महाभारत कथा -भीष्म प्रतिज्ञा के रूप में देवव्रत का बलिदान Mahabharat Katha-Devavratha Sacrifices as Bhishma vow

Bhishma Pratigyaदेवव्रत के उत्तराधिकारी घोषित किये जाने के पश्चात उसने बहुत अच्छी तरह से राजपाट संभाला | देवव्रत सदैव जनता की भलाई के लिए अग्रसर रहता था और किसी से ज्यादा वार्तालाप नही करता था | देवव्रत अपने पिता को हरसंभव खुश रखने का प्रयास करता था | शांतनु ने ये भी महसूस किया कि देवव्रत ने कभी गंगा को याद नही किया और राजधर्म का पालन करता रहा | इस तरह हस्तिनापुर का साम्राज्य में खुशी की लहर छाई | इस तरह चार वर्ष बीत गये |

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एक दिन राजा शांतनु यमुना तट पर घुमने आये तो उन्हें एक अप्सरा जैसी सुन्दरी दिखी जिसका नाम सत्यवती था | गंगा के वियोग के बाद ये पहली युवती थी जिसे देखकर राजा शांतनु का मन प्रफुल्लित हो गया था | राजा शांतनु ने उस सुन्दरी सत्यवती से विवाह करने का प्रस्ताव रखा | इस पर सत्यवती ने कहा कि यदि मेरे पिता राजी हो जाते है तो मुझे कोई आपत्ति नही है | राजा शांतनु अब सत्यवती के पिता केवटराज से मिलने पहुचे और उनसे उनकी पुत्री से विवाह करने का आग्रह किया |

अब केवटराज ने कहा “मै अपनी पुत्री का विवाह आपसे करा दू यदि आप मुझे एक वचन देवे ” | राजा शांतनु पहले भी वचनों में बंधकर काफी दुःख पाया था लेकिन फिर भी विवाह की तीव्र इच्छा के आगे उन्होंने केवटराज को वचन देने का निर्णय किया | अब केवटराज ने कहा “मै अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह आपसे तभी करा सकता हु यदि आप मुझे ये वचन देवे कि आपके पश्चात राज सिंहासन का उत्तराधिकारी मेरी पुत्री की सन्तान बैठेगी “|

राजा शांतनु एक बार तो उनके इस वचन को सुनकर विचार में पड़ गया क्योंकि वो गंगापुत्र देवव्रत के अलावा किसी और को उत्तराधिकारी के रूप में नही देख सकता था | उन्होंने निराश होकर उन्हें मना कर दिया और वापस नगर लौट आये | राजा शांतनु के नगर में लौटने के पश्चात भी उनका मन उद्दिग्न था | जब देवव्रत ने राजा शांतनु को उदास देखा तो उनकी उदासी का कारण पूछा | राजा शांतनु देवव्रत को सत्य नही बताना चाहता था इसलिए चिंता का कारण कोई ओर बता दिया |

फिर भी देवव्रत से रहा नही गया और बुद्धिमान देवव्रत ने राजा शांतनु के सारथी से पूछताछ की | सारथी ने देवव्रत को सारी घटना सुना दी कि किस तरह वो सत्यवती को दिल दे बैठे और उनसे विवाह करने का प्रस्ताव लेकर सत्यवती के पिता के पास गये और केवटराज के वचन सुनकर उन्होंने मना कर दिया था | देवव्रत अब अपने पिता की व्याकुलता को समझते हुए केवटराज के पास गये और उनसे उनकी पुत्री का विवाह राजा शांतनु से कराने की प्रार्थना की | लेकिन केवटराज ने वही शर्त इस बार भी दोहराई जो उन्होंने राजा शांतनु से कही थी |

अब देवव्रत ने कहा कि “अगर आपकी विवाह के लिए मना करने का कारण यही है तो मै वचन देता हु कि सिंहासन का लोभ त्यागकर सत्यवती के पुत्र को ही राजसिंहासन पर बिठाऊंगा ” | देवव्रत के इस सिंहासन के बलिदान के बावजूद केवटराज संतुष्ट नही हुए और कहा “मै आपके वचन का सम्मान करता हु और मुझे पूरा विश्वास है कि कुरु वंश वचन के लिए प्राण भी दे सकता है किन्तु मै आपकी सन्तान पर कैसे विश्वास कर सकता हु , अगर वो भी आपकी तरह शक्तिशाली हुआ तो मेरे नाती से सिंहासन छीन सकता है आप इसके लिए क्या कर सकते है ” |

देवव्रत को केवटराज की बात उचित लगी और उनका कहने का तात्पर्य यही था कि यदि देवव्रत यदि अपने भविष्य का बलिदान कर दे तो उनका वचन पूरा हो सकता है | अब देवव्रत ने कुछ समय सोचने के पश्चात एक भीषण प्रतिज्ञा ली “मै ,गंगा पुत्र देवव्रत , आज ये वचन देता हु कि मै आजीवन विवाह नही करूंगा और आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करूंगा, ना मेरी सन्तान होगी और ना ही आपके नाती को कोई सिंहासन से उठाएगा “| उनके इस उद्घोष के साथ ही देवो ने स्वर्ग से देवव्रत पर फूलो की बारिश करी | इस तरह देवव्रत ने केवटराज को संतुष्ट करने के लिए भीषण प्रतिज्ञा ली जिसके बाद से उनका नाम भीष्म पड़ गया |अब केवटराज भीष्म की भीषण प्रतिज्ञा सुनकर संतुष्ट हो गये और अपनी पुत्री का विवाह देवव्रत से करा दिया |

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