Kurukshetra War (Mahabharata) Story in Hindi | कुरुक्षेत्र युद्ध (महाभारत) 18 दिनों तक चले युद्ध की कहानी

Kurukshetra War (Mahabharata) Story in Hindi

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kurukshetra warकुरुक्षेत्र युद में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया जिसे समझकरवो युद्ध के लिए तैयार हो गया | अब युद्ध से पूर्व युधिष्ठिर ने भी कुछ अप्रत्याशित किया | उसने अपने सारे अस्त्र-शस्त्र उतार दिए और हाथ जोडकर कौरवो की सेना की ओर बढ़ने लगा | पांडव और कौरव दोनों समझने लगे कि युधिष्ठिर युद्ध से पूर्व ही आत्मसमपर्ण करने जा रहा है | युधिष्ठिर का उद्देश्य एकदम साफ था , वो भीष्म पितामह के चरणों में गिरकर युद्ध में विजयी होने का आशीर्वाद लेने गया था | भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को आशीर्वाद दिया और उसके बाद सभी बडो से आशीर्वाद पाकर युधिष्ठिर वापस अपने रथ की ओर लौट आया | अब युधिष्ठिर ने उद्घोष किया कि इस धर्म युद्ध में जो भी अपनी पक्ष बदलना चाहते है वो इस समय बदल सकते है तो दुर्योधन के सौतेले भाई युयुत्सु ने दल बदल लिया |

बदला पक्ष युयुत्सु ने , धर प्रकाश की डोर , भाई-भाई लड़ रहे , माता हो किस ओर 

अब भीष्म पितामह और युधिष्ठिर ने युद्ध का शंक बजाया और कुरुक्षेत्र युद्ध की शुरवात हो गयी |

महाभारत युद्ध का प्रथम दिन Day 1 of Kurukshetra War in Mahabharat

Arjuna and bheesha on first dayजब युद्ध की शुरुवात हुयी तो पहले दिन कौरवो की ओर से भीष्म पितामह ने पांड्वो पर ऐसा हमला किया कि पांडव सेना थर्र्रा उठी | भीष्म पितामह की इस वीरता को देखकर दुर्योधन बहुत खुश हो रहा था क्योंकि वो जानता था कि भीष्म पितामह ही पांड्वो को धूल चटा सकते है | राजा शल्य और भीष्म पितामह के वारो से राजा विराट के दोनों पुत्र उत्तर और श्वेत वीरगति को प्राप्त हो गये  | अभिमन्यु ने भी भीष्म पितामह का सामना किया | सूर्यास्त के पश्चात युद्ध उस दिन के लिए थम गया और पांड्वो में भय छा गया था | श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सांत्वना दी कि विजय उन्ही की होगी |

महाभारत युद्ध का दूसरा दिन Day 2 of Kurukshetra War in Mahabharat

दुसरे दिन कौरवो की आश्वस्त सेना ने पांड्वो पर आक्रमण किया | पहले दिन की हार के पश्चात पाडव सेना के सेनापति दृष्टधयुमं  ने व्यूह रचना की | अर्जुन को ये समझ गया था कि यदि पांड्वो को इस युद्ध में बने रहना है तो भीष्म पितामह को सबसे पहले मारना पड़ेगा | उस समय सारी कौरव सेना में केवल तीन योद्धा ही अर्जुन का सामना कर सकते थे – भीष्म पितामह , आचार्य द्रोण और अंगराज कर्ण | अब अर्जुन ने अपना गांडीव हाथ में उठाकर भीष्म पितामह पर प्रहार शुरू कर दिया | भीष्म पितामह को कौरवो की सेना ने सुरक्षा दे रखी थी लेकिन फिर भी अर्जुन और भीष्म पितामह के बीच कई घंटो तक युद्ध चलता रहा लेकिन कोई नतीजा नही निकला |

दुसरी ओर आचार्य द्रोण द्रुपद के पुत्र दृष्टद्युम्न के साथ युद्धरत थे जिसमे आचार्य द्रोण ने दृष्टद्युम्न का धनुष कई बार तोड़ दिया था | भीम बीच में आकर दृष्टद्युम्न को बचा कर ले गया | दुर्योधन ने भीम पर आक्रमण के लिए अपनी कलिंग सेना भेजी और भीम के हाथो कई कलिंग सैनिक मारे गये | भीष्म पितामह तुरंत कलिंग सेना की मदद करने पहुच गये और उन्हें भीम के आक्रमणों से बचाया | भीम की सहायता कर रहे सात्यकि ने अपने बाण से भीष्म के सारथी को मार गिराया | सारथी के बिना भीष्म के रथ के घोड़ो को कोई संतुलित नही कर पाया और वो भीष्म पितामह को रणभूमि से दूर लेकर चले गये | दुसरे दिन के अस्त होने तक कौरवो की सेना को काफी नुकसान हुआ |

महाभारत युद्ध का तीसरा  दिन Day 3 of Kurukshetra War in Mahabharat

Krishna Attack on Bhishma Pitamhaतीसरे दिन भीष्म ने कौरवो की सेना के लिए व्यूह रचना की और स्वयं को आगे रखते हुए दुर्योधन की सेनाओ को सुरक्षा के लिए पीछे रखा | भीष्म पितामह किसी भी विपति से बचने के लिए तैयार थे | पांड्वो की सेना ने भी व्यूह रचना करते हुए भीम और अर्जुन को आगे रखा | कौरवो की सेना ने अर्जुन को अपना निशाना बनाया और उसके रथ को बाणों और भालो से घेर लिया |  अर्जुन ने अपने बाणों से अपने रथ के चारो ओर धुएं का आवरण बना लिया और कौरवो के व्यूह से निकल गया |

अभिमन्यु और सत्यकी ने मिलकर शकुनी की गन्धर्व सेना को पराजित कर दिया | भीम और उसके पुत्र घटोत्कच ने दुर्योधन पर पीछे से आक्रमण कर दिया | भीम के बाण से दुर्योधन बेहोश हो गया लेकिन उसके सारथी ने बिना किसी को उसकी बेहोशी का पता चले रणभूमि से हटा लिया | दुर्योधन की सेना ने उनके नायक के रथ को रणभूमि से बाहर जाते देख खलबली मच गयी और उसकी पुरी सेना तितर बितर हो गयी | भीष्म पितामह ने फिर से बिखरी सेना को एकत्रित किया और दुर्योधन फिर से नेतृत्व के लिए लौट आया | क्रोधित भीष्म पितामह ने पांड्वो पर ऐसा प्रहार किया कि पांड्वो की सेना के पाँव उखड़ गये |अर्जुन ने सेना में अनुशाशन लाने के लिए भीष्म पितामह पर आक्रमण शुरू कर दिया लेकिन भीष्म पितामह ने अर्जुन के कई सैनिको को मार गिराया था |

अर्जुन का भीष्म पितामह पर आक्रमण ना करता देख श्रीकृष्ण क्रोधित हो गये और अपना सुदर्शन चक्र लेकर रणभूमि में भीष्म पितामह के समक्ष खड़े हो गये | भीष्म पितामह भी प्रणाम करते हुए वासुदेव के हाथो से मुक्ति पाने के लिए तैयार हो गये | तभी अर्जुन दौड़ता हुआ आया और वासुदेव को रोकते हुए उनकी प्रतिज्ञा याद दिलाई और उन्हें वापस लेकर गया |

श्रीकृष्ण अर्जुन को भीष्म को हराने में असमर्थ देखकर क्रोधित हो गये और युद्ध में शस्त्र ना उठाने की प्रतिज्ञा लेने वाले श्रीकृष्ण रथ का पहिया लेकर भीष्म पितामह की ओर दौड़े | भीष्म हाथ जोडकर वासुदेव के समक्ष घुटनों के बल बैठ गये और स्वय भगवान के हाथो से मरने के लिए तैयार हो गये लेकिन अर्जुन ने दौडकर वासुदेव को अपनी प्रतिज्ञा याद दिलाकर रोक लिया | वासुदेव को पता था कि जब तक भीष्म है पांड्वो के लिए युद्ध जीतना असम्भव है इसलिए उन्होंने अगले दिन के लिए रणनीति तैयार की | श्रीकृष्ण के इस कार्य से अर्जुन उत्तेजित हो गया उअर कौरवो पर वज्र के समान गिर पड़ा | शाम होते होते कौरवो की सेना बुरी तरह हार गयी और वापस अपन शिविरों में लौट गयी |

महाभारत युद्ध का चौथा दिन Day 4 of Kurukshetra War in Mahabharat

चौथे दिन का युद्ध शुरु हुआ जो भीम के नाम रहा | भीम अपनी गदा से कई कौरव सेना को समाप्त कर रहा था तो दुर्योधन ने अपने विशाल हाथी सेना भेजी | भीम ने जब हाथियों के झुण्ड को अपनी ओर आते देख तो रथ से उतरकर अकेला उन पर आक्रमण के लिए टूट पड़ा | भीम ने दुर्योधन के आठ भाइयो को मार डाला | क्रोधित दुर्योधन ने भीम पर एक अस्त्र चलाया और वो मुर्चित होकर गिर पड़ा | अपने पिता को मुर्छित देखकर उसका पुत्र घटोत्कच क्रोधित होकर कौरवो की सेना पर कहर बनकर टूट पड़ा |

महभारत युद्ध का पांचवा दिन Day 5 of Kurukshetra War in Mahabharat

जब पांचवे दिन फिर से युद्ध प्रारम्भ हुआ तो मौत का सिलसिला जारी रहा | भीष्म पितामह की सेनाओ ने पांड्वो को परेशान कर दिया | सत्यकी आचार्य द्रोण के हमलो को झेल नही पाया लेकिन भीम उसको वहा से बचा ले आया | अर्जुन ने दुर्योधन के कई सैनिको को मार गिराया | और पांचवे दिन के अंत तक अकल्पनीय नरसंहार चलता रहा |

महाभारत युद्ध का छठा दिन Day 6 First Day of Kurukshetra War in Mahabharat

छठवे दिन कौरवो की ओर से आचार्य द्रोण ने तबाही मचा दी और पांडव सेना के कई सैनिको को मार गिराया | इस अंधाधुंध युद्ध में दुर्योधन घायल हो गया और कृपाचार्य ने उसे बचा लिया |

महभारत युद्ध का सातवाँ दिन Day 7 of Kurukshetra War in Mahabharat

आठवे दिन कई मोर्चो ने लड़ाई लड़ी | एक मोर्चे पर अर्जुन  और भीष्म पितामह लड़ रहे थे | दुसरे मोर्चे पर द्रोण और विराटराज लड़ रहे थे | एक मोर्चे पर शिखंडी , द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा से लड़ रहा था | एक मोर्चे पर नकुल और सहदेव अपने मामा शल्य पर बाण बरसा रहे थे | एक मोर्चे पर भीम अकेला दुर्योधन के चार भाइयो से लड़ रहा था |एक मोर्चे पर घटोत्कच और भगदत में द्वंद छिड गया था | सातवे दिन के अंत तक द्रोण ने विराट के एक ओर पुत्र शंख को मार गिराया |

महाभारत युद्ध का आठवा दिन Day 8 of Kurukshetra War in Mahabharat

दुसरी तरफ भीम ने धृतराष्ट्र के आठ पुत्रो को मार गिराया | अर्जुन के पुत्र इरावन और उलूपी ने गंधर्व राज शकुनी के पांच भाइयो को मार गिराया | दुर्योधन ने अलाम्वुष नामक राक्षस को इरावन को मारने भेजा और एक भयंकर युद्ध के बाद राक्षश ने इरावन को मार दिया | इरावन की मौत पर भीम का पुत्र घटोत्कच कौरव सेना पर टूट पड़ा | भीम के घटनास्थल पर पहुचने से पहले ही सूर्यास्त हो गया अन्यथा भीम ओर कई कौरवो का विनाश कर देता |

महाभारत युद्ध का नवा दिन Day 9 of Kurukshetra War in Mahabharat

नवे दिन भी भयंकर युद्ध चलता रहा और पांड्वो-कौरवो के कई योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गये और सांझ ढलने पर युद्ध उस दिन के लिए समाप्त हो गया |  उस रात को अर्जुन और युधिष्ठिर भीष्म पितामह से मिलने गये और उनसे विजय का आशीर्वाद वापस लौटाने आये | भीष्म पितामह ने आशीर्वाद लौटाने से तो मना कर दिया लेकिन एक उपाय बताया जिससे वो भीष्म पितामह को पराजित कर सकते है | भीष्म पितामह ने बताया कि वो नारी के विरुद्ध श्ह्त्र नही उठा सकते है | अब पांडव इसके उपाय में लग गये |

महाभारत युद्ध का दसवा दिन Day 10 of Kurukshetra War in Mahabharat

Bhishma Pitamahदसवे दिन भीष्म की वीरता का सामना करने में असमर्थ होते देख पांड्वो ने शिखन्डी को आगे किया क्योंकि शिखन्डी पिछले जन्म में एक औरत था , ये बात भीष्म जानते थे और उन्होंने महिला पर आक्रमण नही करने के प्रतिज्ञा ली थी | अब दुर्योधन को जैसे ही इस बात का पता चला तो उन्होंने मामा शकुनि को ये बात बताई | मामा शकुनी ने दुर्योधन को कहा कि वो अपनी सेना को अर्जुन और शिखन्डी के बीच ना आने दे तभी पितामह की रक्षा हो सकती है  |

भीष्म शिखन्डी पर नही , कभी करेंगे वार , किन्तु पितामह की करे ,रक्षा किसी प्रकार
सब शकुनि संग सोचते , कोई उचित उपाय ,सब मिले घेरे तात को ,उनके प्राण बचाय

लेकिन किसी तरह शिखन्डी और अर्जुन का रथ आमने सामने आ ही गया |शिखन्डी के सामने आते ही भीष्म पितामह ने धनुष चलाना रोक दिया | अर्जुन ने खुद को शिखन्डी के पीछे रखते हुए भीष्म के कवच को भेदना शुरू कर दिया | जल्द ही अर्जुन के बाणों से भीष्म पितामह का पूरा शरीर बंध गया | अब भीष्म पितामह को पता लग चूका था कि आज उनका आखिरी युद्ध है | अब वो हाथो में ढाल-तलवार लेकर रथ से उतरने  लगे | अर्जुन के लगातार बाणों  ने भीष्म पितामह के शरीर पर अंगुली भर स्थान भी नही रखा |

भीष्म पितामह रथ के पास सिर के बल गिर पड़े | भीष्म ऐसे गिरे कि उनका शरीर भूमि से नही लगा और शरीर के सारे बाण उनके शरीर को छेदकर दुसरी ओर निकल गये |  भीष्म पितामह का शरीर अब जमीन उपर था और गर्दन लटकी हुयी थी | भीष्म पितामह अर्जुन से बोले “पुत्र अर्जुन मेरा सिर नीचे लटक रहा है इसके नीचे थोडा सहारा तो लगा दो ” | अर्जुन ने तुरंत अपने धनुष से तीन तीर उनके सर के नीचे छोड़े और उनके सिर को सहारा देने के लिए तकिया तैयार कर दिया |

भीष्म पितामह बोले “पुत्र अर्जुन ने मेरे सिर के नीचे जो तकिया बनाया है मै उसी से प्रसन्न हु लेकिन अभी मेरा शरीर त्यागने का समय नही हुआ है इसलिए उत्तरायण तक मै ऐसे ही पड़ा रहूँगा , जो भी जीवित योद्धा मुझे देखना चाहे उन्हें बुला ले ” | भीष्म पितामह ने अपने पिता शांतनु को वचन दिया था कि वो तब तक जीवित रहेंगे जब तक हस्तिनापुर चारो ओर से सुरक्षित ना हो जाए | इसके लिया उनके पिता राजा शांतनु ने उन्हें इच्छा म्रत्यु का वरदान दिया था | अब पितामह ने अर्जुन से पानी पिलाने को कहा और अर्जुन ने पितामह के नजदीक ही अपने तीर से एक सोता बना दिया जिसका पानी सीधा पितामह के मुख में आकर गिरने लगा |

माँ गंगा आशीष दे , आकर पुत्र के पास , आज गिरा हु भूमि पर , ज्यो कोई आकाश
आज धराशाही हुए , कुरुकुल के सरताज , उनको अभिवादन करे , सारा वीर समाज
श्वेत आत्मा ,श्वेत युग , श्वेत केश या वेश , कहा दिखे इस लोक में ,ऐसा वीर विशेष
रक्त सना हर तीर है , अश्रु भरा हर नेत्र , रुंधा रुंधा हर कंठ है , रुंधा रुंधा हर वीर
अर्जुन ने छुए चरण , लिए हृदय में घाव , कृष्ण खड़े करबद्ध हो , ऐसा पूण्य प्रभाव

अब कर्ण भी भीष्म पितामह के पास आ गया और उनको प्रणाम किया  | भीष्म पितामह ने फिर कर्ण को अपने पांडू भाइयो से युद्ध ना करने को कहा लेकिन कर्ण ने ये कहकर मना कर दिया कि मुसीबत के वक़्त दुर्योधन ने मेरा साथ दिया था इसलिए वो मरते दम तक उसी का साथ देगा |

शर शय्या पर भीष्म है , करे कर्ण से बात ,वीरो का यह धर्म है ,रहे धर्म के साथ

भीष्म पितामह ने अगले दिन उत्तरायण के वक़्त अपना शरीर त्याग दिया और एक महान वीर योद्धा रणभूमी में वीरगति को प्राप्त हो गये |

महाभारत युद्ध का ग्यारवा दिन Day 11 of Kurukshetra War in Mahabharat

भीष्म पितामह पिछले 10 दिनों से 100 कौरवो की हर खतरे से रक्षा कर रहे थे लेकिन अब कौरवो की सेना में एक महान योद्धा नही रहा | अब भीष्म पितामह के बाद आचार्य द्रोण को सेनापति बनाया गया | वृद्ध होने के बावजूद आचार्य द्रोण बड़ी वीरता से लड़ रहे थे | अब भीष्म पितामह के देहावसान के पश्चात कर्ण भी रणभूमि में उतर गया | कर्ण और दुर्योधन युधिष्ठिर को जीवित पकड़ना चाहते थे ताकि युद्ध बंद हो जाए और कौरव जीत जाए | द्रोण युधिष्ठिर के पास पहुचे और उन्होंने अपने बाणों से युधिष्ठिर का धनुष तोड़ दिया | पांड्वो की सेना को अब भय था कि कही युधिष्ठिर को बंदी बना लिया गया तो वो युद्ध हार जायेंगे | अर्जुन तुरंत वहा पर पंहुचा और उसने अपने तीरों की वर्षा से द्रोण को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया | इस तरह ग्यारहवे दिन का युद्ध भी शाम ढलते समाप्त हो गया |

महभारत युद्ध का बारहवा दिन Day 12 of Kurukshetra War in Mahabharat

युधिष्ठिर को जीवित पकड़ पाने में असफल होने के बाद दुर्योधन ने अर्जुन को युधिष्ठिर से दूर करने की योजना बनाई |  दुर्योधन ने राजा भगदत्त को भेजा जिसके पास इस पृथ्वी पर सबसे बड़ी हाथीयो की सेना थी | भगदत ने अर्जुन पर अपने विशाल हाथी से हमला कर दिया और उन दोनों के बीच भीषण युद्ध शुरू हो गया | अंत में अर्जुन के बानो को भगदत सहन नही कर पाया और रणभूमि में मारा गया | शकुनी के दो भाई वृषक और अचक भी अर्जुन के बाणों से मारे गये | द्रोण ने युधिष्ठिर को पकड़ने का प्रयास जारी रखा लेकिन पांड्व बड़ी बहादुरी से लड़े और कौरवो की सेना को बहुत आघात पहुचाया |

महाभारत युद्ध का तेरहवा दिन Day 13 of Kurukshetra War in Mahabharat

abhimanyuत्रिगतदेश के राजा सुशर्मा अपने तीन भाइयो के साथ कौरवो की सेना की ओर से लड़ रहे थे | उन्होंने एक चक्रव्यूह का निर्माण किया जिनको मालुम था कि अर्जुन चक्रव्यूह नही तोड़ पायेगा और मारा जाएगा |  उन्होंने रणभूमि में जाकर अर्जुन को चुनौती दी | अर्जुन उनकी चुनौती स्वीकार करते हुए बहादुर योद्धा की तरह उसके तीनो भाइयो को मार दिया | द्रोण लगातार युधिष्ठिर को पकड़ने के प्रयास में लगे हुए थे |

दुसरी तरफ बचे हुए पांडव द्रोणाचार्य के चक्रव्यूह को तोड़ने की खोज में लगे हुए थे | युधने अभिमन्यु को चक्रव्यूह तोड़ने के लिए भेजा क्योंकि उसे चक्रव्यूह तोड़ने का ज्ञान था |  अब अभिमन्यु ने युधिष्ठिर से कहा कि उसे चक्रव्यूह में प्रवेश करना तो आता है लेकिन बाहर निकलना नही आता | अभिमन्यु ने गर्भ में रहते हुए अपने पिता अर्जुन से चक्र्व्युह के अंदर घुसना सीखा था लेकिन बाहर निकलने के बारे में बताते वक़्त अभिमन्यु की माँ और अर्जुन की पत्नी सुभद्रा को नींद आ गयी थी इसलिए उसे बाहर निकलने का ज्ञान नही है ||

अब अभिमन्यु चक्रव्यूह में प्रवेश कर गया लेकिन राजा जयद्र्थ ने पांड्वो को अंदर आने से रोक दिया | जयद्रथ को  शिवजी से वरदान मिला था कि वो युद्ध के सिर्फ एक दिन में कई योद्धाओं को मार सकता है और पांड्वो को पराजित कर सकता है | अब अभिमन्यु चक्रव्यूह में प्रवेश कर गया और उसने हजारो योद्धाओ को मार गिराया जिसमे वृह्द्व्ला , कोसल के राजा , करथा के राजा , भोजराज , शल्य पुत्र रुक्मरथ और कई योद्धाओ को मार गिराया | इसके अलावा उसने दुर्योधन के पुत्र को भी मार दिया | दुर्योधन ने क्रोधित होकर दुशाशन के पुत्र दुर्माशन को अभिमन्यु को मारने भेजा लेकिन उल्टा वो मारा गया |

अब दुर्योधन ने अपने सभी योद्धाओ को एक साथ आक्रमण करने को कहा | अभिमन्यु ने अपना रथ,घोडा ,तलवार और कवच तक खो दिया था | उस पर कई बाणों के साथ वार किया गया लेकिन अभिमन्यु अकेला उन महारथियों पर रथ का पहिया लेकर टूट पड़ा | अपनी अंतिम सांस तक वो लड़ता रहा और अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हो गया | अपने पुत्र की मृत्यु के बारे में पता चलते ही अर्जुन ने जयद्रथ को मारने की प्रतिज्ञा ली लेकिन सूर्यास्त होने के कारण उस दिन का युद्ध समाप्त हो चूका था |

पिता अग्नि दे पुत्र को ,रखे हृदय पर भार , मन में तो बह रही , नैन अश्रु की धार
धू धू कर जलती चिता , धू धू जले प्रतिशोध , जयद्रथ पर नर पार्थ का , पल पल बढ़ता क्रोध

महाभारत युद्ध का चौदहवा दिन Day 14 of Kurukshetra War in Mahabharat

अर्जुन ने 14वे दिन ही जयद्रथ को मारने की प्रतिज्ञा ली अन्यथा वो अग्नि समाधि ले लेगा इसलिए जयद्रथ को खोजते हुए अर्जुन ने रणभूमि में कौरवो की एक अक्ष्शौनी सेना को समाप्त कर दिया | शकटव्यूह कौरव सेना ने जयद्रथ को सुरक्षित करा हुआ था | अर्जुन ने जयद्रथ को खोज लिया लेकिन उसके सामने एक विशाल कौरव सेना थी | श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जयद्रथ को उसके पिता ने वरदान दिया था जो  उसको मारकर उसके धड को जमीन पर गिरा देगा उसके भी धड़ का उसी समय विस्फोट के साथ अंत हो जाएगा | इसलिए उन्होंने अर्जुन को ऐसा बाण चलाने को कहा कि उसका धड़ नीचे ना गिरकर अपनी पिता की गोद में गिरे |अब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र चलाकर  सूर्य को ढक दिया और नकली सूर्यास्त कर दिया | अर्जुन ने भयंकर लड़ाई लड़ते हुए जयद्रथ को हरा दिया और एक शक्तिशाली बाण से उसका वध कर दिया |

अब  अर्जुन शेष रहे शकटव्यूह को तोड़ने में लगा हुआ था और कौरवो के तीसरे सबसे बड़े भाई विकर्ण ने अर्जुन को  तीरदाजी के लिए चुनौती दी |अर्जुन ने भीम को विकर्ण से लड़ने के लिए कहा लेकिन भीम ने इसलिए मना कर दिया क्योकि द्रौपदी वस्त्रहरन के समय उसने पांड्वो का पक्ष लिया था | लेकिन भीम को उसके साथ युद्ध करना ही पड़ा और अंत में अपनी गदा से उसका वध कर दिया | शक्तिशाली पांड्वो ने उसके म्रत्यु का शोक मनाया क्योंकि उसने धर्म का साथ दिय था | द्रोण ने वृह्र्टराष्ट्र को मार दिया और अर्जुन ने कर्ण के पुत्र वृशसेन्न को मार गिराया |  उधर भीम का पुत्र घटोत्कच नरसंहार करता हुआ बढ़ रहा था उसी समय कर्ण ने उसे देख लिया और उसकी तरफ इंद्र द्वारा दिया शक्तिबाण चलाया | विशाल घटोत्कच कौरवो की सेना पर गिर गया और कौरवो की एक अक्षोषिनी सेना को मारते हुए वीरगति को प्राप्त हो गया |

महाभारत युद्ध का पन्द्रहवा दिन Day 15 of Kurukshetra War in Mahabharat

आचार्य द्रोण के राजा द्रुपद और राजा विराट के मारने पर भीम और दृस्थधूम उनसे लड़ने के लिए तैयार हुए | आचार्य द्रोण बहुत शक्तिशाली थे और ब्रह्मांड अस्त्र के होते हुए उन्हें जीतना नामुनकिन था | श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को समझाया कि यदि वो उनके पुत्र अश्वत्थामा को मार देंगे तो वो अपने अस्त्र त्याग देंगे |  भीम ने एक अश्वत्थामा नामक हाथी को मारकर ये अफवाह फैला दी कि अश्वत्थामा मारा गया | द्रोण युधिष्ठिर के पास अपने पुत्र की म्रत्यु को देखने आये | युधिष्ठिर ने उन्हें बताया कि वो निश्चिंत नही है कि वो द्रोण पुत्र था या फिर कोई हाथी |  ऐसा माना जाता है कि द्रोण हाथी शब्द को सही तरीके से सुन नही पाए |

दुखी द्रोण ने अपने सारे हथियार त्याग दिए और ध्रुस्तधुम्यं ने अपने पिता की मौत का बदला लेते और अपनी प्रतिज्ञा पुरी करते हुए आचार्य द्रोण को मार दिया | बाद में गुप्त रूप से कुंती ने कर्ण को बुलाकर पांड्वो से युद्ध ना कर अपने भाइयो की जान ना लेने को कहा लेकिन उसने केवल अर्जुन को छोडकर सभी भाइयो को छोड़  देने का वचन दिया औरसाथ ही एक शस्त्र को दुबारा उपयोग ना करने का वचन दिया |

महाभारत युद्ध का सोलहवा दिन Day 16 of Kurukshetra War in Mahabharat

Dushashan and Bhima16वे दिन कुरु सेना का सेनापति कर्ण को बनाया गया और वो बड़ी वीरता से लड़ने लगा | कर्ण ने पांड्वो की सेना का भारी नुकसान किया लेकिन अर्जुन ने अपने बाणों से अपनी सेना की रक्षा की |  उसी दिन भीम ने अपनी गदा से दुशाशन का रथ चकनाचूर कर दिया और उसके दाए हाँथ को कंधे से खीचकर उसका वध कर दिया | उसने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार उसकी छाती चीर दी और उसका खून पीया | इसके बाद उसका कुछ खून द्रौपदी के खुले केशो को बाँधने के लिए ले गया क्योंकि द्रौपदी ने भी अपने अपमान का बदला लेने के लिए दुशाशन का वध चाहा था |

महाभारत युद्ध का सत्रहवा दिन Day 17 of Kurukshetra War in Mahabharat

Karna Arjun War in Mahabharata17वे दिन कर्ण ने पांडव भाइयो नकुल , भीम ,सहदेव और युधिष्ठिर को रणभूमि में पराजित कर दिया लेकिन उंनका वध नही किया | अब कर्ण अर्जुन के पास गया और मार्ग में उसके रथ का पहिया कीचड़ में फंस गया था इसलिए उसने अर्जुन से रुकने को कहा और धर्म की दुहाई दी  | तब श्रीकृष्ण ने कर्ण से कहा “जब  भरी सभा में द्रौपदी को घसीटकर लाये तब तो तुम्हे धर्म याद नही आया , जब अभिमन्यु को तुमने एक साथ घेरकर मार दिया तब धर्म कहा था , आज तुम्हारे समक्ष मुसीबत है इसलिए तुम धर्म को याद कर रहे हो ” | अब कर्ण ने अटके रथ से ही युद्ध जारी रखा | श्रीकृष्ण की बातो से अपने पुत्र की म्रत्यु का बदला लेते हुए अर्जुन ने कर्ण पर तीर चलाकर उसका सिर धड से अलग कर दिया |  युद्ध से पहले इंद्रदेव ने उनके जन्मजात कवच और कुंडल उतरवा लिए थे जिससे उसकी मृत्यु हो गयी |

महाभारत युद्ध का अठारहवा दिन Day 18 of Kurukshetra War in Mahabharat

18वे दिन कौरवो की सेना की कमान शल्य ने ली | युधिष्ठिर  ने शल्य को मार गिराया और सहदेव ने शकुनि को मार दिया | दुर्योधन अब पराजय को सामने देख रणभूमि से भाग गया और एक झील के समीप शरण ली जहा पांड्वो ने उसे पकड़ लिया |  अब भीम और दुर्योधन के बीच गदा युद्ध शुरू हो गया | भीम ने दुर्योधन के कमर के नीचे वार करते ही उसे अचेत कर दिया | अब अश्वत्थामा , कृपाचार्य और कृतवर्मा दुर्योधन से मिले और उसके घावो का बदला लेने का वचन दिया | उन्होंने उसी रात पांड्वो पर आक्रमण कर दिया और पांड्वो की बची सना को खत्म कर दिया | भीम ने अश्वत्थामा को पराजित कर दिया और भीम के प्रहारों से घायल हुए दुर्योधन ने भी दम तोड़ दिया |धृष्टधुय्म ,शिखंडी और द्रौपदी के पुत्र मारे गये | पांड्वो ओर श्रीकृष्ण के अलावा केवल युयुत्सु और सत्यकी शेष रहे | अंत में श्रीकृष्ण ने शंख बजाकर महभारत युद्ध के अंत की घोषणा की |

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