ उनके पारम्परिक घर में बीता था जिसे आज एक म्यूजियम में तब्दील कर दिया गया है |

जब Srinivasa Ramanujan रामानुजन डेढ़ वर्ष के हुए तब उनकी माँ ने सदगोपन नामक दुसरे बच्चे को जन्म दिया जो केवल जन्म के 3 महीने बाद ही मर गया था | दिसम्बर 1889 में रामानुजन को चेचक हो गया था लेकिन उनके जिले में उस वर्ष हजारो चेचक के रोगियों में से रामानुजन बच गये थे जबकि हजारो लोगो की चेचक की वजह से मौत हो गयी थी | इसके बाद वो त्त्ल्कालीन मद्रास के कांचीपुरम में अपनी माँ के साथ अपने ननिहाल आ गये थे | नवम्बर 1891 और 1894 में दो बार उनकी माँ ने दो बच्चो को जन्म दिया था लेकिन दोनों की ही बचपन में ही मौत हो गयी थी |

1 अक्टूबर 1892 को Srinivasa Ramanujan रामानुजन को स्थानीय स्कूल में दाखिला दिलाया गया लेकिन कुछ दिनों बाद ही उनकी नाना  की कांचीपुरम के अदालत अधिकारी की नौकरी छुटने के बाद वो वापस अपनी माँ के साथ कुम्बनकोनम आ गये जहा पर उनका दाखिला कन्ज्ञान प्राइमरी स्कूल में करवाया गया | जब रामानुजन के दादाजी की मौत हुयी तब उन्हें वापस अपने नाना के यहा मद्रास में रहने को भेज दिया गया | रामानुजन को शुरुवात से ही स्कूल में रूचि नही थी और वो स्कूल जाने से बचते रहते थे | उनके परिवार एक स्थानीय कांस्टेबल को उसक ध्यान रखने को कहा कि वो स्कूल जा रहा है या नही | छ: महीने बाद फिर रामानुजन कुम्बनकोनम आ गये |

हालांकि रामानुजन के पिता दिन के अधिकतर समय अपने काम में व्यस्त रहते थे और उनकी माँ उनका ख्याल रखती थी | अपनी  माँ से Srinivasa Ramanujan रामानुजन ने अपनी संस्कृति और पुरानो की शिक्षा ली थी | उनकी माँ ने उनको भजन गाना सिखाया और उन्हें पूजा के लिए मन्दिर ले जाते ठी | कंज्ञान प्राइमरी स्कूल में रामानुजन ने अच्छे अंक प्राप्त किये | 10 वर्ष पूरा होने से पहले ही नवम्बर 1897 में उन्होंने अंग्रेजी ,तमिल ,भूगोल और अंकगणित में प्राथमिक शिक्षा पूर्ण कर ली थी | अपने अंको की बदौलत वो जिले में प्रथम आये थे | उसी साल रामानुजन ने कस्बे के उच्च माध्यमिक स्कूल में प्रवेश लिया जहा उन्हें पहली बार औपचारिक गणित पढाई गयी |

बचपन में उनके जीवन की एक घटना है जिससे पता चलता है कि उन्होंने गणित में बचपन से ही रूचि दिखाना शुरू कर दिया था | एक दिन जब वो तीसरी कक्षा में थे तब कक्षा में शिक्षक ने ब्लेकबोर्ड पर तीन आम के चित्र अंकित किये और सभी छात्रों से प्रश्न किया कि यदि हमारे पास तीन आम हो और तीन छात्र हो ,तो प्रत्येक छात्र के हिस्से में कितने आम आयेंगे ? आगे की पंक्तियों में बैठे छात्रों ने उसी समय उत्तर दिया कि प्रत्येक छात्र को एक एक आम मिलेगा | इसके बाद शिक्षक के भाग सिखाने पर जोर दिया तभी बालक श्रीनिवास रामानुजन ने प्रश्न किया कि “सर यदि कोई भी आम किसी को ना बांटा जाए तो क्या तब भी प्रत्येक छात्र को एक आम मिल सकेगा ?”

सभी छात्र इस प्रश्न को सुनकर हंस पड़े क्योंकि उनकी दृष्टी में यह प्रश्न मूर्खतापूर्ण था |शिक्षक महोदय ने अपनी मेज जोरो से थपथपाई और छात्रों से कहा कि “इसमें हंसने की क्या बात है ? यह बच्चा जानना चाहता  है कि अगर शून्य को शून्य से विभाजित किया जाए , तो भी क्या परिणाम एक ही होगा ” | फिर उन्होंने इस प्रश्न को समझाते हुए कहा कि “बच्चो इसका उत्तर शून्य ही होगा , इस छात्र ने जो प्रश्न किया है ,इसका उत्तर खोजने के लिए गणितज्ञो को सैकड़ो वर्ष का समय लगा था , कुछ गणितज्ञो का मत था कि यदि शून्य को शून्य से विभाजित कर दिया जाए ,तो उत्तर शून्य ही होगा  पर कुछ के विचार इसके भिन्न थे , उनके विचारानुसार इसका उत्तर एक होगा , वास्तव में इस प्रश्न का उत्तर भारत के महान गणितज्ञ भास्कर ने प्रमाणित किया था कि शून्य को शून्य से विभाजित करने का परिणाम अनन्ता होगा  “|

इस तरह Srinivasa Ramanujan रामानुजन ने बचपन से ही गणित में रूचि दिखाना शूर कर दिया था | 13 वर्ष की आयु में ही उन्होंने लोनी कृत प्रसिद्ध Trigonometry को हल कर दिया था | 16 वर्ष की आयु में उन्होंने G. S. Carr. कृत “A Synopsis of Elementary Results in Pure and Applied Mathematics” की 5000 प्रमेयो को प्रमाणित करके दिखाया था और इन्ही के आधार पर कुछ नई प्रमेय विकसित की थी |  1904 में उन्होंने Bernoulli numbers की खोज की | जब 1904 में वो Town Higher Secondary School से ग्रेजुएट हुए तब रामानुजन को स्कूल के प्रधानाध्यापक ने गणित में विशिष्ट उपलब्धि के लिए “रंगनाथ राव पुरुस्कार” प्रदान किया |

मद्रास विश्वविद्यालय की ओर से Srinivasa Ramanujan रामानुजन को छात्रुवृति दी गयी लेकिन अगले वर्ष उन्होंने गणित में इतना ध्यान दिया कि वो गणित को छोडकर अन्य सभी विषयों में फेल हो गयी परिणामस्वरूप उनसे छात्रुवृति छीन ली गयी | गणित में पागलो की तरह रूचि लेते देख उनके पिता अक्सर उन्हें डांटते रहते थे | अगस्त 1905 में वो घरवालो से परेशान होकर विशाखापत्तनम चले गये जहा वो एक महीने तक राजमुंदरी रहे थे | वापस घर लौटने पर उनको मद्रास के पचैय्पाकॉलेज में दाखिला करवाया | इस बार फिर वो गणित में अच्छे नम्बर लाये लेकिन अन्य विषयों में बहुत कम नम्बर आये | 1906 में रामानुजन  Fellow of Arts की परीक्षा में लगातार दो सालो तक फेल होते गये | इसी कारण उन्होंने बिना डिग्री के कॉलेज छोड़ दिया आयर गणित में अपनी स्वतंत्र खोज में लग गये गये | इस दौरान उन्होंने जीवन के सबसे बुरे दिन गरीबी में बिताये थे और अक्सर उन्हें भुखमरी का सामना करना पड़ता था |

Adulthood in India

अपने बेटे की मति सुधारने के लिए रामानुजन के पिता ने उनका विवाह दस वर्षीय श्रीमती जानकी से कर दिया | अब रामानुजन पर गृहस्थ जीवन का दायित्व आ गया था और दुसरी तरफ उनको गणित पर कार्य करने के लिए उनके पास इतने पैसे भी नही थे कि वो अपने गणित के कार्यो के लिए कागज खरीद सके इसलिए उन्होंने नौकरी ढूँढना शूरू कर दिया | इसी दौरान उनको hydrocele testis नामक एक बीमारी हो गयी जिसके लिए ऑपरेशन की जरूरत थी | अब ऐसे कठिन समय पर भी उनके परिवार में ऑपरेशन के पैसे नही दिए तब जनवरी 1900 में एक डॉक्टर ने उनकी मुफ्त में सर्जरी की |

सर्जरी के बाद वो फिर काम की तलाश करने लगे गये | वो कुछ समय तक अपने दोस्तों के साथ रहे और मद्रास में दर दर भटकते रहे | कुछ समय तक उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज के छात्रों को ट्यूशन कराकर पैसे कमाए थे |  1910 के अंत में वो फिर बीमार हो गये शायद वो सर्जरी का ही परिणाम था | अब उन्हें अपने स्वास्थ्य की चिंता सताने लगी थी और उन्हें ऐसा लग रहा था कि मौत अब सामने खडी इसलिए उन्होंने अपने मित्र को अपने गणित के कार्यो को गणित के पारखी प्रोफ़ेसर को देने को कहा दिया था | लेकिन विधाता को कुछ ओर ही मंजूर था , के बार फिर रामानुजन उस बीमारे से उबरे और उन्होंने अपने मित्र अय्यर से फिर वो सारे गणित के कार्य वापस लिए और विल्लपुरम चले गये |

Life in England and Inventions

Srinivasa Ramanujan रामानुजन ने कुछ समय तक 25 रूपये महीना में लिपिक का काम भी किया था | अंत में कुछ शिक्षाशास्त्रियों ने रामानुजन के कार्य से प्रभावित होकर उन्हें 75 रूपये की छात्रवृति प्रदान कर दी | इन्ही दिनों कैंब्रिज विश्वविद्यालय क्र प्रसिद्ध गणितज्ञ जी.हार्डी को 120 प्रमेय शोध कार्य से संबधित पत्र के साथ भेजी | जीएच.हार्डी और उनके साथियो को कार्य की गहराई परखने में देर ना लगी | उन्होंने तत्काल रामानुजन को कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में बुलाने का प्रबध कर दिया | हार्डी के निमत्रंन पर रामानुजन 17 मार्च 1914 को रामानुजन ब्रिटेन के लिए जलयान से रवाना हो गये |

Srinivasa Ramanujan रामानुजन ने करीब पांच साल तक कैंब्रिज में काम किया था |उनका गणितीय ज्ञान तत्ल्कालीन गणितीय ज्ञान से अधिक उन्नत था | सूत्रों को हल करने की उनके विधिया इतनी जटिल होती थी कि गणित की पत्रिकाए भी उनमे उलझ जाती थी | बरनौली संख्याओं पर उनका पहला रिसर्च पेपर जो Indian Mathematic Society से प्रकाशित हुआ था ,संपादक ने तीन बार लौटाया था | |रामानुजन की प्रतिभा का इस्तेमाल हार्डी ने बखूबी किया | हार्डी ने रामानुजन को समुचित मान्यता और सम्मान भी दिलाया | बाद में दोनों ने मिलकर अनेक रिसर्च पेपर प्रकाशित करवाए |

1916 में उन्हें अपनी खोजो के लिए Bachelor of Science की डिग्री दी गयी जिसे बाद में Phd के नाम से जाना जाने लगा | रामानुजं को श्रेष्ट संख्या संबधी कार्यो के लिए 28फरवरी 1918 को रॉयल सोसाइटी , लन्दन का फैलो बना दिया और इस पद को प्राप्त करने वो दुसरे भारतीय थे  | 1918 ने अक्टूबर मास में Srinivasa Ramanujan रामानुजन को ट्रिनिटी कॉलेज का फैलो चुन लिया गया | इस सम्मान को प्राप्त करने वाले वो प्रथम भारतीय थे | Srinivasa Ramanujan रामा नुजन के बीजगणित पर किये गये रिसर्च कार्य विश्वविख्यात युलर ओरेजेकोबी की श्रेणी में रहे है |

रामानुजन के सारे शोध संख्याशास्त्र पर आधारित थे | उनके प्रमुख गणितीय कार्यो में से एक है – किसी संखया के विभाजनो की संख्या ज्ञात करने के फोर्मुले की खोज | उदाहरण के लिए संख्या 5 के कुल विभाजनो की संख्या सात है [5+0, 4+1, 3+1+1 , 2+1+1+1, 1+1+1+1+1, 2+2+1] रामानुजन के फोर्मुले से किसी भी संख्या के विभाजन की संख्या ज्ञात की जा सकती थी | रामानुजन ने संख्या सिद्धांत , हाईपर , ज्योमैत्रिक श्रेणी , इलिप्तिक फलन जैसे उच्च गणित के क्षेत्रो में बहुत लोक प्रिय थे |

Illness and death

वैसे तो Srinivasa Ramanujan रामानुजन अपने पुरे जीवन में बीमारियों से लड़ते रहे और अब तो वो विदेश में रह रहे थे | Srinivasa Ramanujan रामा नुजन विदेशो के मौसम और जलवायु को आत्मसात ना कर सके जिसके कारण उन्हें क्षय रोग हो गया | वो रोग से पीड़ित होकर वापस 1919 में वापस भारत आ गये और 26 अप्रैल 1920 को मात्र 32 वर्ष की आयु में दुनिया से विदा हो गये | उनका निधन मद्रास के चैटपेट नामक स्थान पर हुआ था | उनकी मौत के बाद उनकी पत्नी पहले मुम्बई आ गयी थी लेकिन 1950 में वापस चेन्नई आ गयी थी जो 1994 तक 95 वर्ष की उम्र तक जीवित रही थी | Srinivasa Ramanujan रामानुजन के सम्मान और याद में देश के गणितज्ञो के लिए रामानुजन पुरुस्कार की स्थापना की गयी और रामानुजन इंस्टीट्यूट भी स्थापित किया | इस महान गणितज्ञ के कार्यो से मिले भारत के सम्मान को भारत कभी नही भुला सकता है |

loading...
Loading...

One Comment

Leave a Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *