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कोणार्क सूर्य मन्दिर , वास्तुकला एवं मूर्तिकला का अद्भुद मिश्रण | Konark Sun Temple Travel Guide in Hindi

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कोणार्क सूर्य मन्दिर , वास्तुकला एवं मूर्तिकला का अद्भुद मिश्रण | Konark Sun Temple Travel Guide in Hindi
कोणार्क सूर्य मन्दिर , वास्तुकला एवं मूर्तिकला का अद्भुद मिश्रण | Konark Sun Temple Travel Guide in Hindi

उड़ीसा में तमाम धार्मिक पर्यटन स्थल है जिनमे से कोणार्क का सूर्य मन्दिर (Konark Sun Temple) अतिविख्यात है | इस मन्दिर में वास्तुकला और मूर्तिकला के अद्भुत सम्मेलन को देखकर चकित रह जाना पड़ता है | 9वी शताब्दी में केसरी वंश के एक राजा ने इसका निर्माण करवाया था | कालान्तर में गंग वंश के राजा तांगुला नरसिंह देव ने 13वी शताब्दी में नये सिरे से इसका निर्माण करवाया था | इसके निर्माण के संबध में एक बड़ी रोचक कहानी प्रचलित है |

कहा जाता है कि नरिसंह देव ने कारीसन के युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद सूर्य उपासना के लिए यह मन्दिर बनवाया था | यह भी कहा जाता है कि राजा कुष्ट रोग हो गया था | किसी ने उनसे कहा कि समुद्रतट पर यदि आप सूर्य-मन्दिर बनवाकर सूर्य की उपासना करे तो आपको रोग से मुक्ति मिल जायेगी | राजा ने चन्द्रप्रभा नदी और समुद्रत के संगम स्थल को मन्दिर निर्माण के लिए उपयुक्त स्थान समझकर वहां पर सूर्य मन्दिर का निर्माण करवाया जो कोणार्क के नाम से प्रसिद्ध है |

कोणार्क अक सूर्य मन्दिर (Konark Sun Temple) रथ के आकार का है जिसे सात अश्व खीचते है | इसमें बड़े बड़े पत्थरों के सहत लोहे की मोटी कड़ीयो का भी उपयोग किया गया है | रथ को हवा से बाते कराते जा रहे हो | रथ में 24 पहिये है | प्रत्येक पहिये का व्यास नौ फुट आठ इंच है | ये 24 पहिये चौबीस घंटो के प्रतीक है | मन्दिर की नींव दस फुट ऊँचे 12 पहियों पर आधारित है | बड़ी शान से गर्दन उठाये सावल घोड़े गतिशील मुद्रा में है | लगता है ये रथ को आसमान में उडाये लिए जा रहे हो | ये सात घोड़े सात दिनों के प्रतीक है | यं मन्दिर प्राचीन ओडिसी स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना है | मन्दिर का निर्माण इस प्रकार किया गया है कि सूर्यदेव की प्रतिमा पर दिनभर विभिन्न कोणों से सूर्य की किरणें पडती हो | सम्भवत: इसलिए इस मन्दिर का नाम कोणार्क (यानि सूर्य का कोण) पड़ा होगा | अर्क सूर्य को कहा जाता है |

चौकोर परकोटे से घिरे इस मन्दिर के तीन ओर ऊँचे ऊँचे प्रवेशद्वार है | मन्दिर के तीन भाग है नट मंडप , जगमोहन मंडप और गर्भगृह | मन्दिर के ठीक सामने समुद्र से सूर्योदय का मनोहारी दृश्य दिखाई देता है | कहा जाता है कि कोणार्क मन्दिर के उपर एक चुम्बक था जो समुद्र में जाने वाले जहाजो को अपनी ओर खींच लेता था इसलिए दुसरे देशो के नाविक उसे निकालकर ले गये | मन्दिर का शिखर तो गिर गया है लेकिन दक्षिण-पश्चिम और उत्तरी कोनो में नवोदित सूर्य , म्द्याह्न सूर्य और अस्ताचलगामी सूर्य की मुर्तिया है |

मन्दिर की दीवारों पर उत्कीर्ण अप्सराओं , पशु-पक्षियों , देवी-देवताओं और प्राकृतिक दृश्य दर्शको को मुग्ध कर देते है | मन्दिर की बाहरी सतह पर मनुष्यों और पशुओ को अनेक मुद्राओं में अंकित किया गया है | रतिक्रीडा के भी अनेक दृश्य है | ये दृश्य कामोत्तेजक नही है | ये काम के उद्दात भाव को व्यक्त करते है | नारी मुर्तिया पत्रलेखिका , शालभंजिका तथा दर्पण में अपना मुखमंडल देखती नारी की प्रतिमाये उत्र्कुष्ट शिल्प कला को उजागर करती है |

कोणार्क के मुख्य दर्शनीय स्थल

समुद्र तट – सूर्य मन्दिर से करीब 3 किमी दूर यहाँ समुद्रतट संसार के सुन्दरतम समुद्रतटो में एक है | समुद्र में रेतीले तट पर बैठक सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सागर की उठती-गिरती लहरों का आनन्द लिया जा सकता है |

संग्रहालय– मन्दिर के निकटतम संग्रहालय में अनेको दुर्लभ कलाकृतिया दर्शनीय है | कोणार्क से 15 किमी दूर रणचंडी और 40 किमी दूर नियाली माधव का मन्दिर है | नियाली माधव के मन्दिर में आदिवासी देवता और श्रीकृष्ण के समन्वित रूप के दर्शन होते है | 30 किमी दूर काकतपुर में मंगला देवी मन्दिर और आठ किमी दूर करू करुणा है |

पहुचने के विविध मार्ग 

वायु मार्ग – निकटतम हवाई अड्डा भुवनेश्वर है जो पुरी से 65 किमी दूर है | भुवनेश्वर से कोणार्क की दूरी मात्र 65 किमी है |

रेल परिवहन – निकटतम रेलवे स्टेशन भुवनेश्वर है | पुरी के रेलवे स्टेशन से भी कोणार्क जाने के लिए टैक्सी , बस आदि वाहन उपलब्ध रहते है | दिल्ली , कलकत्ता ,मद्रास , मुंबई आदि प्राय: सभी बड़ी नगरो से भुवनेश्वर तक ट्रेने जाती है |

सडक परिवहन – कोणार्क , भुवनेश्वर और पुरी से नियमित बस सेवाओं से जुड़ा हुआ है |

पर्यटन का उचित समय

वर्षा ऋतू को छोडकर हर मौसम में कोणार्क (Konark Sun Temple) में भ्रमण किया जा सकता है | यहाँ सर्दियों में 26 डिग्री अधिकतम और गर्मियों में 40 डिग्री अधिकतम तापमान रहता है |

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