श्रीकृष्ण का शांतिदूत बनना और युद्ध की तैयारिया Mahabharata-Krishna and War Preparations

Loading...

Krishna-Arjunaपांड्वो के 12 वर्ष के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास के पश्चात वो युद्ध की मन्त्रणा में लग गये |वो विराटनगर से निकलकर उपल्व्यनगर में रहने लग गये और दूत भेजकर अपने मित्र बंधुओ को एकत्रित करना प्रारम्भ कर दिया | श्रीकृष्ण अपने भाई बलराम ,बहन सुभद्रा , भांजे अभिमन्यु और कई यदुवंशीयो को लेकर उप्ल्व्यनगर पहुचे |दुसरी तरफ पांचाल नरेश और काशीराज भी अपनी सेनाये लेकर पांड्वो की सहायता के लिए पहुचे |सबसे पहले अभिमन्यु का विवाह राजा विराट की पुत्री उत्तरा के साथ किया गया और फिर मंत्रणा में लग गये |

श्रीकृष्ण का मानना था कि पांडव शांत हो जाए और दोनों के मध्य संधि हो जाए इसके लिए किसी को शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर जाना होगा | श्रीकृष्ण के भाई बलराम ने भी उनका समर्थन किया लेकिन उनकी बातो का पांड्वो के हितैषीयो ने विरोध किया और पांडव-द्रौपदी का अपमान का बदला लेने को कहा | श्रीकृष्ण की बात किसी ने नही मानी और उनको वापस द्वारका लौटना पड़ा | अब पांडव अपनी सेना बढ़ाने में लग गये थे और चारो दिशाओ में दूत भेजकर सेना एकत्रित करने लगे |

श्रीकृष्ण स्वयं एक महान योद्धा थे और उनके पास नारायणी सेना नाम से एक विशाल सेना थे | अर्जुन श्रीकृष्ण से सहायता के लिए द्वारका के लिए रवाना हो गये , संयोग से दुर्योधन भी उसी समय श्रीकृष्ण से मिलने के लिए आया | अब दुर्योधन अर्जुन से पहले आ गया लेकिन श्रीकृष्ण उस वक़्त सो रहे थे इसलिए अभिमानी दुर्योधन श्रीकृष्ण के बिस्तर के पास उनके सर की तरफ बैठ गया और उनके जगने के इंतजार करने लगा | थोड़ी देर बाद अर्जुन भी वहा पहुच गया लेकिन श्रीकृष्ण के विनम्र भक्त होने के नाते वो श्रीकृष्ण के पैरो की तरफ जमीन पर बैठ गया | जब श्रीकृष्ण जगे तो उन्होंने सर्वप्रथम अपने पैरो की तरफ बैठे अर्जुन को देखा इसलिय उन्होंने अर्जुन को उसका अनुरोध सुनने का अधिकार दिया |

अब श्रीकृष्ण ने दुर्योधन और अर्जुन दोनों को कहा ” जैसा कि तुम दोनों जानते हो मेरे पास नारायणी नामक वीरो की सेना है लेकिन मेरे लिए तुम दोनों एक समान हो इसलिए मै ये प्रतिज्ञा लेता हु कि युद्ध में कोई अस्त्र-शस्त्र नही उठाऊंगा और एक सेना में मै अकेला निशस्त्र रहूँगा और दुसरी तरफ मेरी नारायणी सेना रहेगी , इसलिए अर्जुन मै तुमको चुनाव का पहला मौका देता हु तुम मुझे या मेरी नारायणी सेना में से किसे चाहते हो ” | अब दुर्योधन घबरा गया क्योंकी यदि अर्जुन नारायणी सेना मांग लेगा तो वो निशस्त्र कुष्ण का क्या करेगा लेकिन अर्जुन ने बड़ी विनम्रता से श्रीकृष्ण से कहा “आप चाहे कोई शश्त्र उठाये या ना उठाये , आप चाहे लड़े या ना लड़े  लेकिन आपसे विन्रम विनती है कि मै आपको ही अपनी सेना में चाहता हु ” |

दुर्योधन मन ही मन बहुत खुश हुआ और अर्जुन को मुर्ख समझने लगा कि उसने विशाल नारायणी सेना के स्थान पर निहत्थे श्रीकृष्ण का चुनाव कर लिया | अब दुर्योधन को नारायणी सेना मिल गयी और वो चला गया | बाद में अर्जुन ने श्रीकृष्ण ने प्रार्थना कि “वासुदेव ये तो निश्चित हो गया कि आप मेरी तरफ से युद्ध करेंगे और आप अकेले ही अनेको महारथियों के बराबर है लेकिन मेरी ये इच्छा है कि आप युद्ध  मेरे सारथी बनकर मेरा मार्गदर्शन करे  ” | अब अर्जुन भी संतुष्ट होकर चला गया |

अब दुर्योधन सहायता के लिए श्रीकृष्ण के भाई बलराम के पास गया और उनसे युद्ध में उनका साथ देने को कहा | जवाब में बलराम ने कहा “दुर्योधन , तुम तो जानते हो कि कौरव और पांडव दोनों ही मेरे संबंधी है , मैंने तो कृष्ण को भी इस युद्ध में हिस्सा लेने के लिए मना किया लेकिन वो मेरी सुनता नही है , अब तुम तो जानते हो जिस तरफ कृष्ण ना हो उधर तो मेरा रहना उचित नही है और अर्जुन की सहायता मै नही करूंगा ,  इसलिए मैं तुम्हारी भी सहायता नही कर सकता हु , मै इस युद्ध में तटस्थ रहने का वचन देता हु ” | बलराम उन महारथियों में से एक थे जिन्होंने कुरुक्षेत्र युद्ध में भाग नही लिया था |

अब दुर्योधन के खुशी की सीमा नही रही क्योंकि एक तरफ उसको श्रीकृष्ण की नारायणी सेना मिल गयी और दुसरी तरफ बलराम जी भी युद्ध में हिस्सा नही लेंगे | अब मद्रदेश के राजा शल्य नकुल-सहदेव की माता के भाई थे इसलिए वो पांड्वो की सहायता के लिए उप्ल्व्यनगर जाने की तैयारिया की और अपनी सेना का पड़ाव मध्य में रखे हुए थे | उसी समय दुर्योधन को ज्ञात हुआ कि राजा शल्य पांड्वो के पास जा रहे थे तो उसने सोचा कि राजा शल्य की सेना बहुत विशाल है और यदि उन्हें वो सेना मिल गयी तो वो अधिक शक्तिशाली हो जायेंगे | अब दुर्योधन राजा शल्य के डेरे पर पहुच गया और उसका आदत सत्कार करने लगा | राजा शल्य ने प्रसन्न होकर दुर्योधन को उसकी तरफ से लड़ने का वचन दिया |

अब राजा शल्य उपलव्यनगर पहुच गये और उनको बताया कि दुर्योधन ने धोखे से उसको उसकी तरफ कर दिया लेकिन वचनबद्ध होने के कारण अब वो पांड्वो के बजाय कौरवो की तरफ से ही लड़ेंगे | अब पांड्वो के तरफ साथ अक्शोहिणी सेना और कौरवो की तरफ ग्यारह अक्शोहिणी सेना हो गयी थी |  अब हस्तिनापुर की सभा में भीष्म पितामह ने पांड्वो के साथ संधि करने का प्रस्ताव रखा और भीष्म पितामह के कहने पर धृतराष्ट्र ने संजय को दूत बनाकर पांड्वो से मित्रता का प्रस्ताव देकर भेजा | संजय ने उपलव्यनगर जाकर युधिष्ठिर से मुलाकात की और संधि क प्रस्ताव रखा | युधिष्ठिर तो प्रसन्न हो गया क्योंकि वो तो युद्ध नही करना चाहता था |फिर भी उन्होंने श्रीकृष्ण की सलाह लेना उचित समझा और पांड्वो का शांतिदूत बनाकर श्रीकृष्ण को हस्तिनापुर भेजा | उसने संजय को ये कहकर भेजा कि यदि वो उनको केवल पांच गाँव ही देदे तो यो संतोष कर लेगे और संधि कर लेंगे |

अब राजदूत संजय के साथ श्रीकृष्ण हस्तिनापुर ले लिए रवाना हो गये | उधर दुर्योधन ने अपने पिता को संधि प्रस्ताव स्वीकार करने से रोकते हुए कहा “पिताश्री आप पांड्वो की चाल समझे नही , वो हमारी विशाल सेना से डर गये है इसलिए केवल पांच गाँव मांग रहे है अब हम युद्ध से पीछे नही हटेंगे ” | धृतराष्ट्र ने समझाया “पुत्र यदि केवल पांच गाँव देने से युद्ध टलता है तो इससे बेहतर क्या हो सकता है इसलिए अपनी हठ छोडकर पांड्वो से संधि कर लो ताकि ये विनाश टल जाए ” | दुर्योधन अब गुस्से में आकर बोला “पिताश्री मै एक तिनके भी भी भूमि उन पांड्वो को नही दूंगा और अब फैसला केवल रणभूमि में ही होगा ” |

अब शांति वार्ता के लिए निकले श्रीकृष्ण हस्तिनापुर पहुच गये और उनका वहा पर भव्य स्वागत हुआ | श्रीकृष्ण ने अगले दिन सभा में आकर धृतराष्ट्र से बोले “राजन , आप जानते है कि पांडव शांतिप्रिय है लेकिन इसका मतलब ये नही है कि वो युद्ध के लिए तैयार नही है , पांडव आपको पितास्वरुप मानते है इसलिए आप ही उचित फैसला ले ” | धृतराष्ट्र ने भी श्रीकृष्ण की सहमति जताई और श्रीकृष्ण ने पानी बात जारी रखते हुए दुर्योधन से कहा “दुर्योधन मै तो केवल इतना चाहता हु कि तुम पांड्वो को आधा राज्य लौटकर उनसे संधि कर लो , अगर ये शर्त तुम मान लो तो पांडव तुम्हे युवराज के रुप में स्वीकार कर लेंगे ” | इसके बाद भीष्म पितामह और गुरु द्रोण ने भी दुर्योधन को समझाया लेकिन वो अपनी हठ पर अड़ा रहा और उसने अपनी माँ गांधारी की बात भी नही सूनी | अब शांतिदूत बने श्रीकृष्ण को ज्ञात हो गया कि अब शांति स्थापना की सभावना लुप्त हो चुकी है और वो वापस उपलव्यनगर लौट आये |

अब कुंती ने कर्ण को सारी सच्चाई बताई कि वो उनका पुत्र और पांडव उनके भाई है  और अपने भाइयो के विरुद्ध युद्ध करने से मना किया | लेकिन कर्ण ने अंतिम समय पर कौरवो का साथ छोड़ने से मना कर दिया और केवल कुंती को इतनी सांत्वना दी कि वो अर्जुन को छोडकर किसी पांडव के प्राण नही लेगा |  इस तरह अब कौरवो और पांड्वो की सेना युद्ध के लिए तैयार हो गया |

Loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *