1965 भारत -पाक जंग , जिसमे भारतीय सेना ने पाकिस्तान में घुसकर पाकिस्तानी सेना को खदेड़ा | 1965 India Pakistan War Story in Hindi

1965-india-pakistan-war-story-in-hindiमित्रो आज हम आपको भारत पाक युद्ध की वो कहानी बतायेंगे ,  जिसमे भारत के कई शूरवीरो ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए , लेकिन पाकिस्तानी सेना के सामने घुटने नही टेके | मित्रो इससे पहले हम आपको भारत -पाक विभाजन की पुरी कहानी पांच भागो में बता चुके है जिसकी वजह से पाकिस्तान देश बना , जो आज तक हमारे देश के लिए मुसीबत बना हुआ है | हाल ही में उरी में हुए आतंकवादी हमले में भारत के कई शहीदों ने अपने प्राण गंवा दिए , जिसकी असली वजह पाकिस्तान का आतंवादियों को सहयोग देना था | अगर पाकिस्तान आतंकवादियो को शरण देना बंद नही रहेगा तो भारत फिर से 1965 की जंग और कारगिल युद्ध जैसी स्थिति के लिए तैयार है | अब आइये आपको 1965 में हुए भारत पाक युद्ध की पृष्ठभूमि कैसे बनी ये बताते है |

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भारत- पाक युद्ध की पृष्टभूमि

सन 1947 में कश्मीर को अपने साथ मिलाने के सफल न होने की पीड़ा को पाकिस्तान कभी नही भुला सका | समय समय पर बदलती प्रत्येक सरकार के लिए कश्मीर एक सनक बना हुआ था | पाकिस्तान को इस बात का अनुमान था कि भारत की विशालता और उसकी इतनी विशाल सेना के कारण वह भारत के खिलाफ आमने सामने की सीधी लड़ाई में सफल नही हो सकता | अपनी कुछ कमजोरियों को दूर करने के उद्देश्य से पाकिस्तान अमेरिका समर्थित “बगदाद समझौता ” और “दक्षिण पूर्व एशिया संधि संघठन SEATO” में शामिल हो गया | इस प्रकार साम्यवादियो के विरुद्ध लड़ने के बहाने उसे अमेरिका की ओर से सैन्य सहायता मिलनी शुरू हो गयी |वास्तव में इस सैन्य सहयोग का प्रयोग वह भारत के विरुद्ध करने की योजना बना रहा था , जो बाद की घटनाओं से स्पष्ट हो गया | चीन के साथ भारत के संबधो में कडवाहट आने पर पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ अपने गठजोड़ के बावजूद ,चीन के साथ नजदीकी संबध बना लिए  |

सन 1962 में चीन से मिली हार और 1964 में पंडित जवाहरलाल नेहरु के निधन से संभवत: पाकिस्तान ने अनुमान लगा लिया था कि भारत राजनितिक और सैनिक शक्ति दोनों दृष्टियों से कमजोर हो गया है | ऐसे में उसे सैन्य कारवाई के लिए यही समय उपयुक्त लगा | इसके अतिरिक्त अमेरिका से मिली सैन्य सहायता ,जिसमे उसने पैटन टैंक और लडाकू विमान हासिल कर लिए थे , के बल पर पाकिस्तान यह सोचने लगा था कि वह हथियारों और उपकरणों के मामले भारत से आगे बढ़ गया है किन्तु पाकिस्तान यह भी जानता था कि भारत चीन युद्ध के बाद भारत को पश्चिमी देशो से सैन्य सहायता मिल रही है इस कारण सैन्य शक्ति संतुलन , जो अभी उसके पक्ष में था जल्द ही भारत के पक्ष में हो सकता है और उसके सारे अवसर समाप्त हो सकते है |

सन 1963 के बाद से ही पाकिस्तान ने युद्ध विराम पर अपनी गतिविधिया तेज कर दी थी ,जिनमे कभी वह भारतीय सैन्य टुकडियो पर भी हमला कर देता था | कश्मीर के लोगो को भारत के प्रति नफरत पैदा  करने और उन्हें भारत के विरुद्ध भडकाने के लिए उसने तथाकथित अत्याचारों की अफवाहे फैलानी शुरू कर दी | सन 1963 की हजरतबल की घटना इसी तरह का उदाहरण थी | यह सब कुछ एक सोची समझी योजना के अंतर्गत हो रहा था | इस बार भी उसकी योजना सन 1947 की रणनीति के आधार पर ही तैयार की गयी थी | उसका उद्देश्य था कि पहले बड़ी संख्या में अनियमित बलों को युद्ध विराम रेखा के दुसरी ओर भेजा जाए , जो जम्मू कश्मीर में भारतीय सैन्य बलों पर हमला करके उन्हें कमजोर कर दे |

पाकिस्तान का अनुमान था कि अनियमित बलों की घुसपैठ से लोगो को विद्रोह के लिए प्रोत्साहित किया जा सकेगा और उसके बाद उनकी सहायता के लिए पाकिस्तानी सेना की नियमित टुकडिया भेज दी जायेगी | उसका विश्वास था कि ऐसे में भारतीय सेना एक ओर तो घुसपैठियों और विद्रोह से निपटने में उलझी रहेगी और और दुसरी ओर उसे पाकिस्तानी फौजों से निपटना पड़ेगा ,जो भारतीय सेना के लिए अत्यंत मुश्किल काम हो जाएगा | कुछ बातो से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि पाकिस्तान लड़ाई को जम्मू कश्मीर तक ही सिमित रहने की बात मानकर चल रहा था | उसे यह विशवास नही था कि भारत लड़ाई को जम्मू कश्मीर से आगे अंतर्राष्ट्रीय सीमा के उस पार तक भी ले जा सकता है |कश्मीर पर मुख्य हमला करने से पहले पाकिस्तान ने भारत की तैयारी और उसकी इच्चाश्क्ति की परीक्षा के लिए कच्छ क्षेत्र पर एक छोटा और सिमित हमला किया |

कच्छ : अप्रैल-मई 1965

kutch-indo-pak-warकच्छ का रण 23,309 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला रेगिस्तानी इलाका है | इसकी सीमा को लेकर भारत और पाकिस्तान के मध्य विवाद चल रहा था | पाकिस्तान रण के 9000 वर्ग किमी क्षेत्र पर अपना दावा कर रहा था | जनवरी 1965 में सीमा पर गश्त लगा रही पुलिस को पता चला कि पाकिस्तान ने भारतीय क्षेत्र में लगभग 2 किमी अंदर आकर एक मार्ग तैयार कर लिया है |पाकिस्तान की इस हरकत का विरोध किया गया लेकिन उसका कोई असर नही हुआ |परिणामस्वरूप भारत के उस क्षेत्र में केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल की टुकडिया तैनात करनी पड़ी | साथ की इन्फेंट्री ब्रिगेड को भी धरंगधारा से बुलाकर भुज में तैनात कर दिया गया |

9 अप्रैल 1965 को तोपों से लैस पाकिस्तानी फ़ौजो ने एक भारतीय चौकी पर हमला कर दिया | भारतीय सेना को स्थिति पर ध्यान रखने का आदेश दिया गया था | पैरा ब्रिगेड भी रवाना कर दी गयी थी और 18 अप्रैल तक मेजर जनरल पी.ओ.दुन के के नेतृत्व में किलो सेक्टर तैयार कर लिया गया | 22 अप्रैल को पता चला कि पाकिस्तान ने अपनी 8 इन्फेंट्री डिवीज़न और दो बख्तरबंद रेजिमेंट्स रवाना कर दी है | पाकिस्तानी फौजे अपने अड्डो के बिलकुल निकट रहते हुए अपने कार्य कर रही थी साथ ही उस भूभाग का प्राकृतिक स्वरूप अनुकूल नही था इसलिए भारतीय बलों को किसी भी बड़े अभियान में न उलझने का आदेश दिया गया  किन्तु पाकिस्तानी फौजों ने कुछ भारतीय इलाको और फौजों पर हमला किया और फिर योजना के अनुसार पीछे हट गयी | इसमें भारतीय सेना को काफी क्षति हुयी |

इसी बीच कई भारतीय सैन्य टुकडियो को उनके अभियान क्षेत्र की ओर रवाना कर दिया गया था | 28 अप्रैल 1965 को प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने लोकसभा ने अपने एक भाषण में भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ाई के गम्भीर रूप लेने की आशंका के प्रति सचेत किया था | पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने 7 मई कोा अपनी फौजों को आक्रामक कारवाई रोकने का आदेश दिया | जून 1965 में बुलाये गये कॉमनवेल्थ कांफ्रेंस में ब्रिटेन की मध्यस्था से दोनों पक्ष एक समझौते पर सहमत हो गये जिसके अंतर्गत दोनों पक्षों को 1 जनवरी 1965 तक की स्थिति पर कायम होना था और इस विवाद को मध्यस्था के जरिये हल किया जाना था |

यद्यपि कच्छ का अभियान एक छोटा सा अभियान था जिसमे लड़ाई के वास्तविक केंद्र से दूर लड़ाई लड़ी गयी थी तथापि इससे पाकिस्तान ने यह धारणा बना ली थी कि न तो भारत सरकार और न भारतीय सेना लड़ाई का साहस रखती है | उसकी इसी धारणा से जम्मू कश्मीर में बड़ा अभियान छेड़ने के उसके इरादे को बल मिला | दुसरी और भारत ने शान्ति समझौते को सद्भावपूर्वक स्वीकार किया था लेकिन इससे  भारतीयों के मन में पाकिस्तान के इरादों को लेकर संदेह जरुर पैदा हो गया था | बाद में कारगिल क्षेत्र में पाकिस्तानियों द्वारा संघर्ष जैसी स्थिति उत्पन्न करने पर भारतीयों ने उसकी कुछ चौकियो पर कब्जा करके इस बात का संकेत दे दिए कि भारत चुप नही बैठ सकता परन्तु इस ओर पाकिस्तान ने विशेष ध्यान नही दिया |

भारत की ओर से प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने निर्णय लिया कि कश्मीर पर किया गया कोई भी हमला भारत पर हमला माना जाएगा और उसका करारा जवाब दिया जाएगा , जो सेना द्वारा चुने गये समय और स्थान पर होगा | उनके इस निर्णय के बाद सेना प्रत्येक स्थिति का सामना करने के लिए तैयार हो गयी | हमले की स्थिति में पश्चिमी कमान क्षेत्र में युद्ध अभियान के लिए योजना बनाई गयी जिसके अनुसार

  • जम्मू कश्मीर की 15 कोर को पाकिस्तान तथा चीन दोनों की ओर सम्भावित खतरे से राज्य की सुरक्षा करनी थी साथ ही हमले की स्थिति में उसे पाक अधिकृत कश्मीर में सिमित हमले करने की जिम्मेदारी थी |
  • 11 कोर को पंजाब और गंगानगर (राजस्थान ) में दुश्मन की घुसपैठ को नाकाम करने का उत्तरदायित्व दिया गया था | उसे इच्छगिल नहर और उस पर बने पुलों को सुरक्षित रखना था |
  • नवगठित 1 कोर को जम्मू क्षेत्र से आगे बढना था तथा सियालकोट को लाहौर से सम्पर्क विहीन करके उसे अलग थलग करना था |

इस तरह भारत किसी भी हमले के लिए पुरी तरह तैयार था | मित्रो अगले अंश में हम आपको कश्मीर और पंजाब में हुए हमलो के बारे में विस्तार से बतायेंगे कि किस तरह भारतीय सेना अंतर्राष्ट्रीय सीमा को पार कर पाकिस्तान की सीमा में काफी अंदर तक जा चुकी थी और किस तरह भारत के जवानो ने अपने प्राण की आहुति देकर भारत को दुश्मनों से सुरक्षित किया था |

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