श्राद्ध पक्ष विशेष – अगर पूर्वज ना होते तो हमारा अस्तित्व ही न होता | Shradh or Pitru Paksha Significance in Hindi

Shradh or Pitru Paksha Significance in Hindi

shradh-or-pitru-paksha-significance-in-hindiगीता में 84 लाख योनियों का उल्लेख मिलता है जबकि पितरो की आयु 1000 वर्ष मानी जाती है | श्राद्ध का अर्थ ही है जो श्रद्धा से कर्म किया जाए | हमारे वेदों एवं शास्त्रों में स्पष्ट वर्णन मिलता है कि जो अपने पितरो को प्रसन्न रखने हेतु तथा शान्ति के लिए कर्म नही करता , वह नाना प्रकार के कष्टो ,ऋण ,रोग ,सन्तान कष्ट , राज कष्ट एवं भूमि कष्ट से पीड़ित होता है | अगर हमारे पूर्वज ना होते तो हमारा अस्तित्व ही न होता | जब हमारे पितर ही रुष्ट होंगे तो हमारे देवता भी हमारे समीप नही आ सकते है |

विवेक चूडामणि के अनुसार जब जीवात्मा इस स्थूल देह से पृथक होती है उस स्तिथि को मृत्यु कहते है | यह भौतिक शरीर 27 तत्वों के संघात से बना है |स्थूल पंच महाभूत एवं स्थूल कामेन्द्रियो को छोड़ने पर अर्थात मृत्यु को प्राप्त हो जाने के बाद भी 17 तत्वों से बना सूक्ष्म शरीर विद्यमान रहता है | सूक्ष्म शरीर धारी इस लोक के सतत अभ्यास के कारण परलोक में भी इन्द्रियों के विषयों की अभिलाषा करता है परन्तु उन अभिलाषाओ की पूर्ति “भोगयातन” देह न होने के कारण नही कर पता |

हिन्दू मान्यताओ के अनुसार एक वर्ष तक प्राय: सूक्ष्म जीवन को नया शरीर नहे मिलता ,इसी कारण मोह वश सूक्ष्म जीव अपने घर एवं परिजनों के इर्द गिर्द घूमता रहता है | श्राद्ध कार्य से सूक्ष्म जीवन को तृप्ति मिलती है इसलिए श्राद्ध कार्य किया जाता है | गीता में भगवान श्री कुष्ण ने कहा है कि

तस्मात् शाश्त्र प्रमाण ते कार्याकार्य व्यवस्थितौ |
ज्ञात्वो शाश्त्र विधानोक्त ,कर्म कर्तुदमहहिसि ||

अर्थात जब अनेक विधियों से पितरो की शांति की जाती है तो व्यक्ति को प्रसन्नता एवं शक्ति की प्राप्ति होती है |वेदों के अनुसार इस सृष्टि का निर्माण ब्रह्मा जी ने किया |इसके परिचालन में देव ,ऋषि एवं पितर अपने कार्य को सम्पूर्ण करते है | हर मनुष्य के अंदर अपने पूर्वजो (पितरों) के गुण योग (अंश ) होते है | हमारे पूर्वजो में प्रथम शरीर निर्माता पिता के २६ गुण फिर उसके पिता (दादा) के १६ गुण (अंश ) फिर उसके पिता (पड़दादा ) के ८ गुण और अंतिम ८वे दादा का गुण विद्यमान होता है |

जब पिता के शुक्राणुओ द्वारा जीव माता के गर्भ में जाता है तो उसके ८४ अंश (गुण ) होते है जिसमे २६ गुण (अंश) टी शुक्राणु पुरुष के स्वयं के भोजनादि द्वारा उपार्जित होते है शेष ५८ गुण पितरो द्वारा प्राप्त होते है | ऋषि पाराशर ने मानव की आयु कलियुग में कम से कम 120 वर्ष बताई थी |

loading...

पितरो को श्रुधासुमन अर्पित करने का पर्व श्राद्ध कहलाता है | जीवन का अमोघ मन्त्र राम नाम है |नाम और गौत्र मृत्यु के बाद भी जीवित रहते है इसलिए श्राद्ध कर्म में नाम ,गौत्र और मन्त्र ही दान दिए अन्न को लेकर पितरो के पास पहुचते है | हमारा श्राद्ध कर्म कहता है कि श्राद्ध में जो अन्न पृथ्वी पर बिखेरा जाता है उससे पिशाच योनि तृप्त होती है | पृथ्वी पर जल डालने से वृक्ष योनि को प्राप्त हुए पितरो की तृप्ति होती है |दीपक एवं गंध से देवत्व योनि को प्राप्त हुए पितरो की तृप्ति होती है | हमारे अन्न ,जल, तिल एवं वस्त्र के दान करने से मनुष्य योनि पितर संतृप्त होते है | स्वर्णदान ,रजत दान से श्रेष्ट अन्न दान कहा गया है |

जो पुरुष अपने पितरो को श्रुधापुर्वक पितृ पक्ष के दौरान पिंडदान ,तिलांजलि और ब्राह्मणों को भोजन कराते है उनको इस जीवन में ही सभी सांसारिक सुख और भोग प्राप्त होते है | मृत्यु के उपरांत भी श्राद्ध कर्म करने वाले गृहस्थ को स्वर्गलोक ,विष्णु लोक और ब्रह्मं लोक की प्राप्ति होती है | प्रत्येक मनुष्य इस धरती पर जन्म लेने के पश्चात तीन ऋणों से ग्रस्त होता अहि | पहला देव ऋण ,दूसरा ऋषि ऋण और तीसरा पितृ ऋण | पितृ पक्ष के श्राद्ध अर्थात १६ श्राद्ध साल के ऐसे सुनहरे दिन है जिसमे हम श्राद्ध में शामिल होकर उपरोक्त तीनो ऋणों से मुक्ति पा सकते है |

गरुड पुराण में कहा गया है कि अमावस्या के दिन पितृगण वायु रूप में दरवाजे पर दस्तक देते अहि वे अपने परिजनों से श्राद्ध की इच्छा रखते है | उनसे अन्न ,जल की अभिलाषा रखते है |उससे संतृप्त होना चाहते है |सूर्यास्त के बाद वो निराश होकर लौट जाते है | पितृ इतने दयालु होते है कि कुछ भी पास ना हो तो दक्षिण दिशा की तरह मुह करके आसू बहा देने से ही तृप्त हो जाते है |

16 दिवसीय महालय श्राध पक्ष कहलाता है | इस समय सूर्यदेव कन्या राशि में स्थित होते है इस अवसर पर चन्द्रमा भी पृथ्वी के काफी निकट होता है | चन्द्रमा के  थोडा उपर पितृलोक मना गया है |उसरी रश्मियों पर सवार होकर पितृ पृथ्वी लोक में अपने पुत्र पौत्रों के यहाँ आते है तथा अपना भाग लेकर शुक्ल प्रतिप्रदा को सूर्य रश्मियों पर सवार होकर वापस अपने लोक लौट जाते है |

महाभारत ,मार्कंडेय पुराण ,पद्म पुराण ,भागवत पुराण तथा वामन पुराण आदि में पृथुदक (जिसे कुरुक्षेत्र भूखंड का हिस्सा माना गया है ) को सभी प्रकारके दोषों से रहित कहा गया है |पिहोवा को धर्म क्षेत्र की संज्ञा मिलती है | वामन पुराण के अनुसार इस तीर्थ की रचना प्रजापिता ने पृथ्वी ,जल और वायु के साथ सृष्टि के आदि में की थी जबकि महाभारत में लिखा है कि पिहोवा (कुरुक्षेत्र) की आठ कोस भूमि पर ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी |गंगा पुत्र भीष्म पितामह की सद्गति भी पृथुदक में हुयी थी | पिहोवा में प्रेत पीड़ा शांत होती है | अकाल मृत्यु होने पर दोष निवारण के लिए पिहोवा में कर्मकांड करवाने की परम्परा है ऐसा करने से मृतक प्राणी अपगती से सद्गति को प्राप्त हो जाता है |

धर्म शास्त्रों में लिखा है कि पिंड रूप में कौवो को भी भोजन कराना चाहिए |ब्रह्मा जी ने सत्व ,रज और तमोगुण के मिश्रण के साथ सृष्टि का निर्माण किया | पक्षियों में कौवा तमोगुण से युक्त है | पुरानो में कौवो को यम का पक्षी माना गया है | इसकी स्वाभाविक मृत्यु नही होती अर्थात यह दीर्घजीवी है | कौवा मनुष्य में दादा से पडपोता तक की चार आयु को जी लेता है |

loading...
Loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *