श्री श्री रविशंकर की जीवनी Sri Sri Ravi Shankar Biography in Hindi

Sri Sri Ravi Shankar Biography in Hindi

Sri Sri Ravi Shankar BiographySri Sri Ravi Shankar श्री श्री रविशंकर भारत के एक आध्यात्मिक गुरु है जो एक धार्मिक नेता और Art of Living Foundation के संस्थापक है | 1981 म३ उन्होंने अपने आर्ट ऑफ़ लिविंग फाउंडेशन के माध्यम में देश विदेश के कई लोगो को खुश रहने की कला सिखाई है जिससे करोड़ो लोग के जीवन पर असर पड़ा है | उनके इस सराहनीय कार्य के लिए उनको 2016 में पद्म विभुष्ण से भी सम्मानित किया गया है | उनहोंने विश्व के कई देशो में अपने संदेश को पहुचाया और उनके पुरे विश्व में अनेको अनुयायी है | आइये आपको आनन्दमूर्ति Sri Sri Ravi Shankar  श्री श्री रविशंकर की जीवनी और कार्यो से रूबरू करवाते है  |

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Early Life of Sri Sri Ravi Shankar श्री श्री रविशंकर का प्रारम्भिक जीवन

Early Life of Sri Sri Ravi ShankarSri Sri Ravi Shankar  श्री श्री रविशंकर का जन्म 13 मई 1956 को भारत के तमिलनाडू राज्य के पापनासम नामक स्थान पर हुआ | श्री श्री के पिता का नाम आर.एस.वेंकट रमन और माता का नाम विसलक्षी रत्नम था | उनके पिता पश्चिमी शिक्षा प्राप्त आधुनिक विचारधारा के उदारवादी सुधारक थे और माता रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार से थी | उनका नाम रवि इसलिए रखा गया क्योंकि उनका जन्म रविवार के दिन हुआ था और उसी दिन आदि गुरु शंकराचार्य की भी जन्मदिन था इसलिए उनके नाम के आगे शंकर लगा | इस तरह उनका बचपन में पूरा नाम रविशंकर था | एक बार उनसे किसी ने पूछा कि वो दो बार श्री क्यों लगते है तो उन्होंने उत्तर दिया कि “108 बार श्री श्री बहुत लम्बा हो जाता है “| ये तो व्य्ग्यांत्म्क तर्क था लेकिन शायद सितारवादक प.रविशंकर से खुद को अलग बनाने के लिए उन्होंने दो बार श्री लगाया था |

Sri Sri Ravi Shankar  रविशंकर के प्रथम गुरु भारतीय वैदिक विद्वान सुधाकर चतुर्वेदी थे जो महात्मा गांधी के भी काफी करीबी थे | उनके बारे में लोगो को बचपन से ही पता चल गया था कि ये एक महान वव्यक्ति बनेगे क्योंकि वो हमेशा भक्ति में लीन रहते थे | बचपन से वो गीता का पाठ करने लग गये थे | जब श्री श्री चार वर्ष के हुए तब उनके माता पिता उनको तांगाम्मा के पास ले गये जो उनको संस्कृत पढ़ाती थी | श्री श्री बचपन से ही श्लोको को इतनी आसानी से पढ़ लेते थे जबकि उन्होंने पहले कभी श्लोक नही पढ़े थे | चार वर्ष की आयु तक तो उनको भगवतगीता कंठस्थ कर ली थी | उनके शिक्षक भी उनकी प्रतिभा को देखकर दंग रह जाते है |

Sri Sri Ravi Shankar  श्री श्री इतने चमत्कारी बालक थे कि उनकी प्रतिभा को देखकर शिक्षको ने उन्हें प्रथम कक्षा की बजाय सीधा तीसरी कक्षा में रख दिया था | वो शिक्षा के मामले में अपनी आयु से ज्यादा अनुभवी लगते थे | एक बार जब वो लगभग पांच साल के थे तब एक वृद्ध पंडित उनके घर पर आये और उनके सामने कुछ मुर्तिया रखी और पसंद करने को कहा | श्री श्री ने उन मूर्तियों में से शिवलिंग और चांदी का सांप को पसंद किया जो दक्षिण भारत के प्रसिद्ध संत मुथुस्वामी के परिवार के थे | उन पंडित ने तब भविष्यवाणी की थी कि ये बालक बड़ा होकर सत्य और धर्म का रक्षक बनेगा और पुरी दुनिया में अपना नाम रोशन करेगा |

पंडित सुधाकर चतुर्वेदी ने श्री श्री के अलावा किसी को संस्कृत नही पढाई थी | पंडित जी ने जब श्री श्री को गीता का प्रथम अध्याय का अध्ययन कराया तो उनकी आँखों से आंसू निकल गये थे | नौ वर्ष की उम्र में श्री श्री वेदों के ज्ञाता बन गये थे |श्री श्री पढने के साथ साथ शरारते भी करते थे | एक बार उन्होंने अपने पिता के ब्रीफ़केस में खिलौने भर दिए थे | बाल्यकाल से ही श्री श्री रविशंकर एक विद्रोही स्वभाव के थे क्योंकि उनको अन्याय बिलकुल बर्दाश्त नही होता था | एक बार जब वो गर्मियों की छुट्टियों में नानी के यहा गये तब उन्होंने वहा गाय की देखभाल करने वाले स्वामी नाथ हरिजन को देखा जिसका घर में प्रवेश निषेध था | श्री श्री बचपन से ही इन रूढ़िवादी अछूत परम्परा के विरोधी थे |

स्वामीनाथन को घर के सभी सदस्यों के खाने के बाद भोजन दिया जाता था और बालक रवि को उसे छूने की आज्ञा नही थी | अगर ओव गलती से उसे छु ले तो उनको स्नान करना पड़ता था | स्वामीनाथन को तो अपनी स्तिथि पर कोई आपति नही थी लेकिन बालक रवि को ये बिलकुल पसंद नही था | जब उन्होंने नानी से इसका कारण पूछा तो नानी ने बताया कि वो अछूत है | यह जानने के बावजूद वो स्वामीनाथन को हाथ लगाते थे और अपना खाना उनके बच्चो को खिला देते थे | एक दिन तो वो साइकिल पर बैठकर उसके घर चले गये जिससे उनके ननिहाल में बवंडर मच गया और उन्हें अगले ही दिन बंगलौर भेज दिया गया | इसके बाद भी वो कई बार नानी के यहाँ आकर यही कम दोहराते थे

Sri Sri Ravi Shankar  रविशंकर को पूजा करने में वास्तविक आनन्द मिलता था | रविशंकर को अपनी माँ से बहुत प्रेम था जिन्हें सब अम्माजी कहकर पुकारते थे | अम्माजी ने श्री श्री के जीवन पर बहुत गहरी छाप छोडी थी | अम्माजी बारहवी कक्षा तक पढ़ी हुयी थी और संस्कृत में बहुत प्रवीन थी | उनको सभी को भोजन कराने में बहुत आनंद आता था इसलिए उन्हें “अन्नपुर्नेश्वरी ” भी कहते थे | श्री श्री ने बंगलौर यूनिवर्सिटी से विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की थी | ग्रेजुएशन के बाद रविशंकर महर्षि महेश योगी के साथ वैदिक विज्ञान पर  वार्ता और सम्मेलनों में जाने लगे थे |

Sudarshan Kriya and Art of Living Foundation

Sri Sri Ravi Shankar Biography in Hindi1980 के दशक से उन्होंने पुरे विश्व में आध्यात्मिकता पर व्यावहारिक और प्रयोगात्मक उपदेश देना शुरू कर दिया था |ऐसा कहा जाता है कि 1982 में उन्हें प्रबोध हुआ था  दस दिन तक मौन रहने के बाद उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुयी थी इसी प्रक्रिया में उन्होंने “सुदर्शन क्रिया” का ज्ञान भी पाया था | 1982 में उन्होंने अपनी संस्था के माध्यम “सुदर्शन क्रिया” का प्रचार आरम्भ किया था | उन्होंने सुदर्शन क्रिया का पहला कोर्स भारत के शिमागो में दिया था जिसमे वो मौन रहे थे | जल्द ही यह विश्व के स्वैछिक , शैक्षिक और मानवतावादी संघठनो में गिना जाने लगा |1997 में उन्होंने दलाई लामा और अन्य व्यक्तियों के साथ मिलकर International Association for Human Values (IAHV) नामक संस्था की स्थापना की थी |

1981 में Sri Sri Ravi Shankar  श्री श्री रविशंकर ने Art of Living फाउंडेशन की स्थापना की थी जो आज विश्व के 156 देशो में फ़ैल गया है |Art of Living फाउंडेशन को दुनिया का सबसे बड़ा volunteer-based NGO है 1983 में श्री श्री ने Art of Living का पहला कोर्स  स्विट्ज़रलैंड ने आयोजित किया था | इसके बाद से विदेशो में कई जगहों पर उन्होंने Art of Living के उपदेश देना शुरू कर दिया था | Art of Living का अंतर्राष्ट्रीय केंद्र बंगलोर में स्तिथ है | Art of Living के कोचीन में आयोजित Mohiniyattam dance  के समारोह को Guinness Book of Records में शामिल किया गया क्योंकि इस समारोह में एक्स साथ सबसे ज्यादा इस नृत्य को करने वाले लोगो का समूह था |

Sri Sri Ravi Shankar Humanity work and Awards

Sri Sri Ravi Shankar Peace and humanitarian work2004 में श्री श्री द्भावना मिशन के साथ पाकिस्तान गये थे जहा उन्होंने इस्लामाबाद और कराची में Art of Living केन्द्रों का उद्घाटन किया था | 2014 में उनके इस्लम सेण्टर को हथियारबंद लोगों ने जला दिया था | 2007 में वो इराक के दौरे के दौरान विश्व शांति के भ्रमण के लिए निकले थे | उन्होंने कई मुस्लिम देशो में अपने Art of Living केन्द्र बनाये थे और उन्हें विश्व के धार्मिक नेताओ के बोर्ड में भी शामिल किया गया है | 1992 में उन्होंने जेल कार्यक्रम चलाकर कैदियों को आर्ट ऑफ़ीस लिविंग के उपदेश दिए थे | वैसे उनके अधिकतर कार्यक्रम भारत से ज्यादा विदेशो में आयोजित किये जाते है |

श्री श्री रविशंकर जी चाहते है कि सभी व्यक्ति आपस एम् प्रेम से रहे | वो लोगो को एक दुसरे को स्वीकार करने और आदर करने का परामर्श देते है |वो परस्पर भाईचारे के लिए भी आग्रह करते है | उन्होंने गुर्जर आन्दोलन में भी दोनों पक्षों को किसी समझौते तक पहुचने में मदद की थी | 1986 में उन्हें भारत के राष्ट्रपति ने “योग शीरोमणि” नाम से नवाजा था | 1997 में श्री श्री रविशंकर को महाराष्ट्र सरकार ने “सुरु म्हात्म्त्य अवार्ड ” दिया था | 2009 में फ़ोर्ब्स पत्रिका में उन्हें भारत के पांचवे सबसे प्रभावशाली व्यक्ति की सूची में रखा गया था| उनके इससे मानवीय कार्यो के कारण 2016 में भारत में पद्म विभूष्णसे सम्मानित किया गया था |

श्री श्री रविशंकर के सामजिक मुद्दों पर विचार

श्री श्री ने आतंकवाद के मुद्दे पर कई बार अपने विचार प्रकट किये थे | उन्होंने बताया कि आतंकबाद भय फैलाता है और दुःख बढ़ाता है और इससे किसी को कुछ प्राप्त नही होता है | आतंकवाद के चलते जीवन मूल्यों का हनन हो जाता है | श्री श्री ने बताया कि लोग मंजिल को ना पा सकने की निराशा में आतंकवादी बन जाते है जो उसमे हिंसा भर देती है और कई निर्दोष लोगो के प्राण लेने को आतुर कर देती है | श्री श्री ने यी भी बताया कि भगवान या खुदा के लिए लड़ते हुए मरने से स्वर्ग या जन्नत मिलेगी इसके लिए लोग आतंकवादी बन जाते है | जब आतंकवादी धर्म की रक्षा के लिए जान देने के लिया तैयार हो जाता है तभी आतंकवाद का जन्म होता है | उन्होंने ये भी बताया कि आतंकवाड को केवल शिक्षा से ही खत्म किया जा सकता है | आतंकवादी हमारी तरह साधारण इन्सान ही होते है लेकिन उन्हें भ्रमित किया जाता है |

श्री श्री ने धर्म के मुद्दे पर भी कई बार अपने विचार प्रकट किये थे जिसमे वो धर्म के तीन पहलू जीवन बताते है जीवन मूल्य ,कर्मकांड और प्रतीक | उन्होंने बताया कि प्रत्येक धर्म में कुछ नियम है जिन्हें बहुत प्राचीन समय में निभाया जता था लेकिन बर्तमान में निभाना असम्भव है जैसे हिन्दू धर्म में दंड सहिंता बनी हुयी है  | कुरान में चोरी करने वाले के हाथ काट दिए जाते थे | इसाई धर्म एम् निर्धनता की शप्पथ लेनी पडती थी | जैनियों के लिए धन छुना मना था  | यहूदियों में शनिवार के दिन काम करना मना था | वो लोग जो आज भी उन्ही नियमो का पालन करते है इस युग की प्रगति को जी नही पायेंगे | धर्मान्धता तब फैलती है जब जीवन मूल्यों की बजाय धार्मिक धारणाओं को प्राथमिकता दी जाती है | असुरक्षा के साए में जीने वाले लोग धर्म के नाम पर कट्टरपंथी बन जाते है |

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