महाभारत कथा -पांड्वो का अज्ञातवास | Mahabharata-Pandavas in Agyatvas

महाभारत कथा -पांड्वो का अज्ञातवास | Mahabharata-Pandavas in Agyatvas

loading...

महाभारत कथा -पांड्वो का अज्ञातवास | Mahabharata-Pandavas in Agyatvasवनवास की कठिनाइयों को झेलने के पश्चात अब पांड्वो के तेरहवे वर्ष के अज्ञातवास का समय आया | अब पांडव आम जनता से दूर वन में एकांत स्थान पर विचार करने लगे कि एक वर्ष का अज्ञातवास किस नगर में बिताया जाये | अर्जुन ने विराटनगर जाने का प्रस्ताव दिया जिसके राजा विराट दुर्योधन की बातो में नही आयेंगे | अब सभी पांडव भाई वेष बदलकर विराटनगर की ओर रवाना हुए और मार्ग में अपने सारे शस्त्र एक श्मशान में रख दिए | विराटनगर पहुचने के बाद वो राजा की चाकरी में लग गये | लोगो के शक होने पर राजा ने भी पांड्वो पर शक किया किन्तु विश्वास दिलाने पर उन्हें सेवा में ले लिया |

अब राजा के दरबार में पांड्वो को अलग अलग कामो के लिए नियुक्त किया | युधिष्ठिर को विराटनगर के दरबार में “कंक” नामक दरबारी बनाया गया जो सदैव राजा के साथ चौपड़ खेलने में व्यस्त रहता था | भीम “वल्लभ ” नाम से रसोईघर का मुखिया बन गया और कुश्तिया लडकर राजा का मन बहलाता था | अर्जुन स्त्री के वेश में बृहन्नला नाम से विराटनगर की दासियों के साथ नाचने गाने लगा और राजा की पुत्री उत्तरा को नृत्य सिखाने लगा | नकुल अस्तबल में “ग्रन्थिक ” नाम से घोड़ो के देखभाल और बीमारियों का इलाज करने लगा | सहदेव “तंतिपाल ” बनकर गाय बैलो की सेवा करने लगा | द्रौपदी सैरन्ध्री नामक दासी बन गयी जो विराटनगर की महारानी सुदेष्णा की सेवा में लग गयी |

महरानी सुदेष्णा का भाई कीचक बड़ा ही बलशाली और वीर योद्धा था | उस समय मत्स्य देश विराटनगर का सेनापति कीचक ही था जिसकी वजह से विराटनगर की शक्ति बढ गयी थी | कीचक इतना शक्तिशाली था कि स्वय महाराजा विराट भी उनसे भयभीत रहते थे और नगरवासी कीचक को ही राजा मानते थे | कीचक दासी बनी द्रौपदी का अपमान करने लगा तो राजा और कंक तक इस बात की खबर लगी लेकिन राजा विराट उसकी सहायता के लिए न्याय नही कर सका तो उसने भीम को सहायता के लिए कहा | भीम ने एक योजना बनाकर कीचक को एकांत स्थान पर बुलाया और उसका वध कर दिया |

दुर्जनता के वृक्ष पर फल लगता जो शाख , कीचक ऐसा श्राप है , कीचक ऐसा पाप
चाहा जो ना आग को  ,गयी कीचक की जान ,द्रौपदी के अश्रु को , मिला आत्मसम्मान

उधर दुर्योधन को पांड्वो के वनवास की अवधि खत्म होने का पता चला तो उसने अपने गुप्तचरों को भेजकर पांड्वो का पता लगाना शुरू कर दिया था | एक दिन ये खबर हस्तिनापुर पहुची की कीचक का वध हो गया है | दुर्योधन को संदेह हुआ कि इतने बलशाली योद्धा को तो केवल भीम ही मार सकता है तो उसने अपनी सभा में पांड्वो के विराटनगर होने की बात कही और विराटनगर पर आक्रमण करने का प्रस्ताव रखा |

दुर्योधन को विश्वास था कि यदि विराटनगर पर आक्रमण किया जाए तो पांडव भी अवश्य लड़ाई में आयेंगे और शर्त के अनुसार अज्ञातवास में उनका पता लगने पर उन्हें पुनः 12 वर्ष का बनवास मिल जाएगा | दुर्योधन की बात का समर्थन त्रिगर्त देश के राजा सुशर्मा किया जो विराटनगर का शत्रु था | कर्ण ने सुशर्मा को विराटनगर पे दक्षिण से हमला करने को कहा और दुर्योधन की सेना को उत्तर से आक्रमण करने का प्रस्ताव दिया |योजना के अनुसार सुशर्मा ने उत्तर से आक्रमण कर दिया और दक्षिणी हिस्से पर सुशर्मा की सेना फ़ैल गयी |

कंक ने विराट को सांत्वना देते हुए कहा “महाराज आप निराश ना हो , मैंने थोड़ी बहुत अस्त्र विद्या सीखी है और मुझे ऐसा भी ज्ञात हुआ है कि आपके रसोइये वल्लभ , अश्वपाल ग्रन्थिक और सेवक तंतिपाल भी युद्ध कला जानते है , अगर आपकी अनुमति हो तो हम युद्ध में आपकी कुछ सहायता करे ” | कंक की बात सुनकर राजा विराट प्रसन्न हुए और अर्जुन को छोडकर उन चारो के लिए रथो और शस्त्रों का प्रबंध करवाया | अब राजा विराट की सेना और सुशर्मा की सेना में भीषण युद्ध हुआ और सुशर्मा ने राजा विराट को बंदी बना लिया |अब युधिष्ठिर ने भीम को सुशर्मा की सहायता के लिए भेजा और भीम उन्हें छुड़ाकर ले आया सुशर्मा की पराजय पर विराटनगर में हर्षोल्लास छा गया |

इधर चारो भाई सुशर्मा के साथ दक्षिण से लौटने की तैयारी कर रहे थे उधर उत्तर से नगर पर दुर्योधन ने आक्रमण कर दिया | राजा विराट का पुत्र राजकुमार उत्तर काफी भयभीत हो गया लेकिन अर्जुन ने बृहन्नला के रूप में राजकुमार का हौंसला बढ़ाते हुए उनके साथ युद्ध में जाने को कहा | अर्जुन राजकुमार का सारथी बन गया और राजकुमार उत्तर के साथ युद्ध के लिए रणभूमि पहुच गया | राजकुमार उत्तर कौरवो की सेना के महारथियो को देखकर घबरा गया लेकिन अर्जुन ने अपनी असलियत उसे बता दी | अब अर्जुन उस जगह गया जहा उन्होंने अपने अस्त्र छुपाये थे और वहा से युवराज उत्तर को सारथी बनने को कहा |

अब अर्जुन ने खड़े होकर शंखध्वनि बजाई एवं धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और कौरवो की सेना को विश्वास हो गया कि यही पांडूपुत्र अर्जुन है | कर्ण ने खुश होते हुए दुर्योधन से कहा “ये तो अच्छा हुआ ये खुद सामने आ गया , अब पांड्वो को शर्त के अनुसार 12 वर्ष का वनवास फिर भोगना पड़ेगा ” | कौरवो की सेना को अर्जुन का पता चलते ही भयभीत हो गये और कौरवो की सेना में आपस में ही वाद विवाद होने लग गया|भीष्म पितामह ने कर्ण और दुर्योधन को समझाया कि उनके अज्ञातवास की अवधि कल ही खत्म हो चुकी थी और उनके साथ संधि करने में ही उनकी भलाई है | दुर्योधन ने संधि के लिए साफ़ मना कर दिया | अब दोनों सेनाओ के बीच युद्ध शुरू हो गया |

बाढ़ चढ़ा कर धनुष पर , करते भीष्म विचार , प्राणों से प्रिय जो मुझे , कैसे करू प्रहार 

अर्जुन के तीरों से कर्ण घायल होकर रणभूमि से भाग गया और उसने द्रोणाचार्य ,अश्वत्थामा और कृपाचार्य जैसे महावीरो को भी परास्त कर दिया | अब अर्जुन ने दुर्योधन पर हमला कर उसे भी भीषण रूप से घायल कर लिया और दुर्योधन भी रणभूमि छोडकर भाग गया |भीष्म की सहमति पर सारी कौरव सेना वापस हस्तिनापुर लौट आयी | अब अर्जुन ने विराटनगर लौटकर विजय का सारा श्रेय राजकुमार उत्तर को दे दिया | नगर पहुचेने पर पुरी सेना का भव्य स्वागत किया गया |

राजा विराट को जब ये सुचना मिली की राजकुमार उत्तर कौरवो की सेना को हराकर वापस लौ रहे है तो उनको विश्वास नही हुआ कि उनका पुत्र अकेला कैसे युद्ध जीत सकता है | अब राजा विराट अपने पुत्र की वीरता के कारण गर्व से फूल गये और उसका गुणगान गाने लगे | अब कंक बार बार ब्रुह्न्लता के सारथी बनकर युद्ध करने की तारीफ़ कर रहा था | राजा विराट को कंक पर गुस्सा आ गया और क्रोधित होकर उसने चौसर के पासे कंक के मुह पर मारकर उसे चोटिल कर दिया | अब उत्तर और ब्रुह्न्लता दोनों द्वार पर पहुच गये थे लेकिन कंक ने सेरेंध्री को  ब्रुह्न्लता को बाहर रखने का आदेश दिया ताकि उसके खून देखकर वो क्रोधित ना हो जाए |

लहू धर्म का जब गिरे , करे धरा का नाश  , सैरन्ध्री आगे बढी , लिए धर्म विश्वास

अब उत्तर की राजा विराट से भेंट हुयी और उसने कंक के खून निकलने का कारण पूछा तो राजा विराट ने सारी घटना बताई |  राजकुमार उत्तर ने अर्जुन की असलियत और पांड्वो की सच्चाई अपने पिता को बताई | राजा विराट शर्म के मारे कंक के चरणों में झुक गये और क्षमा याचना की | कंक ने राजा विराट को क्षमा कर दिया | अब पांचो पांड्वो ने सभा में अपना असली परिचय दिया और सभा के सभी लोगो ने उनकी प्रशंशा की | अब राजा विराट ने अपनी पुत्री का विवाह अर्जुन के साथ करने का प्रस्ताव दिया किन्तु अर्जुन ने उसे पुत्री की तरह गाना बजाना सिखाया था इसलिए मना कर दिया लेकिन उसने अपने पुत्र अभिमन्यु के साथ उसका विवाह करने का प्रस्ताव रखा | राजा विराट सहमत हो गये |

loading...
Loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *