महाभारत कथा – शांतनु और देवव्रत Mahabharata Katha- Shantanu and Devavratha

Mahabharata Katha- Shantanu and Devavratha

Shantanu and Devvrathराजा शांतनु गंगा के जाने के बाद प्रतिदिन अपने घोड़े पर बैठकर जंगल आते थे | वो अब शिकार करना भूल गये थे और उन्होंने कभी किसी जीव को नही मारा | अब वो जंगल से होते हुए नदी तक आते और घंटो तक नदी के किनारे बैठकर गंगा की यादो में खोये रहते थे | शांतनु ने उस दिन के बाद कभी गंगा को नही देखा लेकिन उससे मिलने की आस में हमेशा उस तट पर आते थे | उन्हें सब कुछ शांतिपूर्ण लगता था |

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शांतनु को इस तरह गंगा को देखे 16 वर्ष हो गये थे और अभी तक वो अपने पहले प्यार को भूल नही पा रहे थे | एक दिन शांतनु को दूत ने आकर सुचना दी कि किसी योधा ने हस्तिनापुर के निकट गंगा का प्रवाह रोकने का प्रयास किया है | उस योद्धा ने अपने तीरों से एक बाँध बना दिया है जिससे पानी का प्रवाह रुक गया है | शांतनु तुरंत नदी के तट पर पंहुचा और वहा के दृश्य को देखकर स्तब्ध रह गया | उसने देखा कि एक नौजवान गंगा नदी पर अपनी तीरंदाजी कौशल का अभ्यास कर रहा था लेकिन उसने किसी इन्सान को नुकसान नही पहुचाया था | शांतनु ने अपना धैर्य खोते हुए अपना धनुष उठाया और उस नौजवान को युद्ध की चुनौती दी |

तभी उसी वक़्त गंगा के पाने में एक भंवर आया और इंसानी रूप में गंगा शांतनु के सामने आ गयी और कहा “महाराज , जिस नौजवान को आपने शत्रु के रूप में चुनौती दी है वो आपका अपना पुत्र है जिसे 16 वर्ष पहले मै स्वर्ग लेकर गयी थी , वो केवल परशुराम द्वारा सिखाये गये तीरंदाजी कला का अभ्यास कर रहा था और उसका नाम देवव्रत Devavratha है ” | शांतनु ने खुशी से रोते हुए कहा “मेरा पुत्र , 16 वर्ष बाद अपने पुत्र से दूर रहकर आज मै अपने पुत्र को देख रहा हु , कितना शुभ दिन है ” |

अब गंगा ने शांतनु को कहा “हां महाराज , ये वही पुत्र है जिसके लिए आपने अपना वचन तोडा था , आज मै इसे लौटाकर अपन कर्तव्य से निवुर्ट होना चाहती हु , अब इस जम्बुद्वीप पर देवव्रत से ज्यादा शक्तिशाली और कुशल योद्धा कोई ओर नही होगा , उसने शाश्त्रो की शिक्षा ऋषि वशिष्ठसे ली : ऋषि बृहस्पति और ऋषि शुक्राचार्य से राजनीतिशास्त्र की शिक्षा ली : ऋषि मार्कण्डेय उनके आध्यात्मिक गुरु है , मेरे आग्रह करने पर परशुरामजी ने आपके पुत्र को युद्ध कला और तीरंदाजी भी सिखाई , मै अब अपने इस पुत्र को आपको सौंपती हु ”

अब गंगा ने अपने पुत्र की और मुड़ते हुए उससे कहा “तुम्हारे पिता ने जीवन में बहुत कुछ देखा है उनका ध्यान रखना कि वो कभी उदास ना रहे , तुम अब अपने पिता एक साथ रहकर धर्म का पालन करो , अब मुझे तुम्हे छोड़ने का समय आ गया है , जब भी तुम्हे मुझसे मिलने की इच्छा हो , नदी के तट पर आकर मुझे पुकार लेना और तुम्हारी माँ सदैव तुम्हारे पथप्रदर्शन के लिए तैयार रहेगी ” | इस तरह गंगा ने ये कहते हुए गंगा वापस पाने में अदृश्य हो गयी |

अब शांतनु के जीवन की शुन्यता को उसके समर्थ पुत्र ने भर दिया | हालांकि उनका प्यार उनके साथ नही है लेकिन उनके प्यार की निशानी को हस्तिनापुर के सिंहासन के लिए छोड़ दिया | अब पुत्र पिता साथ साथ रिश्तेदारी, राजनीति, रणनीति, वेद और पूर्वजों और महान राजाओं और योद्धाओं के इतिहास पर बिचार विमर्श करने लगे | कम उम्र में ही युवा राजकुमार ने हस्तिनापुर के लोगो के बीच प्रसिधी पा ली थी | अब शांतनु ने देवव्रत Devavratha को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया | अब देवव्रत को देखकर जनता ने अपने पुराने राजा की तरह आशा की किरन देखी कि वो भी साम्राज्य विस्तार करेगा और अपनी जनता को खुश रखेगा |लेकिन विधाता को कुछ ओर ही मंजूर था और देवव्रत के जीवन में नया मोड़ आने वाला था | ऋषि वसिष्ठ का श्राप उन पर जल्द ही प्रभावी होने वाला था |

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