फ़िल्मी गायकी के शिखर कुंदनलाल सैहगल की जीवनी | Kundan Lal Saigal Biography in Hindi

Kundan Lal Saigal Biography in Hindi

kundan-lal-saigal-biography-in-hindiजिस व्यकित ने विधिपूर्वक कभी संगीत नही सीखा , जीवन निर्वाह के लिए जो कभी कपड़ो की गाँठ पीठ पर लादे फिरता रहा , कभी रेलवे में मामूली नौकरी की तथा कभी टाइपरायटरो का एजेंट रहा , उसी कुंदनलाल सैहगल Kundan Lal Saigal ने आगे चलकर हिंदी फिल्म संगीत को श्रेष्ठता के शिखर तक पहुचाया | उनके निधन को आधी शताब्दी बीत चुकी है | मात्र 42 वर्ष की आयु वाले सैगल ने 27 वर्ष संगीत साधना में व्यतीत किये | आइये आज हम आपको फ़िल्मी गायकी के उस महान शिखर पुरुष की जीवनी से रूबरू करवाते है |

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Kundan Lal Saigal कुंदनलाल सैहगल का जन्म 4 अप्रैल 1904 को जम्मू में हुआ था | वे मूलतः पंजाब के रहने वाले थे किन्तु उनके पिता अमरचंद सैहगल जम्मू कश्मीर राज्य में तहसीलदार थे | नौकरी से अवकाश लेने के बाद वे जालन्धर में रहने लगे और यहा पंजपीर गेट के पास उन्होंने अपना मकान बनवा लिया था | इस जगह को अब “सैहगल मोहल्ला” के नाम से पुकारा जाता है | पिता की अपेक्षा सैहगल की माँ उनके प्रति अधिक दयालु थी जबकि पिता उनसे नाराज रहते थे |

इसका एक कारण तो Kundan Lal Saigal कुंदनलाल का पढने में अधिक रूचि न लेना था | बालक कुंदन अपने स्कूल से प्राय: भाग जाता था और किसी एकांत स्थल पर बैठकर दिवास्वप्न में खो जाता था | स्कूल की पढाई उसके लिए भार स्वरूप थी | पिता इसी बात को लेकर चिंतित रहते कि आगे चलकर यह लड़का किसी कार्य या व्यवसाय में ठीक ठाक जम भी सकेगा या नही | बाल्यकाल से ही सैगल की अभिनय में रूचि रही | दस बरस की आयु में उसने जम्मू में होने वाली रामलीला में सीता का पार्ट करना आरम्भ कर दिया | वह धीमी आवाज में संवाद बोलता |

रावण की भूमिका करने वाला अभिनेता सुनील रैना जब सीता रूपधारी सैगल का वनवास में अपहरण करता तो कुंदन के मुंह से पुरी चीख भी नही निकलती थी | पढाई में दिलचस्पी न रखने के कारण बालक कुंदन को तो हर साल अक्टूबर के महीने में होने वाली रामलीला का इन्तजार रहता था | इन्ही दिनों संगीत में भी उसकी रूचि हुयी |वह प्राय: एकांत में बैठकर गुनगुनाता | घर में बैठकर गुनगुनाने में ही सारा दिन बिता देने वाले कुंदनलाल की इस आदत से उसके पिता को अशांत और क्षुब्ध कर डाला | अपने पुत्र के भविष्य के प्रति उनकी चिंता स्वाभाविक थी |

अंतत: Kundan Lal Saigal कुंदनलाल ने अपने जीवन का लक्ष्य संगीत को बनाने का निश्चय कर घर को त्याग दिया | उस जमाने में All India Radio के डायरेक्टर सैयद अली बुखारी सैगल के अन्तरंग मित्र थे | उन्होंने बाद में बताया कि घर छोड़ देने के बाद भी सैगल अपनी माता को पत्र लिखकर उन्हें अपनी गतिविधियों की जानकारी देते रहते थे किन्तु उन्होंने माता को भी अपना पता नही बताया था | कुछ समय तक उन्होंने रेमिंगटन टाइपराइटर कम्पनी में सेल्समैन का काम किया | बाद में उन्होंने रेलवे में भी नौकरी की |

रेलवे में मुलाजिम प्रसिद्ध सारंगी वादक इमित्याज अली सैगल के बारे में अपने संस्मरण सुनाते हुए बताते है कि सैगल अभी पुरे 20 बरस के भी नहे थे | उन दिनों वे मुरादाबाद में थे जहा अंग्रेज स्टेशन मास्टर की पत्नी उनके प्रति स्नेह रखती थी | इस अंग्रेज महिला ने सैगल को अंग्रेजी सिखाई तथा शाशको की भाषा का पूरा अभ्यास कराया | सैगल ने संगीत की विधिवत शिक्षा नही पायी थी | गायन में उनकी रूचि जन्मजात थी | संगीत साधना उनके जीवन का लक्ष्य रही , मात्र जीविकोपार्जन का साधन नही |

प्राय:  देखा जाता है कि ख्यातिप्राप्त संगीतकार अपनी फीस निश्चित किये बिना कुछ नही गाते किन्तु सैगल की प्रकृति इसके विपरीत थी | उन्होंने तो बहुत बाद में जाकर यह जाना कि संगीत के द्वारा बहुत से भौतिक लाभ भी प्राप्त किये जा सकते है | कलकत्ता की प्रसिद्ध फिल्म कम्पनी न्यू ठेअतेर्मे सैगल का प्रवेश उनके जीवन का एक नूतन अध्याय था | इसके संस्थापक बी.एन.सरकार , संगीत निर्देशक रायचन्द बोराल और पंकज मलिक – इन तीनो ने सैगल को फिल्म जगत में प्रतिष्टित होने में मदद की |

1932 ने सैगल “मोहब्बत के आंसू” “सुबह का सितारा ” तथा “जिन्दा लाश” इन तीन फिल्मो में दिखाई पड़े | 1933 में उन्होंने “यहूदी की लडकी ” तथा “कारवाने हयात” में काम किया | उनके अभिनय तथा गायन का चमत्कारी प्रभाव दर्शको ने अनुभव किया | 1934 में उनकी तीन फिल्मे रिलीज़ हुयी “चण्डीदास” “डाकू मंसूर” और “रूप लेखा” | सैगल के गायन और अभिनय को अभूतपूर्व लोकप्रियता मिली फिल्म “देवदास” से जो , 1935 में बांगला और हिंदी दोनों में बनी |

कलकत्ता से चलकर 1941 में सैगल फिल्म राजधानी मुम्बई आये | यहा भी रजतपट संसार ने उनका दिल खोलकर स्वागत किया | बम्बई को रणजीत मूवीटन में वे गायक अभिनेता के रूप में रहे और “भक्त सूरदास” , “तानसेन”, “भंवरा” , “कुरुक्षेत्र”, “शाहजहा” आदि फिल्मो में उनके गीत काफी लोकप्रिय हुए | उन्होंने इस धारणा को गलत सिद्ध कर दिया कि केवल चेहरे की खूबसूरती ही अभिनय की सफलता का कारण बनती है | सैगल आम आदमी की भाँती साधारण चेहरे मोहरे के सीधे साधे इंसान थे |

काश Kundan Lal Saigal सैहगल ने मदिरापान व्यसन से अपना स्वास्थ्य नष्ट नही किया होता तो वे कुछ अधिक जीवित रहते तथा मौसिकी की दुनिया को कुछ अधिक दे जाते |उनका स्वास्थ्य पहले भी अच्छा नही था | मधुमेह और जिगर के रोग ने उनकी काया को क्षीण बना दिया था | 1946 में जब शाहजहा की भूमिका करते हुए उन्होंने पत्नी मुमताज के वियोग से दुखी इस बादशाह की अंतर्वेदना को “अब जीकर क्या करेंगे , जब दिल ही टूट गया” के स्वर में मुखरित किया तो यह लगा कि यह पीड़ा और निराशा खुद गायक की है |

18 जनवरी 1947 को उनका निधन हो गया | श्रीलंका रेडियो प्रतिदिन प्राय: उनका गाया एक गीत सुनाता है | काबुल ,कुवैत ,रब्बात और नैरोबी में उनके गीत प्रसारित होते है | तेहरान रेडियो उनकी गाई फारसी गजलो का प्रसारण करता है | नई पीढ़ी के श्रोता भी सैगल को भूले नही है |

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