कोपरनिकस , जिन्होंने सबसे पहले ब्रह्मांड की अवधारणा सिद्ध की Nicolaus Copernicus Biography in Hindi

Nicolaus Copernicus Biography in Hindi

Nicolaus Copernicus Biography in Hindiदुसरी शताब्दी के टालमी की मान्यता थी कि पृथ्वी विश्व का केंद्र है और स्थिर है | चन्द्र , सूर्य और उस समय तक ज्ञात सभी ग्रह इसी पृथ्वी की परिक्रमा करते है | इन सबके पीछे तारक मंडल भी पृथ्वी की ही परिक्रमा करता है | पृथ्वी और पृथ्वी पर मनुष्य जीवन ,जगत का आधार है | धर्म और विश्व से संबधित सभी प्राचीन विचार यही भावना रखते है | गिरजे के अनुसार “पृथ्वी विश्व का केंद्र है और मनुष्य सृष्टि का सरताज ” | सभी खगोलीय ज्योतिया मनुष्य की सेवा करने और पृथ्वी को प्रकाश और गरिमा देने के लिए बनाई गयी है | जैसे मनुष्य ईश्वर की सेवा करने के लिए बनाया गया है उसी प्रकार विश्व भी मनुष्य की सेवा करने के लिए बनाया गया है इसलिए मनुष्य को ब्रह्मांड के केंद्र में रखा गया है |

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पुराने जमाने का मनुष्य जिस छोटे दायरे में रहता था , उसके मतानुसार उपर लिखी हुयी बाते ,विचार और मनायाताये स्वाभाविक ही थी | लेकिन इस दुनिया में समय समय पर कुछ ऐसे महान पुरुष पैदा होते रहे है जिन्होंने “स्वाभाविक ” को स्वीकार नही किया | कोपरनिकस भी ऐसे महान व्यक्तियों में से एक थे | वह प्रथम व्यक्ति थे ,जिन्होंने टालमी और धर्म की पृथ्वी को सारे ब्रह्मांड का केंद्र मानने वाली मान्यताओं पर जबरदस्त चोट की |

खगोलीय पिंडो की गतियो पर विचार करते करते कोपरनिकस इस सीधे से प्रश्न पर सोचने लगे कि क्या यह आश्चर्य की बात नही है कि हजारो तारे ,सूरज और चन्द्रमा तथा ग्रह हमारी पृथ्वी की ही परिक्रमा करे ! इसके विपरीत क्या यह अनुमान करना सही नही होगा कि पृथ्वी स्वयं लट्टू की तरह अपनी धुरी पर घुमती रहती है और इसी कारण समूचा नभ मंडल हमे अपने चारो ओर घूमता जान पड़ता है ? आज हम जानते है कि कोपरनिकस की बात , उनके संदेह और उनके अनुमान सही थे | इन्ही सन्देहो ने टालमी के जटिल और गलत सिधान्तो को उखड फेंका  ,जो पिछले लगभग 1500 वर्षो से स्वीकार किये जाते रहे थे और जिन्हें सब लोग सच मानते चले आ रहे थे |

Nicolaus Copernicus कोपरनिकस का बचपन का नाम था – कोपरनिक , जिसका अर्थ होता है विन्रम | यही शब्द कोपरनिकस के समूचे जीवन का प्रतिबिम्ब है | पोलैंड के योर्न नमक गाँव में 19 फरवरी 1473 को कोपरनिकस का जन्म हुआ था | पिता निकोलस कोपरनिक गाँव के सम्माननीय व्यापारी थे |परन्तु बालक कोपरनिकस जब दस वर्ष का ही था .तो पिता की मृत्यु हो गयी और कोपरनिकस के लालन पालन का भार उनके मामा लुक्स वाकजेनरोड पर आ पड़ा , जो ना केवल प्रतिभाशाली विद्वान थे बल्कि एक पादरी भी थे |

बालक कोपरनिकस Nicolaus Copernicus की शुरू की पढाई लिखाई थोर्न के स्कूल में हुयी | कहा जाता है कि वोडका नामक स्कूल शिक्षक की सहायता से कम उम्र में कोपरनिकस ने एक सूर्य घड़ी बनाई थी | 18 वर्ष की उम्र में Nicolaus Copernicus कोपरनिकस ने थोर्न छोड़ दिया और क्राको (पोल्लैंड की राजधानी ) के विश्विद्यालय में भर्ती हो गये | उस समय क्राको के प्रसिद्ध व्यक्तियों में एल्बर्ट वुडजेवस्की नामक एक ज्योतिष गणितज्ञ थे | एल्बर्ट के प्रभाव में आकर Nicolaus Copernicus कोपरनिकस की रूचि ज्योतिष और गणित की ओर बढ़ गयी |

क्राको विश्वविद्यालय में शिक्षा समाप्त कर लेने के बाद Nicolaus Copernicus कोपरनिकस ने अपने मामा से इटली जाकर पढने की अनुमति माँगी | मामा ने अनुमति डे दी परन्तु इटली जाने से पहले उन्होंने कुछ समय चित्रकला सीखने में लगाया ताकि वह इटली से लौटते वक्त वहा की सुन्दरता को रंगो में उतारकर ला सके | इटली पहुचकर उन्होंने तीन सालो तक औषधिशाश्त्र ,कला और अपने प्रिय विषय ज्योतिषशाश्त्र का अध्ययन किया | सन 1499 में वह रोम विश्विद्यालय में खगोलशाश्त्र के प्राध्यापक बन गये | चार वर्ष तक काम करने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पोल्लैंड के एक गाँव में इसाई धर्म के प्रचारक बन गये |

फ्राऊएनबर्ग के इस धर्म प्रचारक का सारा समयज्योतिष के अध्ययन में ही नही जाता था , वह अपाहिजों और दुखियो की तन मन धन से सेवा भी करते थे | वैधकी में ही उनका नाम इतना फ़ैल गया कि दूर दूर से लोग अपना इलाज कराने के लिए उनके पास आने लगे | Nicolaus Copernicus कोपरनिकस नाम कृपा ,दया ,सूझ-बुझ और बुद्धिमानी का प्रतीक बन गया | कोपरनिकस वर्ष का ठीक ठाक मान निकालने वाले पहले व्यक्ति थे | उनके वर्ष मान में और सही मान में केवल 26 सैकंड का अंतर था |

विज्ञान के क्षेत्र में खासकर ज्योतिष शाश्त्र के क्षेत्र में कोपर निकस के सिधांत के साथ नये युग का आरम्भ होता है | उन्होंने अपने विचारों को “आकाशीय गोलको की परिक्रमा के बारे में ” नामक पुस्तक में लिखा है परन्तु उन्हें ठीक लिखने की इतनी चिंता थी कि प्रकाशित कराने से पहले वे अपने विचारों के प्रत्येक पहलू को हर दृष्टिकोण से सोच समझ लेना चाहते थे | अंत में उनके गहरे दोस्त हिदेमान गाइसीरस ने सन 1543 में पुस्तक को प्रकाशित कर दिया  लेकिन जब यह पुस्तक प्रकाशित होकर Nicolaus Copernicus कोपरनिकस के सामने आयी ,तब वह अंतिम घडिया गिन रहे थे  ,कुछ दिनों बाद 24 मई 1543 को इस महान व्यक्ति की मृत्यु हो गयी |

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