महाभारत कथा – द्रौपदी स्वयंवर और इंद्रप्रस्थ Mahabharata-Marriage to Draupadi and Indraprastha

Draupadi and Indraprasthaपांडव लाक्षागृह से निकलकर जंगलो से होते हुए एकचक्रनगर पहुच गये थे और ब्राह्मणों के वेश में भीक्षा मांगकर जीवन व्यतीत कर रहे थे | उधर पांचाल नरेश ने अपने पुत्री द्रौपदी के स्वयंवर की तैयारिया आरम्भ कर दी थी | पांचाल नरेश दुपद ने पहले द्रौपदी का विवाह अर्जुन से करवाने की इच्छा थी  किन्तु उनकी मृत्यु की खबर सुनकर उसने स्वयंवर का आयोजन किया था |  स्वयंवर की सुचना मिलते ही पांडव ब्राह्मणों की मंडली के साथ एकचक्रनगरी से पांचाल के लिए रवाना हो गये | बढी हुयी दाढी और केशो के साथ ब्राह्मण के वेश में उन्होंने पांचाल प्रदेश में प्रवेश किया ताकि कोई उन्हें पहचान ना सके |

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द्रुपद ने स्वयंवर की सारी तैयारिया कर राखी थी जिसमे मंडप के मध्य में एक धनुष पड़ा हुआ था और उसके उपर एक सोने की मछली टंगी हुयी थी | एक यंत्र के माध्यम से वो मछली तीव्र वेग से घूम रही थी | राजा द्रुपद ने अब स्वयंवर की घोषणा करते हुए कहा “जो भी राजकुमार उस धनुष से नीचे पानी के प्रतिबिम्ब में देखते हुए घुमती हुयी मछली की आंख पर तीर लगा देगा , उसके गले में मेरी पुत्री द्रौपदी वरमाला डालकर अपने वर का चयन करेगी ” | इस स्वयंवर में दूर दूर से पराक्रमी राजकुमार आये थे जिसमे सभी कौरव , जरासंध , शिशुपाल और श्रीकृष्ण भी शामिल थे | अब हाथी पर विराजमान होकर द्रौपदी अपने भ्राता के साथ स्वयंवर स्थल पर आयी |

अब स्वयंवर प्रारंभ हुआ और एक एक करके राजकुमार आते गये और लक्ष्य को प्राप्त करने में असफल रहे | कई शूरवीर और पराक्रमी राजकुमार भी इस स्वयंवर में पराजित होकर अपमनित हुए जिसमे दुर्योधन , जरासंध और शिशुपाल जैसे योद्धा भी थे | अब कर्ण की बारी आयी तो सभा में उत्साह फ़ैल गया क्योंकि कर्ण भी एक महान धनुर्धर था | कर्ण ने धनुष उठाकर प्रत्यंचा चढ़ानी शुरू कर दी लेकिन अंत में धनुष उनके हाथ से उछलकर उनके मुह पर लग गया | अपमानित कर्ण भी वापस अपने स्थान पर जाकर बैठ गया |

अब ब्राह्मणों की मंडली के मध्य से एक ब्राह्मण निकला जो अर्जुन था लेकिन उसको उसके वेश के कारण उसको कोई पहचान नही पाया था | अब अर्जुन से धनुष हाथ में लेकर प्रत्यंचा चढ़ा दी और धनुष से तीर लगाने के लिए तैयार हो गया | उसे देखकर सभी दरबारी स्तब्ध रह गये कि एक ब्राह्मण ने कितनी वीरता से धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा दी | अब अर्जुन ने धनुष चलाया और उसका तीर सीधा मछली की आंख में लग गया और उसे देखते ही उत्साहित सभा उसके सम्मन में खडी हो गयी और उसके प्रशंशा करने लगी |

अब द्रौपदी ने शर्त के अनुसार ब्राह्मण वेशधारी अर्जुन के गले में वरमाला डाल दी | ये सुचना अपनी माता को सुनाने के लिए युधिष्ठिर , नकुल और सहदेव चले गये लेकिन भीम अपने भाई की रक्षा के लिए वही खड़ा रहा | अब राजकुमारों के बीच हलचल मच गयी कि एक ब्राह्मण किस तरह ये स्वयंवर जीत सकता है | इस विप्लव को कम करने के लिए श्रीकृष्ण प्रयास करने लगे और उधर भीमऔर अर्जुन द्रौपदी को साथ लेकर अपनी माता के पास कुटिया की ओर चल दिए |

इस बात की सुचना जब द्रुपद के पुत्र और द्रौपदी के भाई दृष्टधूमं को पता चली तो वो उनके पीछे चला गया |  दृष्टधूमं ने अनुमान लगा लिया था कि वो पांडव ही थे क्योंकि उन्होंने कुटिया में कुंती को पहचान लिया था | ये सुचना लेकर वो अपने पिता द्रुपद के पास पहुचा | अब राजा द्रुपद के बुलावे पर पांडव द्रौपदी और माता कुंती के साथ राजभवन पहुचे | युधिष्ठिर ने द्रुपद को अपना वास्तविक परिचय दिया उर द्रुपद खुशी से फुले नही समाये क्योंकि उनकी इच्छा अनुसार अर्जुन के साथ द्रौपदी का विवाह हो गया था | अब माता की आज्ञा और सबके सम्मति से द्रौपदी का विवाह पांचो भाइयो से हो गया |

द्रौपदी के स्वयम्वर की खबर जब हस्तिनापुर में विदुर तक पहुची तो वो बहुत प्रस्सन हुए | विदुर ने पांड्वो के जीवित होने और द्रौपदी स्वयंवर की खबर धृतराष्ट्र को सुनाई और वो बहुत प्रसन्न हुए | उधर दुर्योधन को जब पांड्वो के जीवित होने की खबर पता चली तो उसके क्रोध की सीमा नही रही | उसको पता चला कि पांडव लाक्षागृह से एक सुंरग के माध्यम से निकलर सुरक्षित वन में चले गये थे और एक वर्ष के अज्ञातवास के पश्चात पांचाल नरेश के पुत्री द्रौपदी से विवाह कर ओर अधिक शक्तिशाली हो गये है | अब दुर्योधन के मन में पांड्वो के प्रति इर्ष्या ओर ज्यादा बढ गयी थी और फिर से पांड्वो के विनाश की योजना में लग गया |

दुर्योधन को पता लग गया कि पांड्वो को राजनीति का काफी अनुभव हो गया और उसका साथ कोई नही छोड़ेगा | अब भीष्म पितामह ने दुर्योधन को पांड्वो से संधि कर आधा राज्य देने को कहा लेकिन दुर्योधन ऐसा बिलकुल नही चाहते थे | उन्होने द्रोणाचार्य से सलाह ली लेकिन उन्होने भी दुर्योधन को यही सलाह दी और उन्होंने बताया कि यदि उन्होंने ऐसा नही किया तो कौरवो का विनाश होगा | विदुर से सलाह लेने पर भी वही बात की | अंत में दुर्योधन को सबकी सलाह के अनुसार पांड्वो को आधा राज्य देने के लिए विवश होना पड़ा |  अब द्रुपद के पास रह रहे पांड्वो को हस्तिनापुर आकर आधा राज्य देने की सूचना पहुची |

अब हस्तिनापुर में उनके पांड्वो के स्वागत की तैयारिया प्रारभ हो गयी | अब युधिष्ठिर का राज्याभिषेक कर उनको  आधा राज्य सौंप दिया | धृतराष्ट्र की सलाह पर पांड्वो ने खांडवप्रस्थ को अपनी राजधानी बना ली ताकि पांड्वो और कौरवो के बीच द्वेष ना रहे |  खांडवप्रस्थ उस समय एक बहुत पुराना नगर था जिस पर उनके पूर्वज राज करते थे | पांड्वो ने उस नगर का पुनर्निर्माण करवाकर उस नगर का नाम बदलकर इन्द्रप्रस्थ रख दिया और सुखपूर्व पांडव , द्रौपदी के साथ और माता कुंती के साथ उस नगर पर राज करने लग गये |

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