महाभारत कथा – सत्यवती के पुत्रो की कहानी | Mahabharat Katha-Sons of Satyavati

महाभारत कथा – सत्यवती के पुत्रो की कहानी | Mahabharat Katha-Sons of Satyavati

महाभारत कथा - सत्यवती के पुत्रो की कहानी | Mahabharat Katha-Sons of Satyavatiराजा शांतनु उनके पुत्र देवव्रत की भीषण प्रतिज्ञा को सुनकर चौंक गये कि उनके पुत्र ने अपनी पिता की खुशी के लिए सिंहासन तक त्याग दिया | एक तरफ राजा शांतनु सत्यवती को पाकर प्रस्सन था और दुसरी तरफ अपने पुत्र की इस पप्रतिज्ञा पर पछतावा हो रहा था | राजा शांतनु ने सोचा कि देवव्रत तो अब भीष्म बन गया है और उसके कारण वो कभी पिता नही बन सकेगा | भीष्म ने कभी भी अपनी प्रतिज्ञा के लिए अपने पिता को जिम्मेदार नही ठहराया था | अब शांतनु को पता था कि भीष्म कभी प्रतिज्ञा नही तोड़ेगा और इस वचन को आजीवन निभाएगा |

जब हस्तिनापुर की जनता को इस बारे में पता चला तो वो बहुत दुखी हो गये क्योंकि वो भीष्म को राजा के रूप में देखना चाहते थे | लेकिन धीरे धीरे लोगो को पता चल गया कि भीष्म कभी खुद सिंहासन पर नही बैठेंगे लेकिन सिंहासन के पीछे असली शक्ति उन्ही की होगी | अब जनता ने सत्यवती को भी अपना लिया था और जनता उसका आदर करने लगी थी |

सत्यवती से शांतनु के दो पुर हुए चित्रांगद और विचित्रवीर्य | भीष्म ने उन्हें खूब स्नेह दिया और अपने भाइयो को पुत्र की तरह पालन पोषण किया क्योंकि शांतनु अब काफी वृद्ध हो गये थे | भीष्म अपने पिता के बाद चित्रांगद को सिंहासन पर बिठाना चाहते थे लेकिन सत्यवती ने आग्रह किया कि राजा शांतनु के जीवित रहते भीष्म युवराज रहे | चित्रांगद एक अच्छे योद्धा थे और अपने भ्राता भीष्म से युद्ध कला और राजनीति सीखी थी | कुछ दिनों बॉस शांतनु का देहांत हो गया और चित्रांगद को हस्तिनापुर का राजा घोषित किया गया |

चित्रांगद राजा बनने के पश्चात अपने बड़े भ्राता भीष्म पर पूर्णत निर्भर रहता था | चित्रांगद ने बहादुर योद्धा की तरह कई युद्ध लड़े और पड़ोसी राज्यों को पराजित कर साम्राज्य विस्तार किया | एक दिन भीष्म साम्राज्य की सीमा पर जनता के मामलो की सुनवाई के लिए गये | उसी दिन चित्रांगद के दरवार में गरज करता हुआ एक गंधर्व आया | उसने अपने आप को गन्धर्वो का राजा चित्रांगद बताया | उधर दरबार के सभी लोग उस शक्तिशाली गंधर्व को देखकर चकित रह गये | गंधर्व ने अपनी तलवार निकलते हुए कहा “चित्रांगद नाम से दो राजा नही हो सकते , मै ही असली राजा हु तुम तो एक कमजोर दयनीय मानव हो जबकि मै एक गंधर्व हु , तुमने अपना नाम मेरे नाम पर रखकर मुझे क्रोधित किया है इसलिए तुम अपनी मौत के लिए तैयार हो जाओ ”

कुरु राजा चित्रांगद ने उसकी चुनौती स्वीकार कर युद्ध के लिए तैयार हो गये | हिरान्यव्ती नदी के किनारे पर उन दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ | दोनों ही शूरवीर और शक्तिशाली थे | अब कुरु राजा गंधर्व के वारो को सहन नही कर पा रहा था और अंत में कुरु राजा चित्रांगद को गंधर्व ने पराजित कर मार दिया | इस भयावह दृश्य को पूरा साम्राज्य देख रहा था | इस घटना के बाद गंधर्व वहा से गायब हो गये |

भीष्म जब वापस लौटे तो सत्यवती ने उनको सारी घटना बताई कि किस तरह गंधर्व ने चित्रांगद को मार दिया | भीष्म अब दुःख के सागर में डूब गये क्योंकि उनका प्रिय भाई अब इस दुनिया में नही रहा था | सत्यवती ने अब सिंहासन के उत्तराधिकारी के लिए बात की | चित्रांगद के कोई सन्तान नही थी फलस्वरूप नियमो के अनुसार उसके छोटे भाई विचित्रवीर्य को सिंहासन पर बिठाया गया | अब विचित्रवीर्य ने अपने भ्राता के नेतृत्व में हस्तिनापुर का राज पाट संभाला |

loading...
Loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *