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Dadabhai Naoroji Biography in Hindi | दादाभाई नौरोजी की जीवनी

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Dadabhai Naoroji Biography in Hindi
Dadabhai Naoroji Biography in Hindi

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन से जुड़े प्रारम्भिक नेताओं में दादाभाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) का नाम अग्रणी है इसी कारण इन्हें श्रुद्धा से भारत के वयोवृद्ध नेता के नाम से स्मरण किया जाता है | दादाभाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) का जन्म सन 1825 में हुआ था | विश्वविद्यालयो की स्थापना के पूर्व के दिनों में एलिफिंसटन इंस्टिट्यूट में इन्होने शिक्षा पायी जहां के ये मेधावी छात्र थे | उसी संस्थान में अध्यापक के रूप में जीवन आरम्भ कर आगे चलकर वही वे गणित के प्रोफेसर हुए , जो उन दिनों भारतीयों के लिए शैक्षणिक संस्थाओं में सर्वोच्च पद था |

साथ में उन्होंने समाजसुधार कार्यो में अग्रगामी और कई धार्मिक तथा साहित्य संघठनो के यथा स्टूडेंट्स लिटरेरी एंड साइंटिफिक सोसायटी के प्रतिष्टाता के रूप में अपना विशेष स्थान बनाया | उसकी दो शाखाए थी एक मराठी ज्ञानप्रसारक मंडली और दुसरी गुजराती ज्ञानप्रसारक मंडली | रहनुमाई सभा की भी स्थापना इन्होने ही की थी | रास्त गफ्तार नामक अपने समय के समाज सुधारको के प्रमुख पत्र का सम्पादन और संचालन भी इन्होने किया |

पारसियों के इतिहास में अपनी दानशीलता और प्रबुद्धता के लिए प्रसिद्ध कैमास बंधुओ ने दादाभाई (Dadabhai Naoroji) को अपने व्यापार में भागीदार बनाने के लिए आमंत्रित किया | तदनुसार दादाभाई लन्दन और लिवरपुल में उनका कार्यालय स्थापित करने के लिए इंग्लैंड चले गये | विद्यालय के वातावरण को छोडकर एकाएक व्यापारी बन जाना एक प्रकार की अवनति या अपवतन समझा जा सकता है परन्तु दादाभाई ने इस अवसर को इंग्लैंड में उच्च शिक्षा के लिए जानेवाले विद्याथियो की भलाई के लिए उपयुक्त समझा | इसके साथ ही साथ उनका दूसरा उद्देश्य सरकारी प्रशासकीय संस्थाओं का अधिक से अधिक भारतीयकरण करने के लिए आन्दोलन चलाने का भी था |

जो विद्यार्थी उन दिनों उनसे सम्पर्क में आये और उनसे प्रभावित हुए उनमे सुप्रसिद्ध फिरोजशाह मेहता ,मोहनदास करमचन्द गांधी और मुहम्मद अली जिन्ना का नाम उल्लेखनीय है इसके अतिरिक्त दादाभाई का एक ओर उद्देश्य ब्रिटिश जनता को ब्रिटिश शासन से उत्पीडित भारतीयों के दुखो की जानकारी कराना और उन्हें दूर करने के लिए उनके उत्तरदायित्व की ओर आकर्षित कराना भी था | उन दिनों भारतीय सिविल सेवाओं में सम्मिलित होने के इच्छुक अभ्यर्थियों के लिए सबसे कठिनाई की बात यह थी कि उन्हें प्रतिकूल परिस्थितयो में ब्रिटिश अभ्यर्थियों से स्पर्धा करनी पडती थी |

इस असुविधा को दूर करने के लिए दादाभाई का सुझाव इंग्लैंड और भारत में एक साथ सिविल सर्विस परीक्षा करने का था | इसके लिए उन्होंने 1893 तक आन्दोलन चलाया जबकि उन्होंने वहा लोकसभा में उस सदन के एक सदस्य की हैसियत से अधिक संघर्ष किया और सभा ने भारत तथा इंग्लैंड में एक साथ परीक्षा चलाने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया | उन दिनों दुसरी उससे भी बड़ी परिवेदना भारतीयों की भयानक दरिद्रता थी हालांकि दादाभाई ही पहले व्यक्ति थे जिन्होंने इसके लिए दुःख की अभियक्ति की हो किन्तु वे पहले व्यक्ति अवश्य थे जिन्होंने उसके उन्मूलन के लिए आन्दोलन चलाया |

उन्होंने तथ्यों और आंकड़ो से यह सिद्ध कर दिया कि जहां भारतीय दरिद्रता में आंकठ दुबे थे वही भारत की प्रशासकीय सेवा दुनिया में सबसे महंगी थी | सरकारी आंकड़े उन दिनों नही के समान थे और जानकारी प्राप्त करने के लिए कोई गैर सरकारी साधन भी नही था | भारतीयों की आर्थिक स्थिति के संबध में प्रारम्भिक सर्वेक्षण के बाद यही निष्कर्ष निकला कि देश में एक व्यक्ति की औसत वार्षिक आय कुल बीस रूपये थी | इन्ही सब आंकड़ो के आधार पर East India Association के सामने उन्होंने Whats and means of India नामक निबन्ध 27 जुलाई 1870 को पढ़ा |

19वी शताब्दी के अंत तक दादाभाई ने अनेक समितियों और आयोगों के समक्ष ही नही वरन British Parliament के सामने भी भारत के प्रति की गयी बुराइयों को दूर करने के लिए वकालत की और उच्चाधिकारियो को बराबर चेतावनी देते रहे कि यदि इसी प्रकार भारत के नैतिक और भौतिक रूप से अवनति होती रही तो भारतीयों को ब्रिटिश वस्तुओ का ही नही वरन ब्रिटिश शासन का भी बहिस्कार करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा किन्तु इसका कोई प्रभाव नही पड़ा |

अंत में उन्होंने भारतीयो की राजनीतिक दासता और दयनीय स्थिति की ओर विश्व लोकमत का ध्यान आकृष्ट करने के लिए महान प्रयास करने का निश्चय किया जिसका परिणाम हुआ उनकी वृहदाकार पुस्तक Liberty and unBritish Rule in India | इसमें बहुत से लेख ,भाषण ,निबन्ध और उच्चाधिकारियो से पत्रव्यवहार तथा समितियों और आयोगों के समक्ष  दी गयी उनकी गवाहियो तथा कितने ही महत्वपूर्ण अधिनियमों और घोषनाओ के उद्धरण थे | House of Commons की सदस्यता प्राप्त करने में उनकी अद्भुद सफलता लक्ष्यपूर्ति के लिए साधन मात्र थी | उनका यह लक्ष्य या ध्येय था भारत का कल्याण और उन्नति जो संसद की सदस्यता के लिए संघर्ष करते समय भी उनके मस्तिष्क पर छाया रहता था |

वो बराबर नेशनल कांग्रेस के लिए प्रचार करते रहे और भारत में अपने मित्रो को लिखे विविध पत्रों में पारसियों की राष्ट्रीय संग्राम से दूर रहने की प्रवृति की निंदा करते रहे | कोई भी सप्ताह ऐसा नही बीतता था जिससे उनके पास भारत के पत्र और कांग्रेस के संबध में पत्र पत्रिकाओं की कतरने न आती रही हो तथा उनके पत्र भारतीय मित्रो के पास न पहुचते रहे हो | किसी ने भी यह अपेक्षा नही की थी कि दादाभाई House of Commons में इतनी बड़ी हलचल पैदा कर देंगे किन्तु उस सदन में उनकी गतिविधि और सक्रियता से ऐसा प्रतीत होता था मानो वे वहां की कार्यप्रणाली आदि से बहुत पहले से ही परिचित रहे हो |

भारत की दरिद्रता , मुद्रा और विनिमय ,अफीम या शराब के सेवन के प्रोत्साहन से उत्पन्न होने वाले कुपरिणामो के विषय में उनके भाषण बड़े आदर और ध्यान से सुने जाते थे | उन्होंने अपने भाषण में स्वराज्य को मुख्य स्थान दिया | अपने भाषण के दौरान उन्होंने कहा , हम कोई कृपा की याचना नही कर रहे है हमे तो केवल न्याय चाहिए | आरम्भ से ही अपने प्रयत्नों के दौरान में मुझे इतनी असफलताए मिली है जो एक व्यक्ति को निराश ही नही बल्कि विद्रोही भी बना देने के लिए पर्याप्त थी पर मै हताश नही हुआ हु और मुझे विश्वास है कि उस थोड़े से समय के भीतर ही जब तक मै जीवित हु सद्भावना ,सच्चाई तथा सम्मान से परिपूर्ण स्वायत शासन की मांग को परिपूर्ण करने वाला संविधान भारत के लिए स्वीकार कर लिया जायेगा | उनकी यह आशा उस समय पुरी हुयी जब वे सार्वजनिक जीवन से अवकाश ग्रहण कर चुके थे |

पूर्व और पश्चिम में कांग्रेसी कार्यकर्ता तथा उनके मित्र भारत की नई पीढ़ी की आशाओं के अनुसार सवैधानिक सुधारों को मूर्त रूप देने के लिए प्रस्ताव तैयार करने में व्यस्त थे परन्तु 20 अगस्त 1917 की घोषणा के दो महीने पूर्व दादाभाई की मृत्यु हो चुकी थी | इस घोषणा के द्वारा प्रशासनिक सेवाओं में अधिकाधिक भारतीय सहयोग तथा ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत क्रमश: भारत में उत्तरदायी शासन के विकास के लिए मार्ग प्रशस्त हुआ | इस प्रकार भारत के वयोवृद्ध नेता ने जो मांग ककी थी उसकी बहुत कुछ पूर्ति का आश्वासन मिल गया |

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